आरएसएस से एक दलित स्वयंसेवक के मोहभंग की कहानी है -“ व्यामोह “

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(भंवर मेघवंशी)
मेरी कुल उम्र ( 47 वर्ष ) जितना समय आरएसएस में गुज़ारने वाले दलित स्वयंसेवक मूलचंद राणा ने न केवल संघ का परित्याग कर दिया , बल्कि ‘व्यामोह’ नाम से आत्मकथा लिखकर संघ से मोह , व्यामोह और मोहभंग की पूरी कहानी बयान की है .एक जनवरी की सुबह मैने इसे पढ़ना शुरू किया , व्यस्तता के बावजूद 147 पृष्ठ की किताब को अभी अभी ख़त्म किया
संघ छोड़कर आ रहे दलित कार्यकर्ताओं की आपबीती के रूप में यह एक महत्वपूर्ण किताब कही जा सकती है , जिसमें लेखक ने संघी समरसता की कलई खोलने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. हालाँकि वे संघ के पुराने पवित्र कार्यकर्ताओं , समर्पित प्रचारकों और गुरु गोलवलकर के मोहपाश से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाये हैं और इसे भी वे ईमानदारी से स्वीकारते दिखाई पड़ते हैं.

 
3 मई 1953 को अहमदाबाद में जन्में राणा के पूर्वज मेहसाणा ज़िले के एक गाँव के निवासी थे , जो अहमदाबाद की कपड़ा मिल में जाकर नौकरी करने लगे . सवा बा और कंकु मा की संतान के रूप में वे अहमदाबाद की एक चाल में पैदा हुये, म्यूनिसिपल स्कूल में पढ़े , बीकॉम , एलएलबी और एमबीए किया और बैंकिंग सेक्टर में नियुक्त हो गये, वहाँ से बतौर सीनियर मैनेजर सेवनिवृत्ति ली, चूँकि संघ के कृपा पात्र थे , इसलिये गुजरात लोक सेवा आयोग के सदस्य बने और निरंतर इस पद पर छह साल सेवा देते रहे. कईं प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में विषय विशेषज्ञ और विज़िटिंग फ़ैकल्टी के रूप में भी सेवाएँ देते रहे.


दसवीं कक्षा के विद्यार्थी के रूप में आरएसएस के सम्पर्क में आये, प्रथम वर्ष तक शिक्षित हुये , मुख्यशिक्षक के रूप में अपना काम शुरू करके सामाजिक समरसता मंच गुजरात के प्रदेश उपाध्यक्ष तक के दायित्वों का निर्वहन किया . कह सकते हैं कि उन्होंने अपनी किशोरावस्था , जवानी और प्रोढ अवस्था संघ के हिंदू राष्ट्र के सपने के नाम कर दी , लेकिन दलित होने के दंश से मुक्त नहीं हो पाये और सहते सहते अंतत: एक दिन बग़ावत कर बैठे . इतना ही नहीं बल्कि अब अपनी व्यथा को जीवनी के रूप में लिपिबद्ध करके सबके सामने संघ का असली चेहरा प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहे हैं . जीवन के उतरार्द्ध में यह निश्चय ही साहस का काम कहा जा सकता है ,जबकि जोखिम लेने से बचने की कोशिश रहती है , राणा ने नईं जंग छेड़ दी है.


किताब की भूमिका वरिष्ठ पत्रकार डॉक्टर स्वप्निल महेता ने लिखी है , भूमिका लेखक के अनुसार -“ व्यामोह एक आत्मकथा नहीं बल्कि उनका इकरारनामा है .यह समाज के प्रति संघ की अस्वीकृति की उद्घोषणा है . दलितों और आदिवासियों के साथ पूर्वाग्रह रखकर समरसता का भद्दा खेल खेल रहे भाजपा और संघ के षड्यंत्र को उजागर करने की पुकार है . व्यामोह आत्मकथा नहीं , आर्तनाद है .व्यामोह विकर्ण ( संघ की शाखा के समापन पर स्वयंसेवकों का बिखरना )  की आवाज़ है , स्वयं की कहानी कहने के लिए लेखक ने आत्मकथा जैसी विधा को पसंद किया है . वर्ष 1980 से 2018 के बीच दलितों ने क्या सहन किया ? क्या खोया और क्या पाया ? इसका पूरा कच्चा चिट्ठा आपको व्यामोह में मिल जायेगा. दलित और आदिवासी समाज को मूलचंद जैसे अनेक विकर्णो की ज़रूरत है .”


