होना चाहिये था यह, ला दिये नये कृषि कानून !

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(श्याम सुन्दर बैरवा)
आज देशव्यापी किसान आंदोलन को चलते डेढ़ महीना होने जा रहा है, लेकिन मजाल कि तथाकथित ’किसान हितैषी सरकार’ ने कोई कड़ा फैसला लिया हो। जुमले पर जुमले हैं!! किसान कड़कड़ाती ठण्ड में सब कुछ छोड़कर धरने पर बैठने को मजबूर हैं और सरकार को अपने चहेते उद्योगपतियों के भले की पड़ी है। सरकार ने जो तीन कानून पास किये हैं उनसे होने वाले हानि-लाभ के साथ-साथ यह भी देखते हैं कि आखिर किसानों को चाहिये क्या था ?


हाल ही में सरकार द्वारा पास किये गये तथाकथित ’किसान हितैषी कानून’ ये हैं-

1. उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) कानून 2020, जिसके अनुसार किसान अपनी उपज कहीं पर भी, मण्डी में अथवा मण्डी के बाहर बेच सकता हैं। मण्डी में  टेक्स देना होता है, बाहर टेक्स नहीं देना होगा,2. आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून 2020, जिसके अनुसार कोई भी व्यापारी जितना चाहे उतना फसलों को जमा करके रख सकता है, जमा की कोई सीमा नहीं है, और3. कृषि (सशक्तिकरण और संरक्षण) मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा करार कानून 2020, जिसके अनुसार बड़ी-बड़ी कम्पनियां सैंकड़ों एकड़ के कृषि फार्म बना कर उन पर किसानों से खेती करवायेगी।   सरकार की नजरों में ये कानून लाख ही अच्छे हों, लेकिन आम जनता क्या सोचती है, किसानों और देशभर को इनसे क्या-क्या नुकसान होने की संभावनाये हैं, यह अधिक महत्त्वपूर्ण है। सरकार की आंखों पर तो पट्टी बंधी है, जिसके पार उसे आड़ानी और अम्बानी के भले के अलावा कुछ नहीं दीखता है, क्योंकि उनके अहसानों, जो चुनावों के वक्त किये जाते रहे हैं, का कर्ज उतारना है।

लेकिन आम जनता के नुकसान का क्या ? वो इस प्रकार है-

अ. पहले कानून से होने वाले नुकसानः-

1. राज्य सरकारों को मण्डी टेक्स का नुकसान होगा,2. जब मण्डियों में टेक्स देना है और बाहर नहीं देना है तो कोई भी व्यक्ति मण्डियों में खरीद-फरोख्त करेगा ही नही। फलतः मण्डियां बरबाद हो जायेंगी, व्यापारी अपनी बरसों से जमी दुकानें छोड़ेंगे और बेरोजगारी फैलेगी,3. मण्डियों से जुड़े अनेक अन्य व्यवसाय यथा-खाद, बीज, उवर्रक, कीटनाशक, कृषि उपकरण और यहां तक कि चाय-खोमचे की दुकानें, जो मण्डियों में या इनके इर्द- गिर्द होती हैं, मण्डियों के बंद होने की दशा में धीरे-धीरे बंद हो जायेंगी। फलतः देश में बेरोजगारी फैलेगी,4. पल्लेदार, मजदूर, हाथ-ठेले वाले, लारी वाले, टेम्पो, ट्रैक्टर-ट्राॅली, आढ़तिये, बोली लगाने वाले यहां तक कि मण्डियों में बिखरा अनाज समेट कर उससे अपनी जीविका चलाने वाले तक बेरोजगार हो जायेंगे, क्योंकि कृषि उपज बेचने का कोई निश्चत स्थान तो होगा नहीं,5. हर मण्डी में कम से कम एक देवस्थान (मंदिर आदि) अवश्य बना है।

