रचना होगा अपना साहित्य, लिखना होगा अपना इतिहास !

45

( नवल किशोर कुमार )
इतिहास सचमुच में बेहद दिलचस्प विषय है। यह एक विज्ञान की तरह है। इसमें भी न्यूटन के गति के नियमों की तरह सिद्धांत हैं। कोई भी क्रिया तबतक नहीं होती जबतक की न जाय। भारत का इतिहास जरा अलग है। असल में विज्ञान के मामले में भारत बहुत पिछड़ा हुआ देश रहा है। यही वजह है कि यहां इतिहास के नाम पर राजाओं का इतिहास थोप दिया गया है। इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि भारत में इतिहास का मतलब केवल विजेताओं का इतिहास है। जिस तरह की व्यवस्था समाज में है, वैसी ही व्यवस्था इतिहास में भी की गई है। हाशिए पर रहने वालों का कोई इतिहास नहीं है। 


लेकिन अब हालात बदले हैं। जो हाशिए पर थे, अब इतिहास से सवाल करने लगे हैं। फिर चाहे वह भीमा-कोरेगांव का इतिहास हो या फिर रेजांगला का। हाशिए का समाज अपने इतिहास की टोह ले रहा है। यह आश्चर्यजनक नहीं है। असल में यह सदियों के शोषण व उत्पीड़न का परिणाम है। द्विज चाहें तो यह कहकर भी मजाक उड़ा सकते हैं कि जिनके पास जंगल नहीं होता, वे रेंड़ी के पेड़ को भी पेड़ ही मानते हैं। यह सच भी है। भारतीय द्विजों द्वारा लिखित इतिहास में वंचितों के लिए कुछ भी नहीं है। ऐसे में जब कभी कोई भीमा-कोरेगांव या फिर रेजांगला सामने आता है तो वंचित समाज के लोग उत्साहित हो जाते हैं।


परंतु, मुझे लगता है कि हमें बेसब्र नहीं होना चाहिए। हमें निर्णय लेना होगा कि हमें द्विजों के इतिहास में ही अपना इतिहास खोजना है या फिर हमें नया इतिहास गढ़ना है। यह हमपर निर्भर करता है कि हम क्या सोचते हैं।
रेजांगला का इतिहास क्या है, इस विषय पर चर्चा के पहले हमें कुछ और विषयों पर बातचीत करनी होगी। मसलन, यह कि हमारा इतिहास क्या है। क्या हमारा इतिहास वही है जो द्विज इतिहासकारों ने लिख रखा है? मुझे लगता है कि हमारा इतिहास लिखित से अधिक मौखिक रूप में हमारे बीच मौजूद है जिसे लोकगाथा कहकर द्विज खारिज कर देते हैं। जबकि खारिज करने योग्य उनका इतिहास है जो कपोल-कल्पित है। जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने राम को मान्यता दी है, उससे यह तो साफ हो गया है कि इसे भी इतिहास के एक पाठ का हिस्सा बनया जाएगा। मतलब यह कि हमारा शानदार अतीत लोकगाथा और उनका काल्पनिक गद्य इतिहास।


कल की बात है। एक लेख को संपादित करने के क्रम में यह सवाल मेरे सामने आया। क्या बुद्ध वापस अपने घर गए थे? लेखक ने यही लिखा कि करीब 17 साल के बाद बुद्ध अपने घर वापस लौटे थे। चूंकि इसका संदर्भ लेखक ने दिया नहीं था, इसलिए यकीन नहीं हो पा रहा था। फिर बिहार के वरिष्ठ बहुजन चिंतक व साहित्यकार प्रेमकुमार मणि से पूछा तो उन्होंने इसकी पुष्टि की।
असल में विज्ञान यही सिखाता है। किसी भी बात पर तबतक यकीन मत करो जबतक कि उसकी सच्चाई सामने न हो। मणि जी ने संदर्भ सहित इसकी व्याख्या की। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि बुद्ध के अपने घर लौटने के पीछे का कारण स्पष्ट रूप से उल्लेखित नहीं है। 
कल दोपहर में वीर लोरिक पर केंद्रित एक लेख पढ़ने को मिला। लेखक ने अपना अधूरा लेख भेजा है। उन्होंने मुझसे राय मांगी है। उनका कहना है कि लोरिक का अपना इतिहास रहा है, जिसे लोकगाथा कहकर खारिज किया जा चुका है। वे इस संबंध में संदर्भ भी देते हैं। हालांकि अधिकांश संदर्भ उनके द्वारा आंखन-देखी स्थल हैं। असल में समय आ गया है जब मौखिक इतिहास को इतिहास के रूप में दर्ज किया जाय।


मैं अपनी बात कहूं तो मुझे वीर लोरिक और महिषासुर दोनों मिथक से अधिक इतिहास पुरूष लगते हैं। इन दोनों में अनेक समानताएं हैं। यह तो साफ है कि महिषासुर को दुर्गा ने छल से मारा। इस संबंध में कई कहानियां हैं। लेकिन मुझे आज भी सोचकर हैरानी होती है कि द्रविड़ शासक की हत्या के लिए किसी आर्य कन्या को दुल्हन क्यों बनना पड़ा। कमाल की बात यह भी कि लोरिक की मौत के पीछे भी दुर्गा ही थी। प्रसंग कुछ ऐसा है कि लोरिक बहुत बहादुर थे और ताकतवर भी थे। इसके बावजूद वे किसान थे। एक बार खेत जोत रहे थे। उनकी इच्छा हुई कि क्यों न बैल की बजाय हाथी का उपयोग किया जाय। प्रसंग के मुताबिक, लोरिक ने यही किया और सारे देवता घबरा गए। उन्हें चिंता हुई कि यह लोरिक तो सारी मान्यताओं को खत्म कर देगा। एक तो राजा होकर खेती करता है और उपर से बैल की बजाय हाथी से खेत जोतता है। 


