उन घरों में दीया कब जलेगा जहां सदियों से अंधेरा हैं ?

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कोरोना के इस संकट में सुरक्षा सुविधाओं की कमी के बावजूद देवदूत बनकर कोरोना वॉरियर्स अपनी जान को जोखिम में डालकर रात दिन काम कर रहे हैं. मेडिकल टीम, पुलिस, प्रशासन व सफाई कामगार साथी मानवता की बेमिसाल सेवा कर रहे हैं.
दूसरी ओर ओलावृष्टि से किसानों व शहरों से पलायन कर गए गरीब मेहनतकश मजदूर व बेघर लोग दोहरी मार झेल रहे हैं. भूख व भय के कारण चारों ओर त्राहि-त्राहि है.

ऐसे संकट के दौर में देश के मुखिया द्वारा पहले ताली थाली तो अब दिए जलाने का झुनझुना पकड़ा कर इस त्रासदी को झेल रही जनता का उपहास किया है. यह उमंग, उल्लास व उत्सव का समय नहीं है.
आखिर उन शोषितों, वंचितों, उपेक्षितों के घरों में दिए कब जलेंगे जहां सदियों से अंधेरा है? जहां सदियों से अज्ञान, अशिक्षा, गुलामी व गरीबी का अंधेरा है. जिन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य, ज्ञान व समृद्धि के उजाले से वंचित कर हाशिये पर पटक दिया गया.
तर्क, विवेक, विज्ञान की सरेआम धज्जियां उड़ा कर मुश्किल दौर की समीक्षा, कोरोना को हराने की ठोस योजना की बजाए ताली, थाली, मोमबत्ती के टोटकों से देश की जनता का मनोबल कैसे बढेगा? ऐसे तमाशों से कैसे हमारे वॉरियर्स को मदद मिलेगी ?
ऐसे बेतुके टोटकों के कारण ही गांवों में इन दिनों चंद्रमा उल्टा दिखना, दरवाजों पर मेंहदी की हथेलियां बनाना, पत्थर के नंदी को पानी पिलाना, निंबू मिर्ची लटकाना जैसे अंधविश्वास फिर से फलफूल रहे हैं.
सबका मंगल हो….. सभी निरोगी हो
(डॉ .एम.एल.परिहार से साभार )

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