मण्डियों के बंद होने की दशा में वह भी बंद ही हो जायेगा, जिससे कम से कम एक मण्डी पर एक परिवार पुजारी का भी बेरोजगार होगा, 6. ’’किसी भी व्यक्ति को कहीं भी अनाज बेचना’’ एक अनिश्चित शब्द है। यह ठीक उसी तरह है जैसे अध्यापक प्रशिक्षण केंद्रों के जरिये लाखों अध्यापक तैयार कर दिये जायें, सारे विद्यालय बंद कर दिये जाये और उनसे कहें कि देश भर में अशिक्षा बहुत है, विद्यार्थी भी बहुत हैं, चाहे जहां पढ़ा लें। या मेडिकल काॅलेजों के जरिये लाखों डाॅक्टर्स तैयार कर दिये जायें, सारे अस्पताल बंद कर दिये जाये और डाक्टर्स को कहा जाये कि सारे देश भर में मरीज हैं, रोगी हैं, कहीं भी इलाज कर लीजिये।

आखिर ’कहीं भी अनाज बेच लेंगे’ से मतलब क्या है ? क्या किसान गली-मोहल्लों में फेरी लगायेंगे या रोड़ के किनारे बेचेंगे ? फिर कहीं विवाद हो गया तो अदालत के दरवाजे भी बंद है, जैसा कि यह कानून कहता है। इससे अराजकता ही बढ़ेगी,7. मण्डियों व खाद्य निगमों का एक-एक परिसर आज की तारीख में करोड़ों रुपयों का होगा। देश भर में लाखों मण्डियां व निगम होंगे। इस हिसाब से अनुमान लगा सकते हैं कि जब ये वीरान हो जायेंगे, तो सारे देश को कितना नुकसान होगा ? इनमें कुत्तों, सुअरों और असामाजिक तत्वों का जमावड़ा रहेगा, सो अलग। जहां रोड़वेज डिपो बंद हुए हैं, या स्कूल बंद हुए हैं वहां यह प्रत्यक्ष देखा जा सकता है,8. न्यूनतम समथर्न मूल्य नहीं होने की दशा में किसानों को अपनी उपज लेकर सही मूल्य पर बेचने के लिये दर-दर भटकना पड़ेगा।

जब वह देखेगा कि डीजल-भाड़ा और समय खर्च करने पर भी उसे उचित मूल्य नहीं मिल रहा है तो मजबूरन सरकार द्वारा निर्धारित बड़े-बड़े उद्योगपतियों को औने-पौने दाम पर बेचना पड़ेगा, या आत्महत्या करना पड़ेगा। ये उद्योगपति पहले तो खूब दाम देकर फसलें खरीदेंगे, फिर मण्डियों के व प्रतिद्वन्दियों के खत्म हो जाने पर 20 रुपये किलो के गेंहू 5 या 10 रुपये के भाव में खरीदेंगे। किसानों को बेचना ही पड़ेगा, क्योंकि उनके पास विकल्प ही नहीं रहेगा। जिओ का उदाहरण सामने है। इसने शुरुआत में लगभग मुफ्त में सेवा देना शुरु किया था। आज यह सबसे महंगी कम्पनी है। सरकारी आश्रय पाकर सिर्फ यही फल-फूल रही है जबकि सरकारी उदासीनता के चलते बीएसएनएल से लेकर अन्य सभी कम्पनियां बरबाद हो चुकी हैं।   

