‘साहित्य की एक नई दुनिया संभव है’, वक्तव्य से हुआ दलित साहित्य महोत्सव का आरम्भ

दलित शब्द समाज के हर दलित-आदिवासी, महिला, घुमंतू आदिवासी, ट्रांसजेंडर समुदाय, किसान, मजदूर, व हर वंचित समुदाय के संघर्ष और प्रतिरोध का प्रतीक

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देश भर से आये प्रसिद्द साहित्यकारों ने किया उदघाटन, लक्ष्मण गायकवाड़, बल्ली सिंह चीमा, मोहन दास नैमिशराय, निर्मला पुतुल, चौथीराम यादव व कई अन्य हुए शामिल.

देश में जातिगत भेदभाव के खिलाफ कड़े कानून होने बावजूद खुले आम भीड़ हत्या जारी, सबसे ज्यादा दलित, आदिवासी, और अल्पसंख्यक इसके शिकार – मेधा पाटकर

 

नई दिल्ली | 03 फरवरी 2019 : ‘साहित्य की एक नई दुनिया संभव है’, के नारे के साथ दो दिवसीय प्रथम दलित साहित्य महोत्सव का शुभारंभ आज दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज में हुआ. महोत्सव का आगाज राष्ट्रीय अम्बेडकर मिशन प्रचार मंडल से मोर ध्वज गौतम और उनके साथियों ने बाबा साहेब अम्बेडकर के विचारों से युक्त क्रान्तिकारी गीतों से किया. उदघाटन समारोह में प्रसिद्द लेखक साहित्यकार मोहन दास नैमिशराय, लक्ष्मण गायकवाड़, रसाल सिंह, बल्ली सिंह चीमा, सूरज बड़त्या, प्रो. हंसराज सुमन, बलराज सिंहमार, महेंद्र बेनीवाल, मंजू रानी व संजीव डांडा शामिल थे. नर्मदा बचाओ आन्दोलन व जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय की प्रसिद्द सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर व किरोड़ीमल कॉलेज की प्रिंसिपल विभा चौहान ने मुख्य अतिथि की भूमिका निभायी और लोगों के सामने अपनी बाते रखी.

दलित साहित्य महोत्सव की शुरुआत करते हुए किरोड़ीमल कॉलेज के डॉ नामदेव ने देशभर से आये विभिन्न भाषाओं के साहित्यकारों, कलाकारों, व सामजिक कार्यकर्ताओं का अभिनन्दन किया और महोत्सव के महत्व के बारे में बताते हुए बताया कि इस आयोजन के लिए देश भर के करीब 19 अलग भाषाओं के साहित्यकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं को संपर्क किया.

आयोजन के संस्थापक सूरज बड़त्या ने कहा दलित शब्द की व्याख्या की. उन्होंने बताया कि दलित शब्द समाज के हर दलित-आदिवासी, महिला, घुमंतू आदिवासी, ट्रांसजेंडर समुदाय, किसान, मजदूर, व हर वंचित समुदाय इसमें आते हैं. दलित शब्द अपने आप में संघर्ष और प्रतिरोध का प्रतीक हैं.

नर्मदा बचाओ आन्दोलन की नेत्री मेधा पाटकर ने कहा कि आज देश भर में सरकारी दमन का दौर चल रहा है. बीजेपी सरकारें संविधान होने के बावजूद भेदभाव की राजनीति आगे लाकर लोगों के बीच हिंसा और बंटवारा कर रही है. जब संविधान समानता की अधिकार देती है, और देश में जातिगत भेदभाव के खिलाफ कड़े कानून हैं तब यहाँ खुले आम भीड़ हत्या जारी है, किसान, मजदूरों, आदिवासियों की जमीन छीनी जा रही है जिसके खासकर दलित, आदिवासी, और अल्पसंख्यक शिकार बन रहे हैं. दलित साहित्य लोगों की वेदना,उसपर हो रहे जुल्मों को समाज के सामने का कार्य कर रहे हैं और समाज को इसे स्वीकारते हुए साहित्य की कमान सौंपनी चाहिए. दलित साहित्य देश के विकास और राजनीति में एक नई सकारात्मक दिशा और उर्जा लाती रही और भविष्य में ऐसा होगा यह हमारा पूरा विश्वास है.

सत्र को आगे बढाते हुए किरोड़ीमल कॉलेज के प्रोफेसर और आयोजन समिति के सदस्य डॉ रसाल सिंह ने इस प्रकार के आयोजनों को एकजुट होने का माध्यम बताया और कहा कि यह महोत्सव नहीं बल्कि सामजिक पीड़ा में सहभागिता और पहचान की तरफ कदम है.

दलित साहित्य महोत्सव को परिभाषित करते हुए प्रसिद्द साहित्यकार मोहनदास नैमिशराय ने कहा कि दलित साहित्य विलास का साहित्य नहीं बल्कि उनकी पीड़ा, प्रखर आवाज,और उनके संघर्षों का साहित्य है. देश में चल रहे विभिन्न सरकारी साहित्य महोत्सव का आयोजन सिर्फ खानापूर्ति रहा है और वहां समाज की संवेदना रखने वाले उपयुक्त वक्ताओं की कमी है. सभी की उन्नति के लिए आवश्यक है अवसर मिलना. दलित, आदिवासी, पिछड़े वर्ग, घुमंतू आदिवासी, महिलाओं और अन्य शोषित समुदायों के प्रतिभावों को समाजवाद, बाजारवाद, और ब्राह्मणवाद ने रोक दिया है. दलित साहित्य सिर्फ दलितों का ही नहीं बल्कि उन सभी लोगों का है जो अत्याचारों के खिलाफ संघर्षरत हैं.

