आम जन का मीडिया
A young man, through which Ambedkar is reaching every house!

एक अम्बेडकरवादी युवा, जो बाबा साहब को घर घर पंहुचा रहा है !

सोशल मीडिया ने मुझे कई अनमोल हीरे दिये ,बहुत लोगों तक मुझे ले गया और बहुत लोगों को मुझ तक ले आया ,इसलिये मुझे सोशल मीडिया से सदैव अनुराग रहा ,कईं साथी मेरे रात दिन सोशल मीडिया पर उपस्थिति का उपहास करते है ,लेकिन मुझे शुरू से ही लगता रहा है कि यह एक माध्यम है जिसका उपयोग करके हम लोग अपनी आवाज बुलंद कर सकते है । वर्ष 2011 में अन्ना हज़ारे की कोर कमेटी जिसे मैंने चोर कमेटी लिख कर पंगा लिया था ,उस वक़्त से मैंने फेसबुक ,ट्वीटर और ब्लॉग के ज़रिए दलित शोषित समुदाय के प्रश्नों पर लिखना शुरू किया ,जो समय के साथ बढ़ता गया ,इस सोशल मीडिया सक्रियता ने कई नये दोस्त दुश्मन बनाने में मदद की ,दुश्मनों का मैने भरपूर आनंद लिया और दोस्तों के जरिये हमने बाबा साहब के मिशन को आगे बढ़ाया.कई नए अभियान भी बने ,इसी दौरान मुझे इस सामाजिक प्लेटफ़ॉर्म पर एक उत्साही और निस्वार्थ व्यक्तित्व के धनी युवा रमेश पतालिया से मुलाकात का अवसर मिला ।

हम लोग उन दिनों में घर घर अम्बेडकर पुस्तक गांव गांव पंहुचाने की कोशिशों में मुब्तिला थे कि अचानक एक दिन मुझे मैसेंजर पर पालनपुर से एक संदेश मिला कि उन्हें कुछ बुक्स चाहिये ,हम लोगों ने जब गुजरात हिंदी की किताबें भेजी तब हमने कल्पना भी नही की कि भविष्य में घर घर अम्बेडकर को पंहुचाने का यह अभियान गुजरात मे केंद्रित हो जाएगा और रमेश पतालिया इसके कर्ताधर्ता होंगें ,पर आज मैं बेहद खुशी के साथ यह कह सकता हूँ कि भाई रमेश पतालिया जी की ही मेहनत का परिणाम है कि घर घर अम्बेडकर अब सिर्फ एक किताब नहीं हो कर बड़ा जन अभियान बन चुका है ,इसका वास्तविक श्रेय रमेश जी और उनकी ऊर्जावान टीम को जाता है ।
रमेश पतालिया जी के नेतृत्व में 5 हजार हिंदी पुस्तकें पालनपुर ,सिरोही और जालोर जिले के हजारों घरों तक पँहुची तथा अभी 6 जनवरी को घर घर अम्बेडकर के गुजराती संस्करण का पालनपुर में भव्य विमोचन किया गया ,इसकी भी प्रथम आवृति 5 हजार प्रतियों में प्रकाशित हुई है , बहुत ही सरस अनुवाद रमेश जी ने खुद किया है , अनुवाद ,प्रकाशन और वितरण का बहुआयामी काम सहजता से संपादित करना रमेश पतालिया की दक्षता को जाहिर करता है ।

रमेश भाई लो प्रोफ़ाइल में रहने वाले और स्वयं काम करके दूसरे साथियों को श्रेय देने वाले असली लीडर है ,उनमें गज़ब की टीम भावना दिखलाई पड़ती है ,खुद कभी किसी भी काम की क्रेडिट नहीं लेते ,जबरदस्ती दो तो सकुचाते शर्माते है और मीठे अंदाज़ में ना कह कर बच निकलते है ,इसलिए मुझे लगा कि उनको श्रेय सार्वजनिक रूप से दूं ,ताकि वे मना भी नहीं कर सकेंगे ,हालांकि वे आंशिक रूप से मुझ पर नाराज हो जाएंगे कि मैंने उन पर यह सब लिखा ,पर मित्रों सबको यह जानना बहुत आवश्यक है कि बाबा साहब का यह कारवां किन लोगों की वजह से आगे बढ़ रहा है और कैसे ?

आखिर वो कौन लोग हैं जो अपना श्रम ,शक्ति और संसाधन बिना किसी लाभ परिलाभ के लोभ में बाबा साहब के मिशन में चुपचाप लगा देते है ,इसी को समर्पण कहा जाता है ,यही असली काम है जो रमेश पतालिया और उनकी टीम के दर्जनों युवा बिना कोई शोर मचाये किये जा रहे है ,इनका कोई राजनीतिक मकसद नहीं है ,ये कभी सियासत के सितारे नहीं बनेंगे ,इनको मंचों की शोभा और मीडिया के स्टार बनने की कोई इच्छा नहीं हैं ,इतिहास के पन्नों पर इनकी कहानियां नहीं होगी ,इनकी ज़िंदाबाद के नारे भी नहीं होंगे शायद ,फिर भी ये लोग लगे हुये हैं ,इन कर्मवीरों को एक नीला सलाम तो बनता ही है !

खैर ,थोड़ा सा और जान लीजिए इस निष्काम युवा के बारे में जो राजस्थान की धरा पर जन्मा ,गुजरात की धरती पर पला ,बढ़ा और पढ़ा और वहीं अपनी कर्मभूमि बना कर रच बस गया । रमेश पतालिया के पिता जालौर जिले से सन 1982 में जब पलायन करके गुजरात के पालनपुर जिले में पँहुचे तब रमेश भाई महज़ 6 माह के थे , उनका प्राथमिक और माध्यमिक तक का शिक्षण कुंभासन गांव में ही हुआ , नूतन भारती ग्राम सेवा महाविद्यालय मडाना से रूरल स्टडीज में 75.83 प्रतिशत से बैचलर डिग्री करने के बाद उन्होंने गुजरात विद्यापीठ से सामाजिक कार्य मे मास्टर करने की ठानी ,लेकिन मौखिक साक्षात्कार में अपेक्षित अंक नहीं मिलने से प्रवेश नही ले पाए, अर्थभाव था ,इसलिए डोनेशन सीट भी नही ले पाए ,मगर हिम्मत रखी ,साल भर एक जगह नौकरी की ,2 रुपये सैकड़ा ब्याज से फीस जुटाई और अगले सत्र में सेल्फ फाइनेंस से हेमचंद्राचार्य नार्थ गुजरात यूनिवर्सिटी पाटण से वर्ष 2006-07 में मास्टर ऑफ सोशल वर्क कंप्लीट कर दिखाया ।

रमेश पतालिया प्रारम्भ से ही सेवाभावी और मेहनती रहे ,उन्होंने अपनी माँ और पिताजी को बचपन से ही कड़ी मेहनत करते देखा ,वे ही उनके आदर्श और हीरो थे ,उनसे प्रेरणा पा कर उन्होंने भी कड़ी मेहनत को अपनाया और अत्यंत विषम परिस्थितियों के बाद भी कभी निराशा को पास नही फटकने दिया ,माता पिता से मिले सेवा भाव के संस्कार ने ही उन्हें समाज सेवा के क्षेत्र में आने को प्रेरित किया ,वर्ष 2003 में उन्होंने सेवा निधि फाउंडेशन बना लिया था ,जिसके माध्यम से सरकार के साथ आदिवासी समुदाय के विकास और स्वास्थ्य के लिए बनासकांठा में दो वर्ष काम करने का अनुभव भी लिया ,जो उनके हर जगह काम आया ।

गुजरात सरकार के आरोग्य विभाग में बनासकांठा जिले में रमेश भाई ने तीन वर्ष सलाहकार के रूप में सेवाएं दी और बाद में मनरेगा में सोशल ऑडिट में जिला स्तर पर मोनिटरिंग भी करने का दो वर्ष का अनुभव लिया, बाद में सामाजिक न्याय और अधिकारिता विभाग में बाल सुरक्षा अधिकारी के पद पर चार साल अच्छे से काम करके स्वयं को साबित किया ,फिलहाल रमेश पतालिया जी बनासकांठा में नेशनल अर्बन लाईवलीहुड मिशन के तहत सिटी मैनेजमेंट यूनिट में कार्यक्रम अधिकारी के रूप में कार्यरत है ,इस पद पर वे विगत तीन वर्षों से सेवाएं दे रहे है ।

जिंदगी की इतनी जद्दोजहद ,संघर्ष और विपरीत हालातों के बावजूद रमेश जी ने अपने लक्ष्य को कभी ओझल नहीं होने दिया , अच्छी पढ़ाई के बाद भी समाज सेवा को ही वरीयता दी और कई पदों पर आसीन होने के बावजूद सदैव अपने दलित शोषित भाई बहनों को आगे लाने को प्रयासरत रहे ,उन्होंने अपने लोगों के प्रति दायित्व भाव को कभी विस्मृत नहीं किया ,बाबा साहब के पे बैक टू सोसायटी के सिद्धांत को हृदयंगम करके अहिर्निश इसी दिशा में लगे रहे ,बिना किसी मान सम्मान की अपेक्षा के उन्होंने ठाना कि बाबा साहब के जीवन से हर भारतीय को अवगत कराना है ,इसी उद्देश्य को ले कर वे घर घर अम्बेडकर अभियान गुजरात एवं राजस्थान में संचालित करते हैं ,इतना ही नहीं बल्कि बाबा साहब के न्याय समानता के मिशन में काम करने वाले साथियों को सहयोग करने में भी रमेश पतालिया जी और उनकी टीम कभी पीछे नही रही है ।

ऐसे मिशनरी भीम सैनिकों के काम को बार बार नमन करने को मन करता है ,अगर मैं भाग्य में यकीन करता तो खुद को सौभाग्यशाली कहता कि रमेश भाई पतालिया जैसे साथी इस सफर में हमें मिले ,पर मैं इस योगदान को नसीब की संज्ञा दे कर कतई कमतर नहीं करूंगा ,यह सामाजिक दायित्व बोध की चरम स्थिति है ,जिसे वन्दित और अभिनंदित किया जाना जरूरी है , क्योंकि ऐसे ही दीवानों के दम पर जय भीम का यह कारवां निरन्तर गतिमान रहता है और दुनिया की कोई ताकत उसे रोक नही सकती ,यह बाबा भीम का कारवां है ,वैसे भी किसी के रोके कब रुका है ! जो साथी रमेश सी पतालिया और उनकी टीम के साथ मिल कर घर घर अम्बेडकर अभियान को आगे ले जाना चाहते है ,वे रमेश जी से 9408850804 पर सीधे संपर्क कर सकते हैं ।

( लेखक शून्यकाल के संपादक है )

फोटो क्रेडिट – हिदायत खान ,कुम्भासन ( पालनपुर )

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