ब. दूसरे कानून से होने वाले नुकसानः-

1. जमा की सीमा बढ़ाने से किसानों से व्यापारी कम मूल्य पर अथाह फसल खरीदेंगे और उपभोक्ताओं को अधिक मूल्य पर बेचेंगे। इससे किसानों और जनता को नुकसान होगा, मात्र व्यापारियों को ही फायदा होगा।स. तीसरे कानून से होने वाले नुकसानः-1. बड़ी-बड़ी कम्पनियां ही तय करेंगी कि क्या बोया जाये, कब बोया जाये, कैसे बोया जाये और कितने में बेचा जाये ? किसानों का इसमें कोई रोल नहीं होने के कारण वे अपनी ही जमीन पर मालिक नहीं, मात्र मजदूर बन कर रह जायेंगे, 2. बड़ी कम्पनियां स्वयं के भण्डार गृहों (कईयों के बनकर तैयार भी हो चुके हैं) में जिंसों का भण्डारण करके रखेंगी। सरकारी खरीद पद्वति ध्वस्त हो जाने के कारण अकाल, बाढ, भूकम्प या अन्य प्राकृतिक आपदा में सरकार को इनसे ही अनाज आदि खरीदना पड़ेगा। तब ये खूब चांदी कूटेंगे, जिसका सीधा असर जनता पर ही पड़ेगा,3. देश की खाद्य आत्मनिभर्रता, जो कि भारतीय खाद्य निगमों व राज्य सरकार के भण्डार निगमों के भरोसे ही है, वह डगमगा जायेगी और अंततः बंद हो जायेगी।

फिर तो पूरा देश ही चंद उद्योगपतियों के रहम-ओ-करम पर आश्रित हो जायेगा,4. सार्वजनिक वितरण प्रणाली, जो करोडों गरीबों को प्रतिमाह पेट भरने के लिये सस्ते मूल्य पर अनाज, शक्कर व अन्य खाद्य सामग्री उपलब्ध करवाती है, ध्वस्त हो जायेगी और सरकार गरीबों व भूखों को अनाज जैसी योजनाओं से साफ मुकर जायेगी। एक ऐसी व्यवस्था, जो बहुत पुरानी होने के साथ-साथ गांव/मोहल्ले, तहसील, जिले, संभाग व राजधानी तक के स्तर पर आवश्यक सामग्रियों के भण्डारण व वितरण के लिये सुस्थापित है तथा प्राकृतिक आपदाओं व युद्ध के समय आवश्यक भूमिका निभाती है, नष्ट-भ्रष्ट हो जायेगी।       

अब उन सुधारों की चर्चा करते हैं जो वास्तव में किसानों और खेती के भले के लिये होने चाहिये, लेकिन हो नहीं पाये हैं या जिनकी गति धीमी है।1. किसानों व उनकी फसल का न्यूनतम प्रीमियम पर बीमा हो ताकि अकाल, बाढ व अन्य प्रकृतिक आपदा के समय तथा सर्दी, गर्मी, बरसात, जानवर आदि के काटने से अकाल मृत्यु की स्थिति में उसके परिवार को सहारा मिल सके। साथ ही किसानों के कल्याण हेतु संचालित योजनाओं यथा प्रधानमंत्री मानधन योजना, फसल बीमा योजना, किसान क्रेडिट कार्ड, ई-मण्डी आदि का प्रभावी क्रियान्वयन हो,2. हर फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य ग्रेड के अनुसार जिला स्तर पर ही तय हो और इसे तय करने वाली कमेटी में किसानों की संख्या 50 प्रतिशत से अधिक हो। हर फसल का न्यूनतम मूल्य इतना अवश्य हो जिससे फसल की लागत, भाड़ा और किसान की मेहनत निकालने के बाद भी किसान को लाभ हो, ताकि वह सुचारु रूप से घर-परिवार चला सके।

न्यूनतम समर्थन मूल्य में सभी फसलों को शामिल किया जाये व समय-समय पर इसकी समीक्षा भी हो,3. इस बात पर विचार हो कि फसल के समय किसानों से एक-डेढ़ रुपये किलो में खरीदा जाने वाला लहसुन सर्दियों में 150- 200 रुपये किलो में क्यों बेचा जाता है? इसी प्रकार अन्य फसले भी काफी उच्च मूल्य पर क्यों बेची जाती हैं? जिस प्रकार किसानों के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया जाना अनिवार्य है, उसी प्रकार व्यापारियों के लिये अधिकतम बिक्री मूल्य (एम आर पी) हो।4. कालाबाजारियों व जमाखोरों के लिये कड़े दण्ड का प्रवधान हो, 5. ग्राम स्तर पर गोदाम हों जिनमें किसान कुछ समय तक अपनी फसलों को रख सके और अच्छा भाव आने पर बेच सके। इनका किराया न्यूनतम हो,6. मण्डियों में किसानों की फसल की बिक्री की प्रक्रिया त्वरित हो, उनको अधिक इन्तजार नहीं करना पड़े और राशि का भुगतान भी तुरन्त ही हो।

