दो देश : एक संघर्ष

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(सुरेंद्रसिंह शेखावत)
“मेरा दम घुट रहा है ।”यह पंक्ति जॉर्ज फ्लॉयड द्वारा कहे गए अंतिम शब्द “आई कांट ब्रीथ” का अनुवाद है ।  इसी  नाम से अमेरिका में इन दिनों बहुत हिंसक प्रदर्शन हो रहे है । अफ्रीकी अमेरिकी अश्वेत आंदोलनकारी,  बीती 20 मई को मिनेसोटा प्रान्त में एक गोरे अमेंरिकी पुलिस अधिकारी डेरिक द्वारा  जॉर्ज फ्लॉयड को जमीन पर पटककर घुटनों में फंसाकर मार डालने की घटना पर गुस्सा जता रहे है । फ्लॉयड का दोष केवल यही था कि उसकी खाल का रंग डेरिक से भिन्न था और पुलिस को टेलीफोन करने वाले किसी शख्स ने जॉर्ज पर जालसाजी करने का शक मात्र प्रकट किया था और तत्परता दिखाते हुए पुलिस अधिकारी डेरिक ने सड़क पर ही न्याय कर दिया ।


यह घटना 244 साल पहले ब्रिटिश साम्राज्यवादियों से आजाद हो चुके उस देश की है जो अपने को महान और गौरवशाली लोकतांत्रिक मुल्क होने का दावा करता है । इस घटना ने इस  दावों से उलट इस मुल्क के कुरूप चेहरे को उजागर किया है ।


अगस्त 1619 में जहाज में भरकर अमेरिका  लाए गए अश्वेत अफ्रीकी गुलामों के आगमन से अमेरिका में गुलामी की प्रथा शुरू हुई थी  । 20 मई की घटना   सफेद चमड़ी को श्रेष्ठ मानने वाले अमेरिकी लोगों के समूह के चार सौ सालों के शर्मनाक इतिहास की गवाही दे रही है । आज  दुनियां में महाशक्ति होने का दावा करने वाले अमेरिका को बनाने में इन अश्वेत लोगों की भूमिका श्वेत लोगों से कहीं अधिक है ।इन काले गुलामों ने अमेरिकी जमीन को उपजाऊ बनाने से लेकर कल कारखाने चलाने तक अपना पसीना बहाकर अमेरिका को महान होने का गौरव दिलाया।


1776 में आजादी का घोषणापत्र जारी करने वाले महान अमेरिकी संविधान में कहा गया है कि ,  “हम इन सिद्धांतों को स्वयंसिद्ध मानते हैं कि सभी मनुष्य समान पैदा हुए हैं और उन्हें अपने स्रष्टा द्वारा कुछ अविच्छिन्न अधिकार मिले हैं। जीवन, स्वतंत्रता और सुख की खोज इन्हीं अधिकारों में है।” बावजूद इसके इन अश्वेत गुलामों को समानता का दर्जा नहीं मिला। उन्हें अमेरिका की सम्पन्नता के लिए आजादी की घोषणा से बाहर रखा गया क्योंकि तब भी उन्हें नागरिक न मानकर गुलाम माना गया ।अमेरिका के तेहरवें संविधान संशोधन के द्वारा 1865 में गुलामी की प्रथा को कानूनन खत्म कर दिया गया , बावजूद इसके 155 सालों के बाद भी भेदभाव खत्म नहीं हुआ है । अश्वेत बराक ओबामा को अमेरिकी राष्ट्रपति चुन लिए जाने के बावजूद भी श्वेत श्रेष्ठता की मानसिकता आज भी कायम है आज भी अश्वेत लोगों के साथ गैर बराबरी का व्यवहार होता है । 


अमेरिकी पुलिस का बड़ा धड़ा अश्वेतों के प्रति पूर्वाग्रही है , उनके साथ पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाता है उन्हें अपराधी मान पेश आता है । इसको इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि अमेरिका के इसी प्रान्त में कुछ दिन पहले लॉक डाउन का विरोध करने वाले हथियारबन्ध प्रदर्शनकारी फायरिंग करते हुए सरकारी भवनों में घुस गए मगर पुलिस ने उनके साथ सख्ती नहीं बरती और उनके बर्ताव को नजरअंदाज कर दिया जबकि फ्लॉयड की मौत से गुस्साए अश्वेत प्रदर्शनकारियों पर पुलिस न केवल गोलीबारी की वरन इनसे निपटने में बहुत सख्ती दिखाई। यहां तक कि रंगभेद के विचार का प्रतिनिधित्व करने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति के प्रतिक्रिया के  ट्वीट को ट्विटर ने फ्लैग लगाकर हिंसा के महिमा मंडन करने वालों की श्रेणी में डाला है । ट्रम्प ने इस ट्वीट का लब्बोलुआब है कि “लुटिंग होगी तो शूटिंग” होगी ।नतीजा यह निकला कि दुनिया के सबसे ताकतवर आदमी को अपने ही घर में बने बंकर में छिप कर जान बचानी पड़ी ।