राणा संघ में क्यों गये ? अकसर यह सवाल लोग पूछते हैं कि ऐसी क्या बात है जिससे प्रभावित हो कर लोग संघी हो जाते हैं ? इसका कोई एक जवाब नहीं हो सकता है , पर अधिकांश लोग बताते हैं कि वे अपने बचपन अथवा किशोर पन में खेलने कूदने के लिए आरएसएस की शाखा में जाने लगे थे . लगभग ऐसा ही मूलचंद राणा के साथ भी हुआ , बचपन में ही उनको ऐसा अवसर मिल गया कि खेलने के लालच में शाखा के शिकार हो गए , उनके अनुसार “ मेरा संघ में प्रवेश किसी हिंदू विचारधारा से प्रेरित नहीं था , पर मैं एक ख़ाली स्लेट जैसा तरुण शाखा के सार्वजनिक मैदान में प्रविष्ट हो कर धीरे धीरे हिंदू विचार धारा का अंग बन रहा था “ न संघ के असली उद्देश्य से परिचय , न उसके एजेंडे का भान , बस राष्ट्र सेवा करने वाली महान संस्था संघ , उनकी यही समझ बन रही थी , राणा लिखते हैं -“ मेरे लिए संघ यानी खुले मैदान में लगने वाली शाखा और उसके स्वयंसेवकों द्वारा प्राकृतिक आपदा के समय किया जाने वाला सेवा का काम था “ सबको संघ शुरू शुरू में यही आभास कराता है और आज भी उसका यही दावा है कि वह विश्व का सबसे बड़ा सामाजिक सांस्कृतिक संगठन है !


राणा संघ की प्रथम वर्ष की ट्रेनिंग हेतु पैसा जुटाने के लिए ओर्गेनाइजर, पाँचजन्य और साधना जैसी पत्रिकाओं के वितरण व विपणन का काम भी करते हैं , वे बताते हैं कि “ इसका बड़ा फ़ायदा मुझे यह हुआ कि ये सभी साप्ताहिक मुझे निशुल्क पढ़ने को मिल जाते थे , जिससे मेरी संघ के प्रति जो सोच थी , उसे बल मिला “ इससे समझा जा सकता है कि साहित्य विचारधारा के निर्माण और उसके सशक्तीकरण में किस तरह प्रमुख भूमिका अदा करता हैं . इसी तरह किसी भी संगठन के लिए शिक्षण प्रशिक्षण कितना ज़रूरी होता है , इसका भी एक उदाहरण राणा अपनी कहानी में पेश करते हैं -“ वर्ष 2006 में संघ शिक्षा वर्ग में शिविर के अधिकारी के रूप में बीस दिन के लिए गोधरा में रहने का अवसर मिला , तब मुझे अहसास हुआ कि यह बीस दिनों की प्रवचन शृंखला एक साधारण स्वयं सेवक को नख शिख (सिर से लेकर पैर तक ) हिंदू में परिवर्तित कर देती है . जो स्वयं सेवक इस शिविर से बाहर निकलता है , वह किसी ग़ैर हिंदू को अर्थात् मुस्लिम व ईसाई को राष्ट्र विरोधी के रूप में देखने लगता है “ यह है ब्रेन वाश जो आरएसएस करता है , लेकिन संस्कार , राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के नाम पर.


मूलचंद राणा संघ के कट्टर स्वयंसेवक रहे , उनकी आस्था गुरु गोलवलकर से लेकर देवरस और भागवत तक पहुँची , लेकिन ऐसे कईं मौक़े आये, जिससे वे व्यामोह की स्थिति में फँसे और अंतत: मोहभंग का क्षण आया तो वे कहने को विवश हुये कि -“ मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि आज संघ में बहती गंगा में हाथ धोने वाले लोगों की संख्या बढ़ी है . संघ का नाम लेकर काम निकलवाने , सरकार में अपना वर्चस्व बनाए रखने और प्रशासन में अपनी बात मनवाने के लिए स्वयं को संघी बताने वालों को भी ख़ूब देखा है , संघ के भीतर बहुत सारे झूठे समरसतावादी और मक्कार राष्ट्रवादी लोग घुस गये है .” राणा यह भी स्वीकार करते हैं कि ‘नब्बे के दशक तक तो संघ के शब्दकोश में समरसता जैसा कोई शब्द था ही नहीं’. पर अब तो ख़ूब प्रचलन में है , समरसता का राष्ट्रीय मंच बन गया है .वे लिखते हैं कि -“ समरसता शब्द आज संघ में पाखंड का पर्याय बन गया है . समरसता शब्द एक निश्चित वेग के लिए मज़ाक़ बन कर रह गया है .”