साथ ही ग्रेडिंग के आधार पर फसल खरीदने से मना नहीं होना चाहिये,7. मण्डियों में किसानों की फसल के भण्डरण की उचित व्यवस्था हो। वह बरसात में नहीं भीगे साथ ही आग व जानवरों से अनावश्यक नष्ट भी न हो। विवाद की स्थिति में अदालत जाने की मनाही न हो,8. किसानों को न्यूनतम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध हो, ऋण जमा कराने की व्यवस्था आसान हो,9. गांवों से मण्डियों तक सड़क व्यवस्था अच्छी हो,10. कॉर्पोरेट खेती के स्थान पर सहकारी खेती को बढ़ावा दिये जाने पर विचार किया जा सकता है। यदि किसी गांव में 100 किसान हों और उनकी जमीनें पास-पास हों तो सारी जमीनों के नक्शों को सुरक्षित रखने के बाद सारी जमीन को एक ही खेत बनाकर खेती हो सकती हैै।

फिर लाभांश का बंटवारा जमीन के अनुपात, गुणवत्ता, किसान की मेहनत आदि के आधार पर किया जा सकता है,11. किसानों के बच्चों को फीस आदि में विशेष छूट मिले, या समुचित छात्रवृत्ति मिले,12. खेती योग्य जमीन पर आवासीय भूखण्ड नहीं काटे जायें। आवासीय भूखण्ड बंजर जमीन या उद्योगों की बेकार पड़ी जमीन पर ही काटे जायें। इसी प्रकार रोड़ व रेल्वे लाईन निकालते समय भी कम से कम खेती की जमीन व अधिकतम बंजर जमीन ली जाये,13. जमीन की गुणवत्ता के अनुसार फसल बोने का चलन बढ़े,14. किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिये बाड़ी (सब्जियां आदि), पशुपालन, डेयरी, भोजन प्रसंस्करण, छोटा-मोटा व्यापार, स्थानीय उत्पाद, कारपेण्टरी, रस्सी बंटाई आदि को प्रौत्साहित किया जा सकता है,15. किसानों का डेटा बेस तैयार हो, जिसके माध्यम से यह तय हो सके कि कौनसा किसान किस-किस योजना के लिये पात्रता रखता है, ताकि उसे उसी योजना का लाभ दिया जा सके। इसका नवीनतम उदाहरण प्रधानमंत्री किसान मानधन योजना है,16. सिंचाई परियोजनाओं व विद्युत आपूर्ति पर ध्यान दिया जाये, ताकि जहां सिंचाई के अभाव में फसले सूखती हैं, उनको समय पर पानी दिया जा सके और जहां विद्युत के अभाव में सिंचाई नहीं हो पाती, वहां विद्युत की पर्याप्त व्यवस्था हो सके। किसानों को मांग के हिसाब से कृषि कनेक्शन दिये जाने चाहिये।

किसानों को रात में ही नहीं, दिन में भी बिजली दी जाये, ताकि वे दिन में भी सिंचाई कर सकें। इस प्रकार किसानों के जीवन स्तर को सुधारा जा सकता है।      एच जी वेल्स की कहानियों में अधिकतर कल्पनायें ही थीं, लेकिन उनमें से कई कल्पनायें कालान्तर में सत्य साबित हुई।ये कल्पनायें भी एक दिन इसी प्रकार सही साबित हों और किसानों का जीवन और सुखी हो.

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