वाल्मीकीकरण बनाम हिन्दूकरण

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पंजाब हरियाणा क्षेत्रों में चुहड़ा जाति के लोग बालाशाह एवं लालबेग को अपना धर्म गुरु मानते थे। ये मांसाहारी थे। राम तथा कृष्ण की पूजा नहीं करते थे। गोमांस एवं सूअर मांस खाते थे ये लोग सूअर और बकरे की बलि देते थे। मुर्दों को बगली कब्र बनाकर दफनाते थे।ये लोग ढाई ईंट का स्तूप ‘थानो’ बनाकर लालवेग की इबादत करते थे और कुर्सीनामा का पाठ करते थे। कुर्सीनामा “वाइस्मे अल्लाह अल रहमान अल रहीम” से शुरू होते थे और “रब्बुल आलमीन बोलो मोमिनो वही एक” पर खत्म होते थे।

कुर्सीनामा शायद इनका धर्मग्रन्थ था। उनका धर्म एक स्वतन्त्र धर्म था और उस धर्म में धर्मान्तरण की प्रथा थी। जो उनका धर्म ग्रहण करना चाहता था उसे कड़ी आजमाइश देनी पड़ती थी ये लोग सफाई पेशे में कैसे लगे यह कहना कठिन है। किन्तु ईसाई धर्म अपनाने पर एक व्यक्ति के लिए उन्नति और प्रगति के दरवाजे खुल जाते थे, जो हिन्दुओं को धर्मान्तरण से बड़ा नुकसान था।इनकी जनसंख्या घटती रही थी। पैखाने साफ करने, कूड़ा उठाने का गन्दा काम करनेवाले में कमी आ रही थी।


पहले तो गन्दे पेशे के कारण इन्हें न हिन्दू न ही मुसलमान स्वीकार करते थे, किन्तु धर्मान्तरण शुरू होने से हिन्दुओं के कान खड़े हो गए । इन्हें उक्त नुकसान का डर सताने लगा। क्योंकि ये लोग धर्मान्तरण पश्चात गन्दा पेशा छोड़ देते थे। हिन्दू जो कल तक उन्हें अपनाने को तैयार नहीं थे, इनके हिन्दुकरण एवं ‘चुहड़ा’ को चुहड़ा बनाए रखने के लिए हर तरकीब करने लगे। हिन्दुओं के पास धनबल, नेतृत्व बल था। वे दूरदर्शी थे हिन्दुओं ने प्रचार शुरू किया कि तुम हिन्दू हो। बालाशाह बबरीद आदि को वाल्मीकी बनाया गया। इन पर पुस्तकें लिखी गई इन्हें गोमांस न खाने पर राजी किया गया। अपने खर्चे से लाल बेग के स्तूप की जगह मन्दिर बनाए जाने लगे। कुर्सी नामों की जगह रामायण का पाठ करवाया जाने लगा ।

हिन्दूकरण को गति देने के लिए एक ब्राह्मण अमीचन्द्र ने एक पुस्तक लिखी ‘वाल्मीकि प्रकाश’ जिसमें इस बात को जोर देकर लिखा गया कि भंगी या चूहड़ा वाल्मीकी वंशज नहीं अनुयायी है। जाति नाम वाल्मीकी अधिक लोकप्रिय हो गया। सन् 1931 में इसे सरकारी स्वीकृति मिल गई । यद्यपि पंजाब क्षेत्र के बाहर के भंगी जातियों धानुक, डोम, डुमार, राउत, डाड़ी, मखियार, हेला आदि वाल्मीकी नहीं बने पर इन पर हिन्दुओं  का प्रभाव बढ़ने लगा। ये लोग भी उच्च हिन्दुओं की नकल करने लगे। इसी हिन्दूकरण के दौरान पहचान बनाने के लिए इन जातियों ने वाल्मीकी के तर्ज में एक-एक सन्त ढूँढ निकाला और उन्हें अपना गुरु बनाने लगे कई संगठन इस नाम से तैयार हो गए। जैसे सुदर्शन ऋषि, धानुक मुनि, देवक डोम, चरक ऋषि आदि।

इस क्रान्तिकारी स्थिति में जो शक्ति इन्हें अपने विकास, शिक्षा, ज्ञान प्राप्ति के लिए खर्च करनी थी उसे इन ऋषिमुनि एवं हिन्दूकरण में बर्बाद करने लगे, समाज के नेताओं ने अपने समाज के बच्चों को शिक्षा, पढ़ाई, लिखाई की जानकारी न देकर, बड़े धूमधाम से इन सन्तों की जयन्ती मनाने में अपना समय एवं धन खर्च करने लगे इससे सामाजिक संगठन तो बना किन्तु संगठन की दिशा मुड़ गई। ये विकास की ओर न जाकर धार्मिक कर्मकांडों की ओर जाने लगे।


आश्चर्य की बात यह है कि जिस धर्म के कारण उनकी यह दुर्दशा हुई है, दलित आन्दोलनों का लाभ पाकर उन्नति करने के बाद उसी हिन्दू धर्म को अपनाने तथा मजबूत करने में ये लोग लगे हैं। इस प्रकार ये लोग समता एवं अछूत मुक्ति आन्दोलन की लड़ाई से दूर होने लगे .वाल्मीकी कौन थे ? यह प्रश्न एक अलग विषय है किन्तु यह महत्त्वपूर्ण है कि वाल्मीकी ऋषि  का भंगियों से या चूहड़ा से कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध हो, ऐसा कोई तथ्य अब तक नहीं मिला

(पुस्तक अंश -सफाई कामगर समुदाय ,लेखक  -संजीव कुमार खुदशाह,प्रकाशक – राधाकृष्ण प्रकाशन )

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