कोई सूरत नज़र नहीं आती, फिर भी कलम चल रही है !

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( डॉक्टर दुर्गा प्रसाद अग्रवाल )
लिखने पढ़ने का शौक रखने वालों के लिए किताबें जीवन का पर्याय होती हैं. वे इससे ज़्यादा कुछ नहीं चाहते कि उन्हें लगातार उम्दा किताबें मिलती रहें. किताबों का मिलना उनके छपने पर निर्भर है और छपना उनके लिखे जाने पर. यह सिलसिला बना रहता है तो सब कुछ ठीक रहता है और जब इसमें कोई व्यवधान आता है तो बात बिगड़ने लगती है. हिंदी किताबों की दुनिया में व्यवधान अपवाद न होकर नियम बन गये हैं. वैसे किताबें खूब छप रही हैं, और ज़ाहिर है कि छप रही हैं तो लिखी भी जा रही हैं. लेकिन इतना ही तो पर्याप्त नहीं है. लेखक संतुष्ट हो, यह भी तो ज़रूरी है. इधर जो हालात हैं उनमें लेखकों का असंतोष बार-बार उभर कर सामने आता है.


हाल में एक कथाकार ने, जिनका एक कहानी संग्रह दो बरस पहले आया था और जिसकी खूब चर्चा और सराहना भी हुई थी, सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में अपने दिल का दर्द बयान किया है. उन्होंने अपने इस कहानी संग्रह के दो साल के रॉयल्टी स्टेटमेण्ट का ज़िक्र करते हुए लिखा है कि जितना पैसा प्रकाशक ने आंकड़ों को जोड़ने और लेखा-जोखा बनाने में खर्च किया होगा, उतनी भी रॉयल्टी उन्हें नहीं दी गई. उनकी इस पोस्ट पर खूब लम्बी चर्चा हुई है और एक सज्जन ने उनसे यह भी पूछ लिया कि उन्होंने यह किताब छपवाने के लिए प्रकाशक को कितने पैसे दिये? इस चर्चा में बार-बार यह बात आई कि हिंदी पाठक किताबें खरीदने में बहुत कम रुचि दिखाता है. मैं कहानीकार का नाम जान-बूझ कर नहीं लिख रहा हूं. इसलिए नहीं लिख रहा हूं कि यह केवल उनकी व्यथा नहीं है, हिंदी में लिखने वाले अधिकांश लोगों की व्यथा है.
यह आम धारणा है कि हिंदी में किताब लिखकर उसे सम्मानजनक तरीके से छपवा लेना आसान नहीं है. सम्मानजनक तरीके से इतर तरीका बहुत आसान और सुलभ है. यह तरीका है पैसे देकर किताब छपवाने का. और इधर यह तरीका खूब चलन में है. इस तरीके के लोकप्रिय होने से पुस्तक प्रकाशन की दुनिया में एक बड़ा बदलाव यह आया है कि इस तरह धड़ाधड़ किताबें छप रही हैं.

इन छपने वाली किताबों में गुणवत्ता देखने की ज़रूरत प्रकाशक को नहीं रह गई है. सच तो यह है कि नाम भले ही उसका प्रकाशक का हो, भूमिका उसकी मुद्रक की हो गई है. किताब छापने और विज्ञापन के पर्चे छापने में कोई अंतर नहीं रह गया है. आप पैसे लेकर जाएं, मुद्रक, माफ़ कीजिए प्रकाशक को दें और कुछ दिनों में वह आपको आपकी मुद्रित किताब दे देगा. इस तरह छापी गई किताब को बेचने के लिए उसे प्रयत्न करने की ज़रूरत नहीं रह गई है. आपने जितना प्रतियों का सौदा तै किया था, उतनी आप ले लीजिए और उन्हें अपनों में बांट दीजिए. और ज़्यादा उत्साह हो तो सोशल मीडिया पर उस किताब की धूम मचा दीजिए. इससे ज़्यादा सामर्थ्य हो तो एक लोकार्पण समारोह आयोजित कर लीजिए और फिर उसकी छोटी मोटी खबर अखबारों में छपवा लीजिए. अगर कोई अपनी किताब छपवाने के लिए पैसे खर्च कर रहा है तो मुझे शिकायत क्यों हो? और अगर कोई पैसे लेकर किताब छाप कर दे रहा है तो भी मुझे शिकायत क्यों हो?


लेकिन जैसा मैंने पहले कहा, इससे प्रकाशन की दुनिया के तौर तरीकों में बदलाव आ रहा है. मुझे उसी बदलाव से शिकायत है. इस तरह से किताब छापने का धंधा इतना चल निकला है कि अब स्वभावत: प्रकाशक अपनी पसंद से किताब छाप कर उसे बेचने के प्रयास करने के प्रति उदासीन होते जा रहे हैं. यह स्वाभाविक भी है. अगर कम मेहनत में काम चल रहा है तो ज़्यादा मेहनत क्यों करे कोई! वैसे भी हिंदी प्रकाशक मेहनत करने के मामले में बहुत उत्साही नहीं रहे हैं. किताब छाप कर उसे पाठक तक पहुंचाने की बजाय सरकारी खरीद में उसे जैसे-तैसे ठेलने में उन्हें पहले भी ज़्यादा दिलचस्पी रही है. और इस जैसे-तैसे की परिणति किताबों की अनाप-शनाप कीमतों में हुई है. प्रकाशक का तर्क यह कि किताब बिकती नहीं इसलिए उसकी कीमत ज़्यादा रखना उसकी मज़बूरी है, तो पाठक का तर्क यह कि किताब बहुत महंगी है इसलिए वह उसे खरीदने से गुरेज़ करता है.

इस बात को हम सबने देखा है कि जहां अंग्रेज़ी और अन्य भाषाओं की किताबों के प्रकाशक अपनी किताब के प्रचार-प्रसार में खूब रुचि लेते हैं और उन्हें पाठकों तक पहुंचाने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं, हिंदी का प्रकाशक इतनी ज़हमत उठाना ही नहीं चाहता. मेरा हमेशा यह मानना है कि अगर बेचने वाले की इच्छा हो तो बाज़ार के इस समय में कुछ भी बेचा जा सकता है,. अगर इच्छा ही न हो तो कोई क्या कर सकता है? हिंदी के बहुत कम प्रकाशक हैं जो अपने यहां से प्रकाशित किताबों का समुचित प्रचार-प्रसार करते हैं, उनकी समीक्षाएं करवाते हैं और यह कोशिश करते हैं कि आम पाठक उन्हें खरीदे. मेरा अनुभव तो यह रहा है कि ज़्यादातर हिंदी प्रकाशकों के यहां से ऑर्डर देकर किताब मंगवाना खासा श्रमसाध्य है. किताबों के प्रचार-प्रसार का जो थोड़ा बहुत काम होता है वह खुद लेखक द्वारा ही किया जाता है, जबकि यह काम प्रकाशक द्वारा किया जाना चाहिए.


इसके बावज़ूद ऐसा नहीं है कि हिंदी की किताबें बिकती नहीं हैं. आप किसी भी पुस्तक मेले को देख लीजिए, लोग किताबें खरीदते हुए नज़र आएंगे. ऑनलाइन स्टोर्स पर भी किताबें, हिंदी की किताबें खूब बिकती हैं. यह माना जा सकता है कि अन्य भाषाओं की तुलना में हिंदी की किताबें कम बिकती हैं, और इसके अपने कारण भी हैं, लेकिन किताबें नहीं या बहुत कम बिकती हैं, यह बात स्वीकार योग्य नहीं है. फिर क्या कारण है कि लेखक को समुचित रॉयल्टी नहीं मिलती है? आज का एक बहुत कड़वा सच यह है कि प्रकाशक कागज़ पर पैसा खर्च करता है, छपाई पर पैसा खर्च करता है, बाइण्डिंग पर पैसा खर्च करता है, बस, जब लेखक को पैसा देने की बात आती है तो हाथ खड़े कर देता है. अगर किताबें वाकई नहीं बिक रही है तो ये नए-नए प्रकाशक कैसे बाज़ार में आ रहे हैं? कोई दुकान नहीं चलती है तो वो बंद हो जाती है. प्रकाशन के मामले में अगर ऐसा नहीं हो रहा है तो सोचा जाना चाहिए कि गड़बड़ कहां है?


लेखक को उसके लेखन के लिए उचित पारिश्रमिक का न मिलना प्रकारांतर से लेखन की गुणवत्ता को भी प्रतिकूलत: प्रभावित करता है. यह कहा जाता है कि हिंदी में केवल लेखन के दम पर कोई ठीक-ठाक तरह से ज़िंदगी नहीं बिता सकता. अपने आप में यह बहुत व्यथित कर देने वाली बात है. अगर लेखन आपको दे वक़्त की रोटी भी नहीं दे सकता तो कोई क्यों लिखेगा? क्यों कोई अच्छा लिखेगा? अच्छा लिखने के लिए शोध की, मेहनत की, तसल्ली की ज़रूरत होती है. ऐसे हालात में क्यों और कैसे कोई लिखने पर अधिक मेहनत करेगा? और अगर अच्छा नहीं लिखा जाएगा, तो कोई उसे क्यों खरीदेगा और क्यों पढ़ेगा? तो इस तरह एक दुष्चक्र बन जाता है! हिंदी में उस तरह के लेखन के अभाव को इन बातों से समझा जा सकता है जिस तरह के लेखन को अन्य भाषाओं में पाकर हम अपनी भाषा के लेखन परिदृश्य की विपन्नता पर आंसू बहाते हैं. यह उम्मीद करना कि लेखक केवल अंत:प्रेरणा और सृजनाकांक्षा से प्रेरित हो बिना किसी अपेक्षा के लिखेगा, लिखता चला जाएगा, अव्यावहारिक ही होगा.


सवाल यह है कि इस दुष्चक्र से बाहर कैसे निकला जाए? इस सवाल के ताले की चाबी अगर मिल जाए तो हालात बदल सकते हैं! मुझे लगता है कि यह चाबी जिस धातु से बनी है उसका नाम ईमानदारी है. और दुर्भाग्य से यह धातु विरल होती जा रही है. जहां गधे की लीद लोगों को खिलाने में किसी को संकोच न होता हो, जहां खाद्य पदार्थों की मिलावट का रोग दवाइयों तक जा पहुंचा हो, जहां मुनाफ़े के लालच में प्लाज़्मा के नाम पर पानी बेचना भी किसी को शर्मिंदा न करता हो, वहां यह उम्मीद कैसे की जाए कि कोई किसी किताब की दो हज़ार प्रतियां बेच कर लेखक को भी यही संख्या बताएगा! मुझे नहीं पता कि क्या अन्य भाषाओं के प्रकाशन की दुनिया में हालात इससे भिन्न हैं! हिंदी में तो जब तक एक आधारभूत ईमानदारी नहीं होती है, हालात सुधरने की कोई उम्मीद मुझे नज़र नहीं आती. इन विषम परिस्थितियों में भी जो लिखते जा रहे हैं उनकी जीवट को, उनकी सदाकांक्षा को सलाम.
( राष्ट्रदूत से साभार )

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