संघर्ष, संगठन और संभावना की किताब – कितनी कठपुतलियाँ

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( विनीत अग्रवाल )

प्रस्तावना -कल बहुत दिनों के बाद ऐसा एक घटनाओं से भरा दिन आया था. परसो ही डाक से पीली पर्ची मिल गयी थी. सिर्फ लिखा था की कोई पोस्ट हैं जिसे लेने के लिए डाकघर जाना हैं. बाकी कौन सी डाक हैं, ये पूरा सस्पेंस था. हालांकि मुझे अंदेशा था की शायद किताबें आ पहुंची हैं.मैं डाकघर पहुँचा तो शनिवार की सुबह की भीड़ आम तौर पर जो पोस्ट ऑफिस में मिलती हैं, वो मिली. पहले कोविड-19 के लॉकडाउन के दौरान पर्ची लेकर नंबर का इंतजार करने की परंपरा ख़त्म हो गई थी अब वो परंपरा लौट आई थी.

मैं पर्ची लेकर मोबाइल पर ‘अ-फासीवाद’ के बारे में नताशा लेंनार्ड का साक्षात्कार पढ़ने लगा. सोचता रहा फिर से क्या बुद्धिजीवी बातो की लड़ाई ही लड़ेंगे की ‘अ-फासीवाद’ हैं  या ‘अन-फासीवाद’ हैं या फासीवाद हैं भी या नहीं, जिन काक सा से लड़ना हैं उनसे कब लड़ेंगे? खैर, सरकता सरकता आगे पहुंचा. 216 बी – डिजिटल बोर्ड पर नंबर के साथ बूथ का नंबर चमका . मैंने वहां पहुंच कर सलाम किया और पीली पर्ची पेश कर दी . उन्होंने कहा की यहाँ आने की कोई जरुरत ही नहीं थी, बाहर जो मशीन हैं उसपे पर्ची का क्यू र कोड स्कैन करने से ऑटोमैटिक सामान मिल जाता हैं.

ये भी ठीक रही .मैं डरा सहमा मशीन के सामने पहुंचा. मशीन को पर्ची दिखाई .कुछ तो मशीन ने आनाकानी की और उल्टा मुझसे एक के बाद एक सवाल पूछने लगी जैसे सरकारी बाबू के सारे गुण इसने ही ले लिए हो .स्क्रीन पर डिजिटल दस्तखत भी करवा लिए. मुझे लगा की भाषा बदल दी जाए तो थोड़ी सी बातचीत में आसानी हो .भाषा बदल के अंग्रेजी में कर दी .फिर से पर्ची दिखाई तो धप्प की आवाज हुई . मैं चौंक कर और डर गया . सोचा लगता हैं कुछ गलत कर दिया- अब तो बामुशक्कत जेल की सजा पक्की, जुर्माना तो भर सकने से रहे .पर धीरे से गर्दन घुमा के दाहिने और देखा तो दरअसल पीली रैक में से एक छोटा सा फाटक खुला था और उसके अंदर एक भूरा पैकेट था. हाय अल्लाह – देखा तो बस देखता ही रह गया.

भारतीय डाक का चिन्ह और पूरा पैकेट बिल्कुल ठीक ठाक चमकता हुआ .इतना खुश हुआ की पैकेट लेकर कूदता सीधे सामने की दुकान में घुस गया और वहां पर मिलने वाले मरियल समोसो की यूँ तारीफ़ करने लगा जैसे वो समोसों में सबसे महान समोसे हो और दूसरी अड़ोस पड़ोस की दुकान वालों के समोसे की कमियाँ निकालने लगा. नतीजा वही हुआ जो होना चाहिए था यानी की दुकानदार का दिल बाग़ बाग़ हुआ. खुश होकर उसने मुझसे पूछा की मैं कहाँ से हूँ , मैंने राजस्थान से होने की बात कही तो तुरंत उर्दू/हिंदी बोलने लगा. वाह, मैं तो हतप्रभ था। उसने बताया की अफ़ग़ानिस्तान से हैं और भारतीय फ़िल्मो को देखने का शौकीन। मैंने कहा वाह क्या खूब भाषा सीख ली हैं फ़िल्मे देख देखकर . फिर कुछ और इधर उधर की बात हुई और इतने में समोसा गर्म हो चुका था और न रुका गया . कोरोना ने नए दोस्त से गले न मिलने दिया .फिर आने का वादा कर घर पहुंचा .