अब विश्व के महान लोकतंत्र के मुकाबले विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की तरफ लौटते है । यहां भी असमानता और गैर बराबरी के हालात लगभग वैसे ही है । प्राचीन धार्मिक व्यवस्था में वर्ण व्यवस्था के नाम पर विभक्त किए गए भारतीय समाज के एक बहुत बड़े तबके के साथ अश्वेतों की तरह ही लम्बे समय से भेदभाव होता आया है ।  इंसानी बंटवारे द्वारा तय किए गए बाड़ों में विभक्त समाज में विशेष वर्ग में जन्म लेने वाले इंसान को दूसरे से कमतर समझा जाता है और उसी के आधार पर उसके काम का बंटवारा किया जाता है । चूंकि वह वर्ग चरणबद्धता में निचले क्रम पर आता है इसलिए उसके कर्म को ‘नीच कर्म’  मानते हुए उसे बाकी सब की सेवा का जिम्मा दिया गया है ।


यहां भी आजादी के साथ ही सत्तर बरस पहले छुआछूत को कानूनन खत्म कर दिया गया है । संविधान में कुछ विशेष प्रावधान करके उस तबके को मुख्यधारा में लाने के सरकारी प्रयास किए गए है जिनका असर भी दिखने लगा है परंतु आज भी एक बड़ी आबादी मूलभूत अधिकारों ने न केवल मरहूम है बल्कि समाज में अभी भी  छुआछूत और गैर बराबरी मौजूद है ।


20 मार्च 2018 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार रोकथाम कानून में कुछ बुनियादी बदलाव किए जो वास्तव में उस कानून की मूल भावना को क्षति पहुंचाने वाले थे । इन बदलावों से दलित वर्ग ने भारतीय समाज में अपने को असुरक्षित माना और उनका असन्तोष प्रकट हुआ । 2 अप्रेल 2018 को एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन के रूप में यह दलित असन्तोष प्रकट हुआ । आजाद भारत के सत्तर सालों के इतिहास में यह दलित चेतना का पहला अनोखा उदाहरण था । 


यह आंदोलन बिना किसी राजनीतिक दल के आह्वान पर स्वत् स्फूर्त हुआ जिसमें पहली बार इस स्तर पर दलित चेतना प्रकट हुई । जन्म के आधार पर जातीय श्रेष्ठता का दम्भ भरने वाले समूह के लिए दलितों का अक्षम्य अपराध था ।इससे पहले कभी भी किसी जाति, वर्ग, धर्म के समूह द्वारा किए जाने वाले आंदोलन की घोषणा की इतनी खिलाफत कभी नहीं हुई जितनी इस आंदोलन की । सोशल मीडिया पर आंदोलन के समर्थकों से ज्यादा विरोधियों की धमकियां और चेतावनियां थी । इन धमकियों और चेतावनियों ने आंदोलन समर्थकों में स्वतः ही ऊर्जा का संचार किया और उन्होंने इसे चुनौती के रूप में स्वीकार किया । आंदोलन समर्थकों ने इसे अस्मिता से जोड़ लिया और देश भर में प्रदर्शन हुए । कहीं कहीं ये प्रदर्शन हिंसक भी हो गए तो कहीं जातीय श्रेष्ठता से भरे समूहों से इनका मुकाबला भी हुआ ।


यहां भी पुलिस का रवैया पूर्वाग्रही और पक्षपाती था । राजस्थान के खैरथल में एक आंदोलनकारी महिला की गर्दन पुलिस के जवान ने बूंट से दबाकर उसे गाली देते हुए आरक्षण वहीं दे देने की घोषणा कर दी । इस दिन हुई हिंसा में नौ लोगों की मौत हुई जिनमें अधिक संख्या दलितों की ही थी । अलवर में पुलिस की गोली से एक नौजवान की मौत हुई। पुलिसिया दमन भी हुआ  ।  आंदोलन में शामिल रहे सरकारी कर्मचारियों पर योजनाबद्ध रूप से मुकदमें दर्ज किए गए । यह आंदोलन दलितों की सामाजिक स्थिति में आए बदलाव से दलित चेतना का विस्तार था जो सामूहिक रूप से पहली बार प्रकट हुआ ।


भारत और अमेरिका में रंगभेद विरोधी और छुआछूत विरोधी  आंदोलन में  गांधी और मार्टिन लूथर किंग के रूप में साम्य नजर आता है । गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में अपने असहयोग आंदोलन की शुरुआत भी रंगभेद की नीति के  विरुद्ध ही की थी । उन्हीं गांधी की प्रेरणा से मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने अमेरिका में अहिंसक आंदोलन का नेतृत्व किया ।


