सत्य और संघर्ष से बनी व्यास की आत्मकथा

62

-डॉ विशाल विक्रम सिंह 

जयपुर। कथेतर लेखन अब भारतीय साहित्य की मुख्य धारा है जिसमें हमारे युग की सच्चाई बोल रही है। कवि-लेखक डॉ सत्यनारायण व्यास की आत्मकथा ‘क्या कहूं आज’ केवल साधारण मनुष्य की सच्चाई और संघर्ष की दास्तान नहीं है बल्कि इसमें लंबे दौर के जीवन अनुभवों को देखा जा सकता है। वरिष्ठ आलोचक और साहित्यकार डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने उक्त विचार राजस्थान विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा आयोजित विमोचन समारोह में व्यक्त किए। डॉ अग्रवाल ने कहा कि महाविद्यालयी शिक्षक के खरे अनुभव भी इस आत्मकथा को विशिष्ट बनाते हैं। 

vimochan

समारोह में दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी अध्यापक और बनास जन के संपादक पल्लव ने आत्मकथा की कसौटियों की चर्चा करते हुए कहा कि हिंदी में कथेतर लेखन की व्यापकता से साहित्य में लोकतंत्र की वृद्धि हुई है। उन्होंने व्यास के जीवन संघर्ष की सच्चाई को होरी के स्वप्न से जोड़ा। पल्लव ने कहा कि आत्म स्वीकार की उदात्तता और प्रांजल गद्य के सहकार से यह कृति पठनीय बन गई है। राजस्थान विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में सहायक आचार्य जगदीश गिरी ने इस आत्मकथा के महत्त्वपूर्ण प्रसंगों को सुनाते हुए कहा कि इसमें निजी संवादों में आए राजस्थानी के अनेक वाक्यों को जस का तस पढ़ना डॉ व्यास की लेखनी का कौशल है। उन्होंने पुस्तक में आए बचपन, कोर्ट कचहरी और दैनंदिन कामकाज के संघर्ष के दृश्यों की भी सराहना की। 

मुख्य अतिथि महाराजा कालेज के पूर्व प्राचार्य प्रो एस के मिश्र ने कहा कि रसायन शास्त्र के विद्यार्थी होने पर भी वे साहित्य की इस कृति को मिलते ही पढ़ गए। प्रो मिश्र ने एक अध्यापक के रूप में डॉ व्यास की निष्ठा और प्रतिबद्धता को अनुकरणीय बताते हुए कहा कि इस बात पर भी शोध होना चाहिए कि कालेज में प्रवेश ले लेने के बाद भी कक्षाओं में विद्यार्थी क्यों नहीं आते। समारोह में वरिष्ठ आलोचक मोहन श्रोत्रिय, सुपरिचित कवि नन्द भारद्वाज, विख्यात कवि चिंतक सदाशिव श्रोत्रिय, श्रीमती चंद्रकांता व्यास ने भी कृति के सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त किए। लेखकीय वक्तव्य में डॉ व्यास ने कहा कि स्वाभिमान और संघर्ष से पीछे न हटने की प्रवृत्ति के संस्कार उन्हें अपनी मां से मिले।lekhak


विभाग की अध्यक्ष डॉ श्रुति शर्मा ने सभी अतिथियों का स्वागत किया और डॉ व्यास का शाल ओढ़ाकर अभिनन्दन किया। संयोजन कर रही विभाग की डा तारावती मीणा ने कृति के मुख्य अंशों का वाचन किया। समारोह में नगर के जाने माने लेखक डॉ हेतु भारद्वाज, हरीश करमचंदानी, शैलेन्द्र चौहान, राघवेन्द्र रावत, संदीप मील, राजस्थान लेखा सेवा के हरीश लड्ढा सहित बड़ी संख्या में शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित थे। अंत में विभाग की तरफ से डॉ उर्वशी शर्मा ने आभार व्यक्त किया।

Leave A Reply

Your email address will not be published.