कैंची लगा कर पैकेट कुछ इस तरह से खोला की भारतीय डाक के चिन्ह को संजो लूँ. इतने दिन से जिन किताबों के आवरण देख रहा था, जिन किताबों की समीक्षा पढ़ रहा था – उन्हें हाथ में देखकर इतनी बांछे खिल गई की तुरंत समोसा निकाला और कुछ ही मिनटों में पूरा का पूरा समोसा खा गया . जानता हूँ कि इस लेख के पाठकों को मेरी किताबों के मिलने की ख़ुशी से स्वभावतः ईर्ष्या हो सकती हैं . एक लेखक और पाठक के बीच ईर्ष्या एक स्थायी रिश्ता होता है बाकी आते जाते रहते है .मेरी इस ख़ुशी से जिन्हे डाह हो वो राकेश शर्मा जी से उनके मोबाईल 9649399527 पर संपर्क करे.इन किताबों को इतनी दूर सुरक्षित पहुँचाने में पूरा उन्हीं का हाथ हैं . मैं निर्दोष, दीवार पर लगे मुक्तिबोध के पोस्टर को सलाम कर रेडियो चालू कर किताब लेकर पढ़ने लगा .

प्रस्तावना समाप्त , सम्भावना शुरू

उस समय जब दोपहर के लगभग बारह बजे, जब अधटूटी सूरज की रोशनी इसी खिड़की से यूँ ही छनकर गिर रही थी और कितनी कठपुतलियाँ के पहले पन्ने पर भंवर जी द्वारा हस्तलिखित अपना नाम पढ़ कर मैं इतना खुश हो रहा था तब चाहे मैंने की हो या न की हो, पर अब लिखते वक्त तो पक्का यादों की जुगाली कर ही रहा हूँ .मुंबई के दिनों की बात, रोशेल ने श्रेणिक से मिलवाया और श्रेणिक ने भंवर जी से . श्रेणिक ने मुझसे कहा तो शरमाते, हिचकिचाते अपनी कविता भी भंवर जी को भेज दी थी . अब उस जगह का पता तो याद नहीं मगर पहली बार कुछ समय के लिए मिला था तब जब बम्बई में एक कवि सम्मेलन था और भंवर जी अपनी एक कविता पढ़ रहे थे और मैं तीसरी पंक्ति की कुर्सी पर बैठा एकटक सुने जा रहा था, लगा था कि सब कुछ कह दिया हैं और कविता पाठ पूरा होते होते कमरा तालियों से गूँज उठा था . उनसे पहली बार मिलने की शायद यही स्मृति हैं …

मुझे ये शक हमेशा से रहा हैं कि कविता और गीत, व्यक्तियों, समयों और संभावनाओं के बीच का वो क्षेत्र है ,जिससे आप एक ओर से दूसरी ओर चलते है, बदलते है और ढलते हैं . जिन्होंने इंटरस्टेलर नाम की फिल्म देखी हो, वो किताबों के बीच सरकती धूल और मोर्स कोड के सन्देश जो एक आयाम से निकलकर दूसरे आयाम में पहुँच जाते हैं उसको याद करे और न देखी हो तो बिलकुल भी चिंता न करे क्योंकि मेरे संदर्भो का बोझ आप भी उठाये ये इस समीक्षा को पढ़ने की कोई शर्त नहीं हैं . अरुंधति रॉय ने 5 अप्रैल 2020 को फ़ाइनेंशियल टाइम्स में लिखे एक लेख में एक महामारी के लिए एक शब्द का इस्तेमाल किया जो दुनिया भर में तब से दोहराये जाने गया – पोर्टल . अरुंधति राय ने कहा “महामारियां इतिहास से नाता तोड़ दुनिया को फिर से सोचने का मौका देती हैं . यह महामारी भी कुछ ऐसी ही है, ये एक पोर्टल हैं , एक दरवाज़ा इस दुनिया और दूसरी दुनिया के बीच” . 

