क्या ट्वीट है न्याय का नया तरीका !

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राजस्थान प्रदेश दलित अत्याचार का केन्द्र बन गया है, आये दिन एक के बाद एक गम्भीर घटनाएं सामने आ रही है, लेकिन सरकार बस ट्वीट करके घटनाओं से पल्ला झाड़ लेती है, क्या ट्वीट से पीड़ितों को न्याय मिल जाता है ? 


ऐसा क्यों हो रहा है ? क्यों लोगों की जातिवादी मानसिकता इतनी उबाल पर है ? क्यों लोगों में कानून का डर धीरे-धीरे कम हो रहा है ? पुलिस प्रशासन की लापरवाही का जिम्मेदार कौन ? इस पर सरकारों को बहुत काम करने की ज़रूरत है। लेकिन सरकारे इस पर कुछ नही करती बस ट्वीट करती है।

नागौर में जिस घटना को आरोपियों द्वारा अंजाम दिया गया, उस तरह का कृत्य तो जानवरों के साथ भी नही किया जाता है। चोरी के शक मात्र पर किस तरह की बर्बरता पूर्ण हरकत को अंजाम दिया गया, घटना के चार दिन बाद वीडियो वायरल होने पर मीडिया, राजस्थान सरकार, प्रशासन को पता चला। सरकारों को अपनी जवाबदारी तय करनी पड़ेगी। ट्वीट मात्र और जांच टीम भेजने से कुछ नया नही होगा।

इस इंटरनेट और सोशल मीडिया के जमाने में सूचना चार दिन बाद फैली, क्योंकि घटना किसी दलित के साथ हुई इसलिए यह तत्कालीन सेवा भी भेदभाव का शिकार हो गई। 

नागौर घटना के बाद बाड़मेर जिले में एक और इसी तरह की घटना सामने आई है। जैसलमेर से एक और वीडियो वायरल हो रहा है, वीडियो में तीन दलित युवकों को चोरी के शक मात्र पर बेहरमी से पीटा जा रहा है। राजस्थान में सीरियल दलित अत्याचारों की घटनाएं सामने आ रही है।

राजस्थान में अत्याचार कम होने का नाम नही ले रहे है, आए दिन अलग – अलग गम्भीर घटनाएं सामने आ रही है और सरकार बस ट्वीट कर रही है। सवाल यह है कि ट्वीट से न्याय मिल जाएगा क्या ?


– ललित मेघवंशी (छात्र – हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, जयपुर )

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