भीड़ में शामिल लोगों के लिए एक किताब आई है RECONCILIATION

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– रवीश कुमार
इस किताब को उनके लिए भी पढ़ना भारी होगा जो बिना पढ़े गाली देने लगते हैं और उनके लिए भी जो गाली नहीं देते मगर पढ़ते नहीं हैं। हत्या करना अब सामाजिक अभ्यास का हिस्सा हो गया है। इस अभ्यास में मार देने के बाद हत्यारों की भीड़ को पचा लेना भी शामिल है। तभी इस किताब में मारे गए लोगों की दास्तान है। मार कर भाग जाने वाली भीड़ की नहीं है। विचारधारा के पीछे छिपी खड़ी इस भीड़ के साथ वकील भी हैं और पुलिस भी है।
हत्यारों के पक्ष में इंसाफ़ हो रहा है। जो मारे गए हैं उन्हें अपराधी क़रार दिया जा रहा है। मारने वाले बेकसूर और बेदाग़ रहें इसके लिए समाज को तैयार कर लिया गया है। ताकि समाज हत्यारों के पक्ष में तर्क गढ़ सके ताकि हिंसा का मानस बनता रहे। वे तर्क देने से चूक जाएं तो गालियां देने लगें। गालियां उनकी मुक्ति का हथियार है। दरअसल यह किताब उन्हीं गाली देने वालों के लिए है जो हर हत्या के बाद भागी हुई भीड़ के आगे खड़े हो जाते हैं।
हत्या सिर्फ हत्या नहीं है। उसका बंटवारा हो गया है। मछली मारने गए युवक की लाश गौ तस्कर बताकर घर लौटती है। आंख निकाली जा चुकी होती है। आंत निकाली जा चुकी होती है। भीड़ भाग चुकी होती है। उसे भागना ही होता है। वैसे ही भागे हुए लोगों के लिए एक किताब आई है जिसका नाम है RECONCILIATION। जब भी कभी ये लोग इस किताब को पढ़ेंगे, अपनी सज़ा ख़ुद तय करेंगे।
आप हंसेंगे और कहेंगे कि कभी नहीं पढ़ेंगे। मुझे पता है। पर उन्हें अपनी हत्या याद आती रहेगी। इंसान और हैवान दोनों की स्मृतियों पर मुझे बहुत भरोसा है। मैं जानता हूं कि हत्या करने वाली भीड़ की स्मृतियों में पत्थर का वह टुकड़ा आज भी मौजूद है जिससे किसी को मारा गया है। भले किसी का चेहरा नहीं दिखता है मगर उस भीड़ में शामिल लोग एक दूसरे का चेहरा पहचानते हैं। हत्या करने वाला जब भी कभी किसी अख़बार में हत्या की ख़बर पढ़ेगा, उसे वो भीड़ याद आएगी जिसमें शामिल होकर वह हत्या करने गया था।
आप जानते हैं कि भीड़ की हिंसा के ख़िलाफ़ मोहब्बत का कारवां लेकर कुछ लोग निकले थे। हर्ष मंदर, नताशा बधवार, जॉन दयाल, प्रिया रमानी। इन सबने अनुभव दर्ज किए हैं। भीड़ के मारे हुए लोगों के परिवार वालों से मुलाकात की थी। कोशिश की थी कि पास-पड़ोस में मोहब्बत का रिश्ता बन जाए मगर लोग उनके लोग बनाम मेरे लोग में बंटे हुए मिले। हत्या करने वालों को बचाने की ज़िद नज़र आती है। आगे और हत्याओं के लिए। इसके लिए उन लोगों का काम लिया जाएगा जिन्हें बचाने का आश्वासन दिया गया है। उन लोगों को हत्यारा बनाया जाएगा जिन्हें बचा लेने का आश्वासन दिया जाएगा।
हर्ष मंदर ने इसकी बेहद मार्मिक भूमिका लिखी है। वैसे इस पोस्ट के बाद कमेंट पढ़ते ही मार्मिक का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। लेकिन ज़ॉम्बी होते समाज को अपने होने का प्रमाण देने से कौन रोक सकता है। आप इस किताब को बेशक ख़रीद लें मगर पढ़ें नहीं। हो सके तो उन्हें पढ़ने दें जो इन हत्यारों के लिए नारे लगाते हैं। उस पुलिस को दें जो जानते हुए भी चुप रह जाती है।
आप ख़ुद न पढ़ें। इससे कुछ न कर पाने का अहसास आपको सताएगा। लगेगा कि आप इस भीड़ से कभी नहीं लड़ पाएंगे। मुमकिन है कि चुप्पी एक दिन आपको उसी भीड़ का हिस्सा बना दे। शिकार या शिकारी के रूप में। तब तक आप देख सकते हैं कि दो चार दस लोग अपने हिस्से का अहसास हल्का कर रहे हैं। वे उस जगह पर गेंदे के दो चार फूल रख आएं हैं जहां पहलू ख़ान मार दिया गया मगर उसका हत्यारा भीड़ की आड़ में भाग गया। गेंदे का फूल आप भी रखने जाइयेगा। एक बार कोशिश कीजिए फिर पता चलेगा कि हिंसा के ख़िलाफ़ दो फूल रखना भी कितना मुश्किल हो गया है। यह मुश्किल किसने बनाया है? आपने तो नहीं न! आपके पास तो वैसे भी कोई विकल्प नहीं है। आप पूछते हैं बताइये विकल्प क्या है? क्या आपका विकल्प यही है ?
इस किताब को ख़रीदना आसान नहीं। आप अमेज़न से खरीद सकते हैं। westlandbooks ने छापा है और कीमत मात्र 399 की है। इसे ख़रीद कर उस भीड़ को दे दें जो मेरे कमेंट बाक्स में आने वाली है। इसलिए दे दें ताकि वो बाद में न कहे कि उनके हत्यारा बनने या बना दिए जाने के पहले किसी ने चेतावनी नहीं दी थी। किसी ने उनके लिए दस्तावेज़ नहीं जुटाए थे। किसी ने उन्हें ये किताब नहीं दी थी।

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