https://www.ft.com/content/10d8f5e8-74eb-11ea-95fe-fcd274e920ca

कविता और गीत को महामारी न समझिये पर अरुंधति की परिभाषा से पोर्टल शब्द और कविता का रिश्ता जरूर समझ लीजिये . भंवर जी कितनी कठपुतलियाँ की शुरुआत में जब शंकर सिंह को बुलाने जाते हैं तो वस्तुत: वह एक कवि सम्मेलन के लिए आमंत्रण होता हैं . शंकर सिंह के सर पर पानी का घड़ा हैं . भंवर जी की शंकर सिंह से यहीं पहली मुलाकात होती है . यहाँ पर ही वो दर्शन के विद्यार्थियों की दो झूलती फूलती लम्बर लाट यानी की चहेती अवधारणाएं वो अच्छी तरह से बाँध देते हैं ताकि दार्शनिक प्रवृति के लोग फिसल न जाए .

अव्वल तो यह कि आत्मकथा/जीवन-वृतांत की आशा में नायकत्व की गाथा के लिए कान लगाए बैठे, धुर नीत्सेवादी, सुपरमैन-शक्तिमान कॉम्प्लेक्स धारी अच्छे से सीट बेल्ट बाँध ले . शंकर सिंहकिसी भी नायक, खलनायक के या अ-नायक के खाँचो में आने वाले नहीं है . बल्कि वो तो सारे खाँचो को खींच कर इलास्टिक बना देते है .कठपुतलियों की तरह उन्हें वही रूप धारण करने के लिए तैयार कर देते हैं जो वक्तव्य का हैं (हालांकि शंकर को शंकर जी अथवा शंकर सिंह न कहने की स्वतंत्रता मैं आपसे इसी आधार पर ले रहा हूँ ) दूसरा ये की आप ये किताब किस विधा की हैं इस लड़ाई को चोर जेब में ही साथ रखकर चले वरना जरूर इस यात्रा में आपका ये सवाल खो जायेगा, मैं खुद अपना सवाल खोकर अनुभव से कह रहा हूँ . जब आप स्वयं ही वैसे न रहेंगे जैसा पढ़ना शुरू किया तब थे तो ये किताब कौनसी विधा की हैं ये सवाल कौन पूछेगा? फिर भी आप अगर जिद्दी हो तो यथार्थ से लेकर उपन्यास की रेखा को आप चाहे मार्क्सवादी लुकाच की उपन्यास की परिभाषा पर टटोल ले या ल्योतार्द के उत्तर आधुनिकतावाद को यह कहते हुए कि ‘विश्लेषण असंभव हैं’ दोहरा ले, दोनों ही रूप से सवाल खो जाता हैं .

