आम जन का मीडिया
Afraid of one color

डर एक रंग का

( देश के एक आम छात्र की पीड़ा को बयान करता नीरज बुनकर का एक आलेख )

ये दौर बहुत ही खतरनाक है , इसमें डरना भी मना है,पहले लगता था कि हमारे पास बाबा साहेब के संघर्षो का परिणाम संविधान है ,एक आशा रहती थी कि अभी भी लोगों ने अपने मानवीय मूल्यों को बेचकर नहीं खाया है, अभी भी उनमें वो मानवीयता बची है , लेकिन ये क्या ये सब तो एक मिथ्या उम्मीद मात्र थी .

पहले मैं यह भी सोचता था कि कैसे कोई रंग किसी पर भी आतंक मचा सकता है, लेकिन ये सब चरितार्थ होता हुआ जब देख रहा हूँ तो विश्वास नहीं हो पा रहा है कि ये वो ही लोकतान्त्रिक देश है, जिसका संविधान दुनिया का सबसे बड़ा संविधान है, जिसकी प्रस्तावना में सभी प्रकार की समानताओं से लेकर मानव को मानव समझने की बात कही गयी है ,लेकिन जब अब संविधान को किसी एक रंग के हाथों मरते हुए देख रहा हूँ, तो मुझे अपने जैसे तमाम युवाओं के भविष्य की चिंता होने लग रही है कि आखिर हम किस लिए पढ़ रहे है जबकि हमारे समाज को हम जैसे स्वतंत्र सोच व सामाजिक एकता की बात करने वाले युवाओं की जरुरत ही नहीं है.

जिस तरीके की परिस्थितियां हमारे देश में अभी बनायीं जा रही है ,ये ऐसे ही बिना किसी योजना के नहीं बन गयी है ,इसके लिए उन तथाकथित धर्म के ठेकेदारों को न जाने कितना धन व समय खर्च करना पड़ा है.हम अब बिलकुल भी सुरक्षित नहीं है ,आख़िरकार हो भी कैसे सकते है जहाँ न्याय से बड़ा भगवा हो जाए और लोकतंत्र की जगह भगवातंत्र स्थापित होने लगे, मरने वाले को न्याय दिलाने की जगह मारने वाले के समर्थन में लोग बिना सोचे समझे व बिना किसी प्रकार के कानून से डरे सड़को पर उतरकर जोरो से एक रंग हाथ में लिए नारे लगाने लगे.

आखिर इन सब तथाकथित राष्ट्रप्रेमियों को इस प्रकार की अमानवीय गतिविधियों को करने का साहस कहाँ से आ रहा है ? ये साहस कहीं उस डरावने रंग से तो नहीं आ रहा है ? क्या ये उस रंग की आड़ में इस देश में थोड़ी बहुत बची-खुची शांति को भंग करना चाहते है और फिर पूरे देश को रक्त के रंग से रंगना चाहते है ? जहाँ तक मुझे लगता है कि हिंसा करने वालो की कोई जाति नहीं होती है, ये तो उपद्रवी व आपसी सौहार्द को वैमनस्य में परिवर्तित करने वाली विचारधारा से उपजे हुए वो उत्पाद है, जिनके मस्तिष्को को उन धर्मावलम्बियों ने गुलाम बना दिया है जिसके कारण ये उत्पादित लोग उनके अनुसार सोचते है,जो वो करवाना चाहते है वो करते है,जो वो पहनवाना चाहते है वो पहनते है,जो वो बुलवाना चाहते है,वो बोलते है,जो वो खिलाना चाहते है,वो खाते है.मुझे तो आश्चर्य तब होता है जब वो लोग उनकी शरण में चले जाते है, जिन पर उन्ही लोगो ने , उसी विचारधारा ने उन्हें वर्षों से मानसिक व शारीरिक गुलाम बनाये रखा है,जिसके लिए बाबा साहेब ने उनसे छुटकारा दिलाने के लिए क्या-क्या नहीं किया ,फिर भी वो लोग उन्ही की गोद में जा बैठते है और अपने आप को सुरक्षित महसूस करते है,उन्हें उसी में सहजता महसूस होती है,अब इन्हें कौन समझाएं कि ये सह्जता जो तुम महसूस कर रहे हो,ये और कुछ नहीं एक प्रकार की परोक्ष व घातक गुलामी है,जो तुम्हे न तो आगे बढ़ने देगी और न ही कुछ सोचने देगी,तुम्हारा उपयोग करेगी और समय आने पर टिश्यू पेपर की तरह फेंक देगी और तुम्हे एहसास भी नहीं होगा.

अतः मेरी उन सब मानवता प्रेमियों से, जो बिना किसी हिंसा के संविधान के मूल्यों को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ना चाहते है,उनसे अपील है कि अभी भी समय है , हम इन फासीवादी ताकतों की चालबाजी को समझ ले और एक होकर एक ही स्वर में इनको चुनौती दे , मुझे आशा है कि अभी भी देश में बहुत से संविधान प्रेमी बचे हुए होंगे जो संविधान की हत्या होते हुए नहीं देखना चाहेंगे ,वो जरुर एक होंगे और और इस देश के लोकतंत्र को भगवातंत्र होने से बचाने के लिए आगे आयेंगे.

1 Comment
  1. RAJMAL REGAR says

    Hello
    my respected sir
    In Udaipur at the time of stop internet services with 144. some people spread a negative messages against murder of afrajul in rajasamand and Udaipur. bhagwa ( saffron) flag by some people at district court.
    its shameful and unconstitutional.
    RAJMAL REGAR , UDAIPUR

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