अपनी ही मिट्टी के लाल से परिचित करवाता है यह उपन्यास

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( डॉ. गोविंद मेघवंशी )


सामाजिक कार्यकर्ता एवं लेखक भंवर  मेघवंशी ने द्वारा लिखित कितनी कठपुतलियां उपन्यास इन दिनों पढ़ने का अवसर मिला . इसे लिखकर लेखक ने हमें शंकर सिंह जैसे ज़मीन से जुड़े एक आदर्श सामाजिक कार्यकर्ता से अपरिचित होने से बचा लिया वर्ना जानकारी के अभाव मी अपने बिल्कुल पास के इलाके में रहते हुए भी हम एक सामाजिक ,मजदूर हितैषी , ईमानदार, संघर्षशील व्यक्तित्व को नहीं जान पाते.अगर यह उपन्यास नहीं पढ़ता तो मैं  भी शंकर सिंह की कठपुतलियों की तरह बनकर रह जाता, जिन्हें लोग झोले रखी कोई डरावनी चीज़ समझकर डरकर भाग जाते या छुप जाते है ,हक़ीक़त तक नही पहुँच पाते .


इस पुस्तक में हर जगह चाहे वो भूमि आन्दोलन हो , न्यूनतम मज़दूरी लेने का प्रयास हो ,नरेगा आंदोलन हो ,आदिवासियों को जाग्रत करना हो .अरुणा रॉय ,निखिल डे के साथ मिलकर काम करना हो ,भूख की समस्या का आंदोलन और गाँव गाँव जाकर मजदूरों को संगठित करना  या आरटीआई का आंदोलन हो हर जगह प्रशासन  से लोहा लेना शंकर सिंह के संघर्ष मय जीवन को दर्शाता है .


मुझे जिस घटना ने सबसे ज़्यादा आकर्षित किया वो ये है कि उपन्यास के नायक ने कहीं दूर जाकर बदलाव का काम नहीं किया , बल्कि जिस गाँव में वो जन्मे उसी गाँव के आस पास आकर उन्हीं लोगों  के बीच संगठन बनाकर उन्होंने वहीं संघर्ष किया .जिस गाँव में जातिवाद चरम सीमा पर था ,जहाँ सामन्तवाद के कारण लोगों को उनकी जमीन नही मिल पा रही थी ,वहाँ एक मजबूत पक्ष से लौहा लिया जो सामाजिक आर्थिक राजनीतिक रूप से परिपूर्ण था .उसी जगह काम करना जिसके कारण ऊँची कही जाने वाली जाति के लोग यहाँ तक कि अपने ही वर्ग के लोग दलितो के साथ खाना पीना साथ रहने को लेकर आपत्ति जताने लगे ,विरोध करने लगे और गाली गलौज तक पर आ गए .


लोग उन्हें गाली देकर बहिष्कार करने तक आ गए .हद तो तब हो गयी जब उनकी बेटी को पानी से भरा मटका एक दलित ने उठाकर सिर पर रख दिया तो जात पंचायत बिठा कर घोर विरोध करने लग गए और बहिष्कार की बाते करने लगे .उन्ही के बीच उठकर ये बोलना की मुझे इससे कोई आपत्ति नही है आपको आपत्ति क्यों है ? ये कहना उनके जातिगत भेदभाव से ऊपर उठना साबित करता है.
 ये कोई नई बात नही है कि आज भी भारत के  लगभग सारे गाँवों में जातिवाद नामक भयानक बीमारी मौजूद हैं ,कुछ लोग ही होते है जो इसका विरोध कर पाते है ,जो शंकर सिंह जी ने किया .अनुभव में आता है कि गाँव में जातिवाद की इस बीमारी को लोग हर पद ,प्रतिष्ठा,शिक्षा,पैसा सब से ऊपर मानते है .शंकर सिंह जी की तरह अगर  हर आदमी सोचने लगे तो इस देश में जात पात नाम की बीमारी को जड़ से उखाड़ फेक सकते है और संविधान को पूर्ण रूप से अमल में ला सकते है .


वाक़ई मैं इस उपन्यास को जीवित उपन्यास कहने में कोई आपत्ति नही  करूँगा। क्योंकि जीवन में बहुत कम व्यक्ति ऐसे होते है जिनके जीते जी उन पर  कुछ लिखा जाए और उनके संघर्ष को सबके सामने लाया जाए ।शंकर सिंह जी के हमारे बीच मौजूद होते हुए उनके जीवन की गाथा हमें पढ़ने को मिली ,जिससे हम प्रेरणा ले सकते हैं .

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