साहित्य में कई बातें बिंबों के सहारे कह दी जाती हैं। मुझे लगता है कि लोरिक ने हाथी के बजाय किसी द्विज राजा को पकड़कर बैल की तरह जोत दिया होगा। यदि ऐसा नहीं होता तो दिजगण नहीं घबाराते। 
खैर, प्रसंग के मुताबिक, लोरिक द्वारा हाथी से खेत जोतते देख देवता बेचैन हो गए। उन्हें उनकी सत्ता जाती दिखी। उन्होंने दुर्गा को भेजा। प्रसंग तो यह भी कहता है कि लोरिक दुर्गा का भक्त था। हालांकि मैं इसकी व्याख्या दूसरे रूप में करता हूं। भक्त का मतलब केवल आराधक नहीं होता। मैं भी भक्त हूं अपनी प्रेमिका का। जब आप किसी से प्रेम करते हैं तो यह एक तरह की भक्ति ही होती है। आपको अपने प्रेमी/प्रेमिका की बात पर यकीन होता है। इश्क में तो आदमी दिन को रात और रात को दिन मानने लगता है। फिर लोरिक भी ऐसे ही रहे होंगे।


प्रसंग में कहा गया है कि लोरिक को रोकने की जिम्मेदारी दुर्गा को दी गई। वह लोरिक के पास गयी। लोरिक ने उसके साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की और उसी वक्त दुर्गा ने लोरिक को मार डाला। ठीक वैसे ही जैसे महिषासुर वध के प्रसंग में होता है।
दरअसल, उपरोक्त प्रसंग मौखिक है। कहीं लिखित होता तो लोरिका का इतिहास होता। लेकिन लिखता कौन? ज्ञान पर तो द्विजों का अधिकार था और द्विज दुर्गा और लोरिक की प्रेम कहानी भला कैसे लिखते। ठीक वैसे ही जैसे दुसाध राजा चौहरमल और भूमिहार समाज की सुंदर कन्या रेशमा का प्रेममय इतिहास लोकगाथा है।


खैर, मैं रेजांगला की बात कर रहा था। 18 नवंबर 1962 को लद्दाख की दुर्गम बर्फीली चोटी पर भारतीय सैनिकों और चीनी सैनिकों के बीच लड़ाई हुई। भारतीय सैनिकों में 13, कुमाऊं बटालियन के 124 जवान थे। इनमें सभी अहीरवाल थे। कुछ लोग इन्हें यादव जाति का बता रहे हैं। लड़ाई में चीन के करीब 1400 जवान और 114 भारतीय जवान मारे गए। यह लड़ाई भारतीय सैनिकों ने जीती। कुछ लोग भारतीय सेना के इस प्रदर्शन को यादवों के शौर्य से जोड़ रहे हैं। इसके आधार पर वे अहीर रेजिमेंट बनाने की मांग कर रहे हैं। 


मैं उनकी मांगों को गलत नहीं मानता। लेकिन यह तर्कपूर्ण नहीं है। मुझे लगता है कि यादव ही नहीं, सभी कृषक जातियां और वंचित समाज के लोग सीमा पर लड़ने का काम द्विजों को दे दें। बहुसंख्यक बहुजन समाज ज्ञान और विज्ञान के क्षेत्र में आगे बढ़े। ज्ञान-विज्ञान रहेगा तो भौगोलिक और राजनीतिक सत्ता हासिल करना कोई बड़ी बात नहीं।
कल एक कविता जेहन में आयी। इसकी पृष्ठभूमि में कविताएं हैं। कविताएं मतलब साहित्य। हमारा साहित्य कैसा हो, हमारा इतिहास कैसा हो, यह तय करने का अधिकार हमारा है। हम बहुसंख्यक बहुजनों का है।


कविता : कुछ कविताएं लगाती हैं इंकलाब जिंदाबाद का नारा / नवल किशोर कुमार
अंत सुखांत हो या फिर हो दुखांत,कई बार कविताएं तय नहीं कर पातींबाजदफा कविताओं के पास नहीं होतायह सोचने का अधिकारउन्हें बस बन जाना होता है बिंबों का समुच्चय।
कई बार कुछ कविताएं दिखाती हैं साहसलगाने लगती हैं इंकलाब जिंदाबाद का नाराकुछ होती हैं इतनी जिद्दी किशासक का तोप उन्हें डरा नहीं पाता।
कुछ कविताओं में आयातित होते हैं बिंबउनका भावार्थ शब्दकोश में लिखा होता हैकई बार कविताओं में होता है शब्दों के बदले खूनऔर इतिहास उन्हें याद करने से डरता है।
हां, कुछ कविताएं सुन पूंजीवाद ठहाके लगाता हैतो कुछ को सूली पर लटकवाता है।

(लेखक फ़ॉरवर्ड प्रेस हिंदी के सम्पादक है)

Leave A Reply

Your email address will not be published.