ट्रंप का ‘चीनी’ वायरस और हमारे पूर्वाग्रह !

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(सोपान जोशी)
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने ‘सारस-कोव-2’ को चीनी वायरस कहा। पूर्वाग्रह ऐसे ही काम करता है। हम किसी नयी घटना को जानने के लिए अपनी समझ के दायरे को बड़ा करने के प्रयास नहीं करते हैं, बल्कि हर नयी घटना को अपने पूर्वाग्रह के हिसाब से छोटा बना लेते हैं। यह यह सुविधाजनक है। इसमें कुछ नया समझने की मेहनत नहीं करनी पड़ती।…कुछ नया समझने के लिए पहले यह मानना जरूरी है कि कुछ ऐसा है जो हम नहीं जानते। यानी अपने अज्ञान को विनम्रता से स्वीकार करना पड़ता है। हमारे पूर्वाग्रह हमें यह बताते हैं कि हम पहले से ही सब-कुछ जान चुके हैं, सभी विश्लेषण कर चुके हैं। अब तो बस, कर्म करना भर है। जैसे ही उस हिसाब से कर्म करना शुरू होगा, आदर्श दुनिया बन जाएगी। हर पूर्वाग्रह इसी आधार पर अपनी आदर्श दुनिया बनाना चाहता है। ट्रंप की आदर्श दुनिया मुनाफाखोरी और उपभोक्तावाद की है। …अगर ट्रंप इतिहास को ठीक से टटोलते, तो पाते कि अमेरिका के जिन मूल निवासियों का नरसंहार कर के यूरोप के लोग अमेरिका में बसे, उनके मरने का सबसे बड़ा कारण वे रोग थे जिन्हें यूरोपीय लोग अपने साथ अमेरिका लाए थे। चेचक, प्लेग, माता, हैजा, जुकाम-खाँसी, डिप्थीरिया, मलेरिया, टी.बी., टायफाएड… अमेरिका में हजारों साल से रह रहे लोगों को अनेक नये रोगों का सामना करना पड़ा, जिनसे जूझने का उन्हें कोई अभ्यास नहीं था। ऐसे उदाहरण हैं कि यूरोप के लोगों ने जान-बूझ कर छूत की बीमारियाँ वहाँ के मूल निवासियों को दीं। जो लोग महामारियों से बच सके उन्हें यूरोपीय गुलामी और साम्राज्यवाद की हिंसा ने मारा। कुछ सालों में कई आबादियों के नब्बे प्रतिशत घट जाने के उदाहरण मिलते हैं। यह इतिहास के सबसे बड़े नरसंहारों में गिन जाता है। लगभग 100 साल में 5.5 करोड़ लोगों के मारे जाने का अनुमान है।  …यूरोपीय साम्राज्यवाद के जहाजों पर दुनिया से दूसरी महामारियाँ भी यूरोप पहुँची। ‘सिफिलिस’ या उपदंश का रोग अमेरिका से यूरोप लाने वाले यूरोपीय लोग ही थे। भारत के बंगाल से हैजे की महामारी यूरोप के बहुत से बड़े नगरों तक पहुँची। लाखों लोग मारे गये। जब तक यूरोप के शहरों में आधुनिक सीवर तंत्र नहीं बने तब तक हैजा लाखों को मारता रहा, क्योंकि मल-मूत्र उन्हीं जल स्रोतों में जाते थे जिनसे पीने का पानी आता था। …साम्राज्यवाद और महामारियों का संबंध और पुराना है। प्लेग की महामारी मंगोलिया और उत्तर चीन से होते हुए मंगोल साम्राज्य की सड़कों के सहारे यूरोप पहुँचे। जिस ‘सिल्क रोड’ के सहारे पहली बार यूरोप का सीधा संबंध एशिया से हुआ, उसी के सहारे प्लेग यूरोप पहुँचा। एक उदाहरण तो ऐसा है कि मंगोल सेना ने प्लेग से मरे हुए लोगों की लाशों को उछाल कर इटली के एक किलेबंद नगर के भीतर फेंका। प्लेग इटली से पूरे यूरोप में फैला। …सन् 1918 से 1920 के बीच इनफ्लूएन्जा की महामारी ने दुनिया भर में 5-10 करोड़ लोगों को मारा। एक अनुमान यह है कि दुनिया की आबादी का 5 फीसदी हिस्सा इसकी बलि चढ़ गया था और लगभग आधी आबादी को यह रोग हुआ था। इसका नाम ‘स्पैनिश फ्लू’ इसलिए पड़ा क्योंकि इसकी चर्चा सबसे पहले स्पेन में शुरू हुई थी, जहाँ दूसरे विश्व युद्ध का असर नहीं था। वहाँ इसे ‘फ्रेंच फ्लू’ कहते थे। दूसरे देशों में पहले विश्व युद्ध की वजह से इसकी जानकारी को दबाया गया। धीरे-धीरे इसे स्पेन के नाम से जाना