मूलचंद राणा अपनी इस किताब में बहुत सारे खुलासे करते हैं तो बहुत सी स्वीकारोक्तियाँ भी . वे बताते हैं कि गुजरात के आरक्षण विरोधी दंगों में संघ के स्वयंसेवक शामिल थे. वे यह भी बताते है कि डरबन कांफ्रेंस के समय किस तरह से भाजपा और संघ ने दलित बुद्धिजीवियों का दलित मानव अधिकारवादी एक्टिविस्टों की आवाज़ को दबाने के लिए किया, उनको भी भेजा जाना था, पर उन्होंने जाने से साफ़ इंकार कर दिया .इसके अलावा दलित अत्याचार के मामलों में संघ की चुप्पी और दलित अधिकारी कर्मचारियों के साथ दुर्भावना की बातें वे उठाते हैं . राणा लिखते हैं कि संघ के लोग संविधान प्रदत्त आरक्षण के भी ख़िलाफ़ हैं , इसके सबूत में वे संघी पत्रिका साधना में प्रकाशित एक आलेख का प्रत्युत्तर प्रस्तुत करके देते हैं .उनका तो यहाँ तक कहना है कि मैने क़रीब तीस दलित उत्पीड़ितों के गाँवों का दौरा कर यह जाना कि भाजपा सरकार ने अनुसूचित जाति , जनजाति अधिनियम को पूरी तरह से ख़त्म कर दिया है.


मूलचंद राणा अपनी किताब व्यामोह में आरएसएस से कईं सवाल पूछते हैं और उसको जातिवादी करार देते हैं , वे लिखते है -“ संघ में जाति व्यवस्था को बनाए रखने का आरोप लगाया जाता है जो की आज भी उसी तरह बरक़रार है . शुरुआती वर्षों में इस प्रकार का आरोप मेरे लिए भी हास्यास्पद था , जिसका कारण यह हो सकता है कि उस समय मैं संघ की कार्य संरचना के ऊपरी क्षेत्रों तक नहीं पहुँच पाया था ,बेशक संघ के विभिन्न ट्रस्टों , प्रकाशनों आदि में एक भी दलित आदिवासी स्वयंसेवक नहीं था , तब मैं वहाँ मौजूद जाति व्यवस्था की गंध को सूंघ पाया . मैने जातिवाद संघ की समन्वयन सद्भावना बैठकों में भी देखा और यह भी देखा कि जैसे ही मैने दलितों के साथ होने वाले भेदभाव व अत्याचार के मसले उठाने शुरू किये, उन्होंने यह कहकर ध्यान देना बंद कर दिया कि मूलचंद भाई में वैचारिक बदलाव आ गया है.


मूलचंद राणा की किताब व्यामोह संघ के माया मोह में फँसे दलितों का जीवंत चित्रण प्रस्तुत करती है , वहाँ की घुटन , हानि लाभ की क़समकश और कुंठाओं की कहानी बयान करती है .कुल मिलाकर यह आत्म व्यथा भी है और आत्म कथा भी , यह पश्चाताप की प्रति ध्वनि भी है .अब मूलचंद राणा एक स्वतंत्र और मुखर आवाज़ है , पर दोनों तरफ़ के निशाने पर है . दलित सामाजिक कार्यकर्ता उनको शक की निगाह से देखते है और पूर्व संघी होने के नाते गरियाते हैं , वहीं भाजपा संघ के लोग तो उनके तीक्ष्ण आलोचक बन ही चुके है .लगभग आधी सदी तक संघ में रहे एक दलित स्वयंसेवक की इस आपबीती को पढ़कर संघ की वास्तविकता का पता तो चलता ही है.

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