रामदेव पीर की आध्यात्मिक धारा से अवगत कराती है यह किताब !

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( पूरा राम )

डॉ कुसुम मेघवाल की ‘मेघवाल बाबा रामदेव’ पढ़ ही रहा था कि भंवर मेघवंशी की दो पुस्तकें ‘कितनी कठपुतलियाँ’ और ‘महान समाज प्रचेता  रामदेव पीर’ हस्तगत हुई . रामदेव जी के जीवन के संदर्भ में और जानने की उत्कंठा में इस पुस्तक को पहले पढ़ने की शुरुआत की .पुस्तक रामदेव जी के बारे में प्रचलित अनेकों कथेतर, आख्यायित और लोकमानस में विचरित उनके चमत्कारपूर्ण घटनाओं को तर्कपूर्ण और वैज्ञानिक अभिगम के नज़रिये से देखने का एक सरल प्रयास प्रस्तुत करती हैं . 


‘रामदेव पीर की आध्यात्मिक परम्परा’ को पढ़ने पर ऐसा लगता हैं जैसे एक रहस्य्मय आवरण को सद्य तर्कों और गहन शोध के साथ परत-दर-परत उघाड़ने का प्रयास किया हैं . रामदेव जी और सूफी मत के इस्माईली निज़ारी दावे के साथ उनके संबंध को इस अध्याय में अनेकों प्रमाणों से उद्घाटित किया हैं . सूफी मत वैसे भी अपने में एक रहस्य का आवरण ओढ़े हैं . उसकी साधना पध्दत्ति, शब्द विन्यास, मानवीय दृष्टिकोण, ध्यान के गहनतम तल से प्राप्त होने वाले मोती के सदृश हैं जिसके संबंध में  भौतिक रूप में मात्र इशारे सम्भव हैं . इस अध्याय में सुदूर ईरान के सुप्रसिद्ध सूफी संत शम्स तबरेज़, मौलाना रूमी और समस पीर के साथ रामदेव पीर के आध्यात्मिक सिलसिले के जुड़ाव को पढ़ना किसी रोमांच से कम नहीं हैं . 


यह पुस्तक लेखक द्वारा रामदेवरा की दर्ज़नों यात्राओं, बड़े-बुज़ुर्गों से हुई वार्ताओं और तक़रीबन 121 संदर्भ ग्रंथों, पुस्तकों, खोजी शोधों से निसृत अर्क हैं . मेरे घर में भी जम्मा-जागरण के तौर पर नियमित भजन होते रहते थे . खुद मेरे चाचा रामदेव जी के नामचीन गायक थे, घर के एक कौन में हमेशा तम्बूरा, ढोलक, मजीरा और अन्यान्य वाद्य यंत्र मौजूद रहते थे इसलिए बचपन से धारू मेघ, उगमसी, रूपांदे, राव मल्लिनाथ, जैसल-तोरल के नाम घर में गूंजा करते थे . लेकिन उनके बारे में प्रामाणिक और विस्तृत जानकारी कभी हासिल नहीं हो पायी और आज भी इनके बारे में संक्षित जानकारियाँ ही है . अलख वाणी की इन जोड़ायतों का संक्षिप्त वर्णन भी इस पुस्तक में मौजूद हैं .

 
‘पर्चा-प्रमाण’ व ‘समाधि के बाद के पर्चे’ जो सामान्य लोकमानस में रामदेव जी के चमत्कार/करामात माने जाते हैं और जिसके कारण ही सामान्यजन रामदेव जी को ‘बाबो भली करै’ जैसे सम्बोधनों से पुकारते हैं, मन्नते माँगते है, अवतारी पुरुष की संज्ञा देते हैं कि सुरुचिपूर्ण, तर्क की कसौटी पर विस्तृत व्याख्या इन अध्यायों में की हैं और यह प्रमाणित करने का सुंदर प्रयास किया हैं कि ये पर्चे,चमत्कार न होकर रामदेव पीर द्वारा लोगों को करुणा रूपी सहज दिए उपदेश हैं, सीख है. बाद के लेखकों ने इसे अवतारी कृत्य घोषित कर रामदेव जी के महत्त कार्य को आडंबरवान बना दिया . यह अध्याय रामदेव पीर के व्यक्तित्व और कृतित्व को बिलकुल ही नए दृष्टिकोण से पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करता हैं .

 
इसी निरंतरता में ‘रामदे की सिद्धवाणी, ‘चौबीस प्रमाण’ (गुरु प्रमाण, मुळारंभ, ज्ञान, भक्ति, भाव, निज, महापद, निजनाम, अभय, योग, अवतार, महिमा, माया, लछ, साखी, बीज, इंड(प्रश्न), निकलंग, निज धरम, निजार, मेघड़ी, महाधर्म महिमा, आगम प्रमाण) मूल पद्य, भजन रूप में इस पुस्तिका में संकलित हैं जिसे पढ़ने पर रामदेव जी के बहुआयामी विचारसरिणी की एक झलक मिलती है . इन प्रमाणों को पढ़ने पर लेखक की उक्त उक्ति सार्थक लगती हैं कि रामदेव पीर को किन्ही प्रचलित धर्मों, सम्प्रदायों, मतों और बाह्याडंबरों में नितांत बाँध कर नहीं देखा जा सकता हैं, उन्हें किसी बंधे-बँधाये खांचें में फिट करना सम्भव नहीं हैं . प्रचलित संतमत धारा, सूफी मत, नाथ सम्प्रदाय, बौद्ध प्रतीकों और कुछ गुरुमुखी व भक्ति धारा के मिले-जुले शब्द उनके प्रमाणों में सहज ही देखे जा सकते हैं . अर्थात रामदेव पीर में तत्कालीन प्रचलित सभी धाराओं का समन्वय देखा जा सकता हैं . इससे उनके एक नए प्रकार के बहुआयामी, मानवीय, समतावादी पथ को अंगीकार करने की  विचारधारा और  कल्ट को अनुभव किया जा सकता हैं .

 
लेखक इस पुस्तक में रामदेव पीर के जन्म, कुल, जाति, अवतार प्रसंग को ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं मानते है, बल्कि उनका मत हैं कि महापुरुष किसी एक कौम, मज़हब, के नहीं होते बल्कि उनका सार्वभौम संदेश मानव मात्र का होता हैं अतः हमे उन्हें उसी रूप में विचारणा, समझना चाहिए . इसलिए उक्त पुस्तक इस मसले को गौण मानकर तत्कालीन सामाजिक, राजनैतिक परिस्थितियों की छाया में रामदेव पीर के व्यक्तित्व और कृतित्व को अंगीकार करती हैं . इस रूप में मुझे यह पुस्तक, रामदेव पीर की अन्य जीवनीबद्ध पुस्तकों से ज्यादा सुरुचिपूर्ण लगी .


पुस्तक के अंतिम भाग में एक परिशिष्ट जोड़ा गया हैं ‘रामदेव जी और सिद्ध परम्परा’ . इसमें ‘इंड प्रमाण’ की रौशनी में ‘सिद्ध परम्परा’ के रूप में कुछ विशिष्ट पारिभाषिक शब्दों का विवेचन/ निर्देशन प्रस्तुत किया गया हैं जो हिंदी शब्दार्थ में कई बार क्लिष्ट लगता हैं .वैसे भी सिद्ध, नाथ व सूफी परम्परा के शब्दों का ठीक-ठीक अर्थ लगाना सामान्यजनों के लिए कठिन रहा हैं और यहाँ भी अभीष्ट शब्दार्थ निर्देशनों के कुछ इशारे मात्र ही हैं . सूफी सिलसिले के साधकों का तो मत हैं कि शब्द ऊपरी आवरण रहते है उनके मार्ग,अर्थ, ध्यान की अंतरतम गहराइयों में मिलते हैं . जो नक़्शे, लफ्ज़-लहज़े हैं वे सूरत-शबद के मिलन या जीवत मरिये भवजल तरिये की पराकाष्ठा हैं .

 
कुल मिलाकर प्र्स्तुत शोध पुस्तिका बड़ी मेहनत से तैयार की गई हैं . इसमें अन्यान्य खंडन-मंडन, उत्तर-पूर्व मीमांसा की उबाऊ प्रक्रिया कि बजाय रामदेव जी के आध्यात्मिक पक्ष, उनके व्यक्तित्व-कृतित्व पर ज्यादा फ़ोकस हैं . हालाँकि रामदेव पीर द्वारा मात्र 33 वर्ष की अवस्था में समाधी वरण के कारण उनकी सुव्यवस्थित सांगठनिक विचारधारा नहीं बन पायी इसलिए उनके बारे में अल्प जानकारियाँ ही उपलब्ध है. फिर  भी यह पुस्तक रामदेव पीर के कई पहलुओं का शानदार दस्तावेजीकरण प्रस्तुत करती हैं और भावी शोधकर्ताओं को और शोध के प्रति आमंत्रित करती हैं .

( फोटो – ध्रुव राज सिंह )
 

पुस्तक – #महान_समाज_प्रचेता_रामदेव_पीर (लेखक – भंवर मेघवंशी, प्रकाशक – रिखिया प्रकाशन, ए-314, कुम्भा सर्कल के पास, आज़ाद नगर, भीलवाड़ा, राजस्थान, 311001 )

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