कार्यक्रम की रोचकता आगे बढाते हुए प्रसिद्द गीतकार और साहित्यकार बल्ली सिंह चीमा ने ‘दूर हमसे क्यूँ उजाला, इसकी भी चर्चा करो. हैं कहाँ सूरज हमारा इसकी भी चर्चा करो’  और ‘ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के’ जैसे गीतों से चेतना जागृत करते हुए लोगों में जोश भर दिया.

महोत्सव के प्रमुख आयोजक अम्बेडकरवादी लेखक संघ से डॉ बलराज सिंहमार ने आगे बात रखते हुए कहा कि जब दलित, महिलाएं, पिछड़ा वर्ग अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करते हैं तो इन सत्ताधारियों को परेशानी होती है. यह अभी भी बतलाता है कि हमारा समाज, हमारे सत्ता में बैठे लोग अभी भी कितने जातिवादी हैं. आज दलित साहित्य विद्यालयों, और महाविद्यालयों में पढ़ाया जा रहा है और हमारी आने वाली पीढ़ी संवेदनशील बन रही है और शोषित तबके अपने अधिकारों के प्रति जागृत हो उसके लिए संघर्ष कर रहे हैं.  यह सकारात्मक है और हम ऐसे आयोजनों से इस पहल को और आगे ले जाना चाहते है.

‘सत्य वह है जो सबका हित करें’, इससे शुरुआत करते हुए महाराष्ट्र से आये प्रसिद्द साहित्यकार लक्ष्मण गायकवाड़ ने भेदभाव की पराकाष्ठा बताते हुए कहा गाय ब्राह्मणों ने पाली तो उसे देवता का स्थान, गधा, सूअर दलितों ने पाला तो उसे गाली मिली और उन्हें वंचित कर दिया. दलितों को इस लोकतंत्र परिधि में साहित्यिक भागीदारी के साथ-साथ राजनीतिक भागीदारी भी बढानी होगी. “मैं सत्ता में बैठे प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी को सुझाव देते हुए कहना चाहता हूँ कि गाय के ऊपर बजट बनाने से अच्छा उतनी गंभीरता से आदिवासियों के लिए बजट बनाए तो देश सही विकास के रास्ते पर आ जाएगा”, लक्ष्मण गायकवाड़ ने कहा. दलित साहित्य सभी को जातीय, लैंगिक भेदभाव से दूर साथ लेकर चलने की बात करता है.

इसके बाद हेमंत कुमार बौद्ध ने गीत के माध्यम से दलित और वंचित समाज के अनुभव और संघर्ष को बेहतरीन ढंग से रखते हुए जोश से भर दिया.

“यह संगोष्ठी नहीं, महोत्सव है, एक जश्न है जो महाविद्यालय के वातावरण में दिखाई दे रहा है. यह सीखने सिखाने, संघर्षों, और बदलाव का महोत्सव है”, कार्यक्रम की विशेष अतिथि और किरोड़ीमल कॉलेज की प्रिंसिपल डॉ विभा चौहान ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा.

दिल्ली विश्विद्यालय के अकादमिक समिति के सदस्य और रिदम के निदेशक डॉ हंसराज सुमन ने कहा की दलित साहित्य देश में भागीदारी सुनिश्चित करते हुए एक बहुविधि समाज के निर्माण के लिए अति आवश्यक है. आज जब आरक्षण ख़त्म किये जा रहे हैं और साजिश के तहत सामाजिक न्याय से हटाकर आर्थिक आधार पर आरक्षण करने की कोशिश के समय यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि दलित समाज अपनी रचनाओं को समाज के सामने स्पष्ट रूप से रखें.

दिल्ली समर्थक समूह से संजीव डांडा ने दलित साहित्य महोत्सव को महत्वपूर्ण आयोजन बताते हुए देश के विभिन्न पहचान के संघर्षों और आंदोलनों से साहित्य के जुड़ाव का एक कदम बताते हुए इसे आगे ले जाने का आवाहन किया.

उदघाटन समारोह के दौरान रिदम पत्रिका का विमोचन सम्माननीय अतिथि और साहित्यकारों के द्वारा किया गया. इसके बाद अलग-अलग सत्रों में महत्वपूर्ण विषयों पर सत्र चर्चा हुई और दलितों के संघर्षों पर फिल्म दिखायें गए. महोत्सव का विशेष आकर्षण बड़ी संख्या में मौजूद विद्यार्थी थे जो किरोड़ीमल कॉलेज, आर्यभट कॉलेज, रामानुज कॉलेज,जामिया मिलिया इस्लामिया, आगरा व कई अन्य जगहों के विश्वविद्यालयों से आये थे. इन्होने ना सिर्फ चर्चा में भाग लिया बल्कि इसके पूरे आयोजन में सक्रिय भागीदारी की.लगभग 12 प्रकाशकों ने पुस्तक मेला में भाग लिया और आकर्षण का केंद्र बने रहे.

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