कहानी बिलकुल सच्ची हैं, सिर्फ यथार्थवादी नहीं हैं, यथार्थ ही हैं , भूख से मृत्यु . वैसी नहीं जैसी आपने कहानी में पढ़ी हैं या किसी आँकड़े के साथ चिपकी हुई देखी हैं . वैसी भी नहीं हैं जो सामाजिक कार्य की परिभाषाओं में परिभाषित होती हैं .आप उस भूख को बहुत पास से देखते हैं . भूखे रहें हो तो सिहर कर कम्पित होते हैं . नहीं रहे हो तो भी शंकर की संवेदना के सहारे शायद जमे हुए सारे पूर्वाग्रह दरकने लगते है और तब विधा के सवाल का क्या कीजियेगा ? चलिए – फिर से कोशिश कर लीजिये – हाँ, डॉक्यूमेंट्री में भी स्टेजिंग होती हैं. यहाँ पर भी हैं हर एक पाठ का सुलभ पड़ाव है जो अगले के लिए तैयार करता हैं . कहानी है , गीत हैं , नाटक हैं , संस्मरण हैं , आंदोलन हैं , उतार-चढ़ाव, हार-जीत भी हैं , फिर भी शंकर हैं और फिर भी भंवर हैं और फिर भी फेफी बाई हैं, नौजी या है,  अंछी हैं,  चुन्नी बाई हैं, अरुणा जी, निखिल डे और वो सारे लोग हैं जो बिना मिले आप में बचे रह जाते हैं , तब भी बचे रह जाते हैं जब आप पन्ना नंबर 216 पर आखिरी पंक्ति पढ़ चुके होते हैं और तब आपको शायद उस गतिविधि का अहसास होता हैं जिसमे शंकर की आत्मकथा लिखते हुए भंवर शंकर होने लगते हैं और शंकर भंवर .

पन्ना नंबर 216 पर आखिरी पंक्ति जब कांपती है तो कुछ शंकर, कुछ भंवर और कुछ शंकर-भंवर आपमें भी कांपता हैं . यही 2020 के पाठक में भी कुछ संवेदना ऊगा लेने की क्षमता न सिर्फ इस किताब को मजबूत करती हैं बल्कि पाठक, समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था, गाँव, इतिहास और खेत जो भी इसके संपर्क में आता हैं उनमे प्राण भर देती हैं . सभी कठपुतलिया जीवंत हो उठती हैं और निरंतर सृजनात्मक खेल रचती हैं, मगर ये खेल इस बार किसी सिंहासन बत्तीसी की रक्षा के लिए नहीं, न ही किसी साम्राज्य की स्थापना के लिए बल्कि साम्राज्यवाद की जड़ो को अस्थिर करती हुई सूचना के उन हथियारों के लिए जिससे सामंतवादी और जातिवादी ताकतों से लड़ाई लगातार लड़ी जा सके .

यथार्थ में यथ –  संयोग की बात

सबके पीछे कारण है या सबके पीछे संयोग , इस प्रश्न को पीछे ही छोड़ दिया जाए तो बेहतर हैं। सच इतना हैं की कुछ दिन, आम दिन से अलग ऐसी गति लिए होते हैं जैसे कोई रुकी नदी रवां हो बहने लगे। ऐसा दिन नदी की तरह बहता हुआ किसी पहाड़ी से गुजर गए तो झरना लग जाता हैं।  पढ़ते पढ़ते अचानक से याद आया की किताब का लोकार्पण ऑनलाइन हो रहा हैं. जोड़ बाकी कर वक्त मालुम किया तो पता चला की अभी हो रहा हैं। अभी, बिलकुल इसी वक्त .. तुरंत प्रभाव से लिंक से जुड़ गया। पर लोकार्पण हो चुका था और रेणुका जी बोल रही थी. थोड़ी ही देर बाद शंकर को देखा, ऑनलाइन। मीलो समुद्र और महासागरों में बिछी ऑप्टिकल फाइबर के जालो से होता हुआ शंकर के गाँव पहुंचा और शंकर का गाँव मुझ तक. शंकर और चुन्नी जी ने गीत भी सुनाये जिन्हें मैं किताब में आगे पढ़ने वाला था ।

अचानक एक गीत ने मुझे पकड़ लिया। बोल साथिडा रे… याद आया गाँव में स्कूल में पढ़ते हुए एक एन सी सी शिविर लगा था कहीं भीलवाड़ा शहर से दूर एक धर्मशाला में , शिविर में ही स्कूल के ही किसी दोस्त ने एक गीत की लय पकड़ा दी और हम उसमे जोड़ जोड़ कर दाल में दाल न होने की , रोटियों के नितांत सूखी होने की शिकायत करने लगे ।

