अभी अंबेडकर पर भी दांव खेला जा रहा है

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– संजय श्रमण
जैसे जैसे बहुजन खेमे में अलग अलग जातियों जनजातियों और संप्रदायों में ब्राह्मणवाद से मोहभंग हो रहा है वैसे वैसे उनके बीच अपनी अस्मिता को तलाशने और परिभाषित करने का प्रयास भी बढ़ रहा है. असल में अस्मिता की खोज और मोहभंग में कौन प्राथमिक है और कौन सेकंडरी है यह कहना भी कठिन है.

जो भी हो इतना तो तय है कि ओबीसी, दलितों आदिवासियों में अस्मिता की खोज और इसी क्रम में स्वयं को भिन्न बताते हुए ब्राह्मणवादी खोल से बाहर निकलने की कुलबुलाहट तेज हुई जा रही है.

भारत का ब्राह्मणवादी तबका यह सब देख रहा है और कुटिल चालें रच रहा है. उससे और उम्मीद भी क्या की जा सकती है? उसका यह सनातन प्रोजेक्ट रहा है. उसकी कोई गलती नहीं. वो अपना काम करेगा और हम अपना काम करेंगे.

अब जैसे जैसे बहुजन खेमे में अस्मिता के परिभाषण और अलगाव का ज्वार बढेगा वैसे वैसे इस ज्वार की शक्ति को ब्राह्मणवाद अपने लिए इस्तेमाल करना चाहेगा. यह शुरू हो भी चुका है. इसके कुछ सामान्य लक्षण हैं जो आसानी से पहिचाने जा सकते हैं.

जब आप जाति या संप्रदाय विशेष की तरह अपने आप को और अपनी दार्शनिक परम्परा को ब्राह्मणवाद से अलग करते हैं तब ये धूर्त आपके महापुरुष और दर्शन को अपने किसी आदि पुरुष का अवतार या उसी का एक अन्य रूप बनाकर खत्म कर देते हैं. बुद्ध को कबीर को और गोरख को इसी तरह खत्म किया गया है.

अभी अंबेडकर पर भी दांव खेला जा रहा है.

मध्यप्रदेश में ठीक अभी हमारी आँख के सामने यह खेल चल रहा है. मध्यप्रदेश में अभी तीन ऐसे प्रतिक्रान्ति से भरे आक्रमण चल रहे हैं जिनके जरिये बलाई समाज के राजा बलिराजा आन्दोलन, चर्मकार समाज के भीलट देव और कोइतूर समाज के शंभू शेख को छल कपट करके को-ऑप्ट करने का भारी प्रयास चल रहा है. चर्मकार समाज के भीलट देव को तो शिव का अवतार बना ही दिया गया है और उनके मदिर आदि को भी ब्राह्मणी रंग ढंग में रंग दिया गया है.

अब मालवा में राजा बलि के आन्दोलन पर ब्राह्मणवाद की नजर है. और सबसे महत्वपूर्ण – गोंडवाना की महान शक्ति फिर से जाग रही है. यह ब्राह्मणवाद के लिए और ब्राह्मणवादी राजनीति के लिए सबसे खतरनाक चुनौती बनकर उभर रहा है. इसीलिये गोंडवाना और गोंडी अस्मिता के खिलाफ सबसे गहरे षड्यंत्र रचे जा रहे हैं.

अब इस सबके बीच हम क्या करें? और इससे भी बड़ा सवाल ये है कि सच में हम कुछ कर भी सकते हैं क्या?

मेरा स्पष्ट मानना है कि न सिर्फ हम बहुत कुछ कर सकते हैं बल्कि यही समय है बहुत कुछ करने का. अभी बहुजन खेमे के सभी धड़े चाहे वे ओबीसी हों दलित हो आदिवासी हो या अल्पसंख्यक हों. ये सभी अगर अपनी विशिष्ठ अस्मिताओं की खोज में सौ प्रतिशत खो गये तो ये सभी एकसाथ डूबेंगे. समझदारी इस बात में है कि हम अपनी आधी ऊर्जा इन विशिष्ठ अस्मिताओं के बीच में एक “बहुजन अस्मिता” को भी निर्मित करते चलें. एतिहासिक रूप से हम एक ही सामाजिक सांस्कृतिक और दार्शनिक प्रष्ठभूमि से आ रहे हैं.

इसलिए हमारी राजनीतिक और सामाजिक शक्ति को संगठित होना ही चाहिए. अगर अस्मिताओं की यह खोज और यह सम्मोहन हमें आपसी गठजोड़ बनाने से रोकता है तो यह हमारे लिए एक भयानक हार का कारण बनेगा, यही अभी तक होता भी आया है.

अभी अगर ओबीसी दलित और आदिवासी अपने हर महापुरुष के जन्म दिवस या स्मृति दिवस पर शेष बहुजन समाज को भी आमंत्रित करे, अपने त्योहारों सामाजिक उत्सवों में अन्य अल्पसंख्यकों और जातियों को भी आमंत्रित करे. यह प्रयास सचेतन रूप से और संगठित रूप से होना चाहिए. इसी से बहुजनों के ठोस भविष्य का कोई मार्ग निकलेगा.

ये मार्ग निकल भी रहा है. बस जरूरत है इसके प्रचार की और इसे एक रणनीति के साथ लागू करने की.

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