गया, हालाँकि यह पता नहीं कि इसका उद्गम कहाँ हुआ था। …ज्यादातर संक्रामक महामारियाँ दूसरे जानवरों से मनुष्य में आयी हैं। मनुष्य सभ्यता के विकास से वन्य प्राणियों का बड़ी संख्या में संहार हुआ है, उनकी कई सौ प्रजातियाँ ही मिट गयी हैं। वनों की कटाई से आज भी मिट रही हैं। महामारियों का उद्गम खेती और सभ्यता से जुड़ा है। मनुष्य मूलतः आरण्यक प्राणी है और अपने कुल इतिहास के ज्यादातर हिस्से में उसने आरण्यक जीवन ही जिया है, जैसे आज भी आदिवासी समाज जीते हैं। खेती और सभ्यता की वजह से इसमें दो बड़े बदलाव आये। एक, बड़ी संख्या में लोग छोटी जगहों पर रहने लगे, जैसा पहले नहीं होता था। दो, खेती और माँस के लिए वन्य प्राणियों को पालतू बनाया। इन प्राणियों में ऐसे कई जीवाणु थे जो इनके लिए रोग का कारण नहीं थे पर जिनसे संक्रमण के बाद मनुष्य को रोग हो गया। खेती की पैदावर को गोदामों में रखने से चूहों जैसे प्राणी बस्तियों के पास रहने लगे, जिनसे रोग और फैलते गये। संक्रामक रोगों का फैलना हमारे विकास से जुड़ा है। यह बताता है कि जिस विकास को हमने असीम मान लिया है उसकी सीमाएँ क्या हैं। …विकास की ओछी राजनीति में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप पारंगत हैं, वे पूंजीवाद-मुनाफाखोरी-उपभोक्तावाद के पक्के पैरोकार हैं। इस तरह के विकास से उपजा जलवायु परिवर्तन आज सारी पृथ्वी के लिए खतरा बन चुका है। इसका ऐतिहासिक जिम्मा सबसे ज्यादा अमेरिका पर है। पर ट्रंप हमेशा ही जलवायु परिवर्तन का जिम्मा चीन और फिर भारत पर मढ़़ते हैं। यह राजनीति करने का कामयाब नुस्खा है। हमारे यहाँ भी जब राजनीतिक तंत्र से कठिन सवाल पूछे जाते हैं, तो पाकिस्तान नाम लिया जाता है। आतंकवाद बढ़ाने जैसे मामलों में पाकिस्तान की भूमिका तो सर्वविदित है। लेकिन हमारी बदहाली के बड़े कारण पाकिस्तान में नहीं, हमारे अपने निर्णयों में हैं। …किसी दूसरे देश पर इस महामारी का जिम्मा डालना उदाहरण है कि ट्रंप इस बीमारी को कैसे देखते हैं। यह संकेत है कि वे इस चुनौती से निपटने के लिए विवेक का इस्तेमाल नहीं करेंगे। …आप क्या करेंगे? क्या आप कोरोनावायरस से फैली इस महामारी को अपने-अपने पूर्वाग्रहों की आँख से ही देखेंगे? अपनी राजनीतिक विचारधारा? आपका अपना धार्मिक आग्रह? आपकी अपनी संस्कृति? आपकी अपनी भाषा? आपकी अपनी जाति? आपका अपना क्षेत्र? आपका अपना धंधा… यह महामारी हमारे जीवन के मूल स्वभाव की ओर इशारा कर रही है, उन बातों की तरफ जिन पर हमारा साधरणतया ध्यान नहीं जाता है। क्यों नहीं जाता है? क्योंकि हम अपनी-अपनी राजनीति/धर्म/संस्कृति/भाषा/जाति/क्षेत्र/धंधे… को ही दुनिया का केंद्र मानते हैं। जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप विपदा की इस बेला में भी अपनी पहचान आधारित राजनीति के पासे फेंकना चाहते हैं। …क्या आप भी वही करेंगे जो ट्रंप कर रहे हैं? या आप अपनी सीमाओं से बाहर निकल कर, नयी आँख से इस दुनिया को देखेंगे? हम सभी ताबड़तोड़ तेजी से अपना दैनिक जीवन जीते हैं। इस रोग से उपजे खतरे ने हमें रोक दिया है, हमारी गति को थाम दिया है। हमें असीम विकास के खतरे दिखाये हैं। हमें बताया है कई सीमाएँ हम पर लागू होती हैं, जिनके उल्लंघन के नतीजे होते हैं। आप अध्ययन कर सकते हैं। इस खतरे की आड़ में अपनी दृष्टि बड़ी कर सकते हैं। वह देख सकते हैं जो विकास की राजनीति का पूर्वाग्रह आपको देखने नहीं देता।

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