भारत में आजादी से पूर्व गांधी ने सामाजिक बदलावों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा और अछूतोद्धार को अपने कार्यक्रम का महत्वपूर्ण अंग बनाया ।   गांधी कहते है कि,”यहां प्रचलित अस्पृश्यता ईश्वर तथा मानवता के प्रति पाप है। ….हिन्दू धर्म के शास्त्रों में कहीं भी इसे स्वीकृति नहीं दी गयी है। मेरे लिए अपने मत के समर्थन में भागवत या मनुस्मृति से कोई उद्धरण देना मुश्किल है, लेकिन मैं यह दावा कर सकता  हूं  कि मैंने हिन्दुत्व की आत्मा को जान लिया है और अस्पृश्यता को प्रश्रय देने वाले लोग पाप के भागी बन रहे हैं। जितनी जल्दी हम इस पाप से छुटकारा नहीं पा लेते, उतना ही हम हिन्दुत्व को विनाश की ओर ले जाएंगे। इसलिए अस्पृश्यता के विनाश में ही हिन्दुत्व का भला है, भारत का भला है और मानवता का भला है। ’’ गांधी आगे कहते है कि,”मेरा मानना है कि हिन्दुत्व में अस्पृश्यता के लिए कोई स्थान नहीं है और अगर हिन्दुत्व में अस्पृश्यता के लिए कोई स्थान है भी तो वह हिन्दुत्व मेरे लिए नहीं है।’’


गांधी अस्पृश्यता को ईश्वर तथा मानवता के प्रति पाप की संज्ञा देते थे। वे इसके दुर्गुणों  से समाज पर पड़ रहे दुष्प्रभावों से जागरूक थे और तभी वे भारत से इसके शीघ्रातिशीघ्र दूर हो जाने की कामना करते थे ।


महात्मा गांधी तो कभी अमेरिका नहीं गए, लेकिन अमेरिकी समाज ने किंग जूनियर में ही अपनी तरह के गांधी की झलक देखी थी। मार्टिन लूथर किंग गांधी से बहुत प्रभावित थे तथा गांधी के सत्याग्रह और अहिंसा के प्रयोग रूप में 1954 में मोंटगोमरी बस बायकाट से शुरू किया, जिसके लिए उन्होंने गांधी की अहिंसा और असहयोग की तकनीक अपनाया । दरअसल उन दिनों अमेरिका में बसों में श्वेत और अश्वेत के बीच भेदभाव किया जाता था । रोज़ा पार्क नामक अश्वेत महिला ने  इस व्यवस्था को चैलेंज किया ।  मार्टिन लूथर ने इसी घटना से अपने आंदोलन की शुरुआत की । इस आंदोलन में अश्वेत लोगों ने बसों में बैठना बंद कर दिया अपने साथ तख्ती लेकर चलने लगे कि ‘हम भी आदमी हैं।’


मार्टिन लूथर के इस आंदोलन पर हिंसक प्रतिक्रिया हुई ।लेकिन उन्होंने अपने समर्थकों से अहिंसा का रास्ता अपनाने के लिए कहा। उन्होंने व्यवस्था से घृणा करने की वकालत की न कि व्यवस्था चलाने वाले लोगों से। जिसका मतलब था, श्वेत लोगों की व्यवस्था से घृणा करो न कि श्वेत लोगों से ।अपनी आत्मकथा में किंग ने अपनी भारत यात्रा को ‘अहिंसा-धाम की तीर्थयात्रा’ का नाम दिया है। उन्होंने लिखा है- ‘अहिंसक साधनों से अपने लोगों के लिए स्वतंत्रता प्राप्त करने के दृढ़तर संकल्प के साथ मैं अमेरिका लौटा । भारत यात्रा का एक परिणाम यह भी हुआ कि अहिंसा के बारे में मेरी समझ बढ़ी और इसके प्रति मेरी प्रतिबद्धता और भी गहरी हो गई ।’


आज भारत और अमेरिका के समाज को फिर से गांधी, अम्बेडकर और मार्टिन लूथर की जरूरत है । सुखद पहलू यह है कि जिस तरह अमेरिका में श्वेत आबादी का एक बड़ा धड़ा अश्वेतों के साथ खड़ा है। उनकी महानता इसी में है कि वे लोकतंत्र के सर्वश्रेष्ठ मूल्यों के साथ खड़े है । उस तरह भारत में भी गैर दलितों की बड़ी आबादी दलितों के लिए समानता , बराबरी तथा नागरिक अधिकारों के लिए लड़ाई लड़  रही है । जब तक किसी निर्दोष  का दम घुटता रहेगा तब तक गैर बराबरी के खिलाफ जंग लड़ी जाती रहेगी ।

(लेखक के विचारों से संपादकीय सहमति अनिवार्य नहीं है )

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