बोल तीतरा रे, बोल्यो जा तू बोल्यो जा रे

इ एनसीसी का मेला में

भाया का सांग सगेला में

भाई भाई रे…

अठे दाल में दाल कोने

रोटी पे साग कोने

अठे डुडु चाल चलावे

मोरा पे धौल जमावे

भाई भाई रे…

मैं शंकर सिंह को स्क्रीन के उस पार देखता महसूस करता रहा और उसी गीत का एक बदला स्वरूप, एक याद की तरह जबान पर आता ही गया जैसे वर्षों  पहले की बात न होकर कुछ पल पहले की बात हो ।

अभी कुछ दिनों से अकादमी जगत एक अच्छी बहस खड़ी हुई हैं जो खड़ी होनी ही चाहिए, अफ़्रीकी-अमेरिकी मूल के प्रोफेसर फ्रेड मोटेन के सौजन्य से । हालांकि फ्रेड मोटेन ये बात कई बरसो से कह रहे हैं – पर आप तो अकादमी की गत जानते हैं – जब बात पकड़ती हैं तभी पकड़ती हैं और जब पकड़ लेती हैं तो पकड़ लेती हैं । फ्रेड मोटेन ने कहा की ” कोई भी कार्य अकेले नहीं किया जाता, सभी काम मिल जुलकर किये जाते हैं हालांकि बहुत बार, चाहे वह कितना ही धुंधला क्यों न हो ऐसा जरूर लगता हैं की आप रच रहे हैं – जैसे किसी पियानो वादक को लगता हैं की पियानो का अभ्यास वो नितांत अकेले करता हैं पर दरअसल पियानो का अभ्यास   

उस क्षण के लिए करना होता हैं जब सभी लोग(साथी वादक भी और सुनने वाले भी) साथ होंगे, उस मिलन के क्षण के लिए “

इस क्षण जब सभी जगह यूरोप में और वैश्विक उत्तरी देशो के आलोचनात्मक शिक्षा विभागों में खास तौर पर यह जोर दिया जा रहा हो की किसी भी कार्य, किताब, लेख में हर समय कई लेखकों के होने का अहसास पूरी तरह से मौजूद होना चाहिए और साथ ही साथ व्यक्ति-समाज के अभिन्न होने की समाजवाद की अवधारणा को मजबूत किया जा रहा हो तब शंकर से यही बात कितनी कठपुतलियां लोकार्पण के दौरान और किताब की प्रस्तावना में भी पहले ही पन्ने पर पढ़कर एक खासा सुकून महसूस हुआ . ये बात मैं इस लिए नहीं कह रहा हूँ की आप किसी राष्ट्रवादी की तरह अपने सब कुछ पहले से जानने के अभिमान से फूलकर कुप्पा हो जाए .बल्कि ये मैं इस लिए कह रहा हूँ की इस किताब को पढ़ते हुए एक गहरी संवेदना का होना बहुत जरुरी हैं वरना आप चूक जाएंगे की हर पंक्ति में कितना कुछ अन्तर्निहित हैं .

गीतों के बहुआयामी होने के, मौखिक धारा के प्रवाह में गीतों के लेखक के निरंतर बनते बिगड़ते रहने के, कठिन परिस्थितयों में, आंदोलन स्थल पर गीतों के नए रूप धारण करने के प्रकार जो अब शायद पहली बार एथ्नोम्यूज़िकोलॉजी (कौमी संगीत विज्ञान) में वर्गीकृत होने से आजाद होंगे, किताब में एक और नयी संभावना भरते हैं.ये संभावना हैं गीतों के वस्तु से पुनः संज्ञा बन जाने की, आक्रामक रूप धारण कर सभी को पिरो लेने की जिसे विभिन्न लड़ाईया लड़ी जा सके .ये गीत शंकर के हैं, मोहन जी के हैं , चुन्नी जी के हैं , भंवर जी के हैं , उन सभी के हैं जिन्होंने इन गीतों को गाया हैं, लिखा हैं , जिया हैं .  ये गीत कठपुतलियों के साथ आंदोलन करते भी हैं और खुद भी आंदोलित होते रहते हैं .यही बहुआयामी गति इस किताब में कई जगहों पर मिलती हैं .

मौखिक इतिहास के लिखित होने की दृष्टि से भी ये एक तरह से स्वतः ही अनुवाद का दस्तावेज हैं जिसमे चाहे आप सामाजिक कार्य न भी करते हों तो हर जगह सरकार से किस तरह लोहा लिया जाए, और उस लिए हुए लोहे को फिर किस किस जगह पर बोया जाए, इसकी पद्धति शंकर के होने में यूँ बसी हैं जैसे फूलो में खुशबु , जहाँ शंकर वहां संघर्ष और संवेदना और इन सभी छोटी छोटी घटनाओ के होने का (और भविष्य में भी हो सकने का ) दस्तावेज ये किताब हैं .

हाँ, अगर वही एथ्नोम्यूज़िकोलॉजी की बात को दो पांच मिनट खींचने की इजाजत दे तो खींच देना चाहता हूँ . खींचकर एथनोग्राफी, एंथ्रोपोलॉजी तक ले जाना चाहता हूँ .कथा में भी और कथ्य में भी बिज्जी का जिक्र आता हैं . विजयदान देथा उर्फ़ बिज्जी .गाँव बोरुंदा, जिला जोधपुर, राजस्थान .राजस्थानी कहानियों के लेखक . नोबल पुरस्कार के लिए नामाँकित. यहीं पर उन्होंने कोमल कोठारी के साथ मिलकर एक रूपायन नाम की संस्था शुरू की . कोमल कोठारी ने लगभग पांच हजार लोकगीत इकट्ठे किये जिन्हे आजकल ARCE नाम के राष्ट्रीय आर्काइव में पहुँचाने की मेहनत में शुभा चौधरी जी, जो की एक वरिष्ठ आर्किविस्ट हैं, प्रयासरत हैं . कोमल कोठारी के साथ एक लम्बे इंटरव्यू से निकलकर एक किताब आयी जो एथ्नोम्यूज़िकोलॉजी में राजस्थान को लेकर एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बनी – राजस्थान – एक मौखिक इतिहास . इंटरव्यू लेने वाले और किताब लिखने वाले व्यक्ति थे रुस्तम भरुचा . रुस्तम प्रदर्शन कला और अंतर्वर्गीयता के सिद्धांत के लिए देश विदेश में जाने जाते हैं  . इस किताब में एक जगह ओरण की बात आती हैं | रुस्तम और कोमल कोठारी रेगिस्तानी भू भाग के, जमीनों के नाम और इन नामों से जुड़ी जानकारियाँ दे रहे होते हैं . ओरण एक ऐसी ही जमीन हैं जिसका विशेष उपयोग हैं .

ओरण जैसे कई शब्द कितनी कठपुतलियां में सहज ही रूप से उपलब्ध होते रहते हैं . ज्ञान की यही सहजता, मगर साथ ही साथ पूरी सूक्षम्ता के साथ उसका निर्वाह , इस बात में सक्षम हैं की एंथ्रोपोलॉजी और एथ्नोम्यूज़िकोलॉजी के वर्गीकरण को तोड़ा जाए .

लोककथा और कथालोक

दुनिया बनाने के लिए क्या सामान लगता है ? इस सवाल का जवाब दर्शन से ज्यादा लोककथाओं में मिलता रहा हैं . हालांकि बिज्जी जैसे कुछ लेखकों ने उस बोली सुनी जाने वाली लोककथा को लिखी छपी जाने वाली कथा में उतारा . ‘दुविधा’ बिज्जी की एक ऐसी ही कहानी हैं जिसमें स्त्री की इच्छा और एक भूत की प्रेम कथा कही गई हैं . इस कथा का स्त्रीवादी लेखिका रुथ वनिता ने ‘डाइलेमा एंड अदर स्टोरीज’ नाम की पुस्तक में अनुवाद किया और फिर ये कहानी अवान्त गार्द फिल्मों के निर्माता मणि कौल ने उसी कहानी को लेकर 1973 में दुविधा नाम से ही एक फिल्म बनाई और आगे चलकर वर्ष 2005 में अमोल पालेकर ने एक फिल्म बनाई पहेली जो 2006 में भारत की तरफ से ऑस्कर पुरस्कार के लिए नामांकित भी हुई .

बिज्जी की लिखी हुई कहानी दुविधा में कठपुतली का जिक्र सिर्फ एक बार आता हैं और वह भी सिर्फ एक उपमा के रूप में तब जब की दुविधा कहानी की नायिका अपने पति के रूप में भूत की बात सुनकर ‘कठपुतली’ की तरह बैठी रहती हैं .ये एक तरह का कठपुतली होना हैं मगर मणि कौल की फिल्म में कठपुतली थोड़ा सा आगे बढ़कर एक उपमान के रूप में ही सही, इसी दृश्य के आस पास एक मुख्य स्थान धारण कर लेती हैं .

जैसे उस कठपुतली को सदियों के स्त्री इच्छाओं के सामाजिक दमन का और नैतिकता और मुक्ति के बीच की निरंतर दुविधा का मानक बनना हो .

https://youtu.be/R-AkW7wVLlA

अमोल पालेकर की बनाई हुई फिल्म पहेली एक कदम आगे बढकर कठपुतलियों में ही दो ‘वरिष्ठ भूतों’ को सूत्रधार के रूप में स्थापित कर देती हैं और फिल्म के पूरी फिल्म के साथ साथ कठपुतलियां बोलती नाचती रहती हैं .

कितनी कठपुतलियां इस अर्थ में कठपुतलियों के उपमान को एक कदम और आगे ले जाती हैं जिसमे वो उपमान से भी अधिक कार्यरत हैं . एक बार फिर से ये कहना होगा की कथा में कथा और कथ्य दोनों एक हो जाते हैं यही किताब में उपन्यास की दृष्टि से विविधता पैदा करता हैं . शंकर की ये आत्मकथा है अतः सच हैं मगर फिर फिर कठपुतलियां मंच पर आती हैं , कभी सन्देश देती हुई, कभी बात को आगे बढ़ाती हुई .

शुरुआत में जब शंकर लखनऊ जाते हैं और कठपुतलियां न खरीद पाकर एक कठपुतलियों की एक किताब ले आते हैं जिससे वे कठपुतलियां बनाने चलाने लगते हैं .शंकर की कठपुतलियों में जोखिम चाचा भी याद रह जाते हैं . गीत दर गीत, गाँव दर गाँव, आंदोलन दर आंदोलन कठपुतलियाँ शंकर के जीवन के संघर्ष को लेकर चलती रहती हैं . वो गाँव गाँव घूमते शंकर के साथ भी हैं ,  वो शंकर भी हो जाती हैं , और वो कई कई लोगो का रूप धारण कर कई कई भाषाओँ में संवाद करती हैं . एक मानक का बहुआयामी होना, एक संपूर्णता का अहसास कराता हैं . ये वो सम्पूर्णता हैं जो कि ब्राह्मणवादिता  की तरह संस्कृतनिष्ठ ज्ञान का बघार नहीं हैं या फासीवाद की तरह सबकुछ जान चुके होने की निर्णायक स्थिती नहीं हैं बल्कि ये तो वो संतुष्टि हैं जो लोककथा वृत्त में होती हैं .

सामाजिक कार्य और आंदोलन से जुड़े होने के कारण, यहाँ लोक कथाओं और कठपुतलियों के लिए भी एक संभावना हैं जिसमे वो किसी भी फोक-नास्टैल्जिया से दूर, एक्जोटिक होने से बचती रहती हैं और किताब को किसी भी तरह के सांस्कृतिक पैतृकता से बचाती हैं . शंकर जी की कठपुतलियाँ किताब में भंवर जी के माध्यम से लगातार आंदोलन करती हैं और इसी के कारण वो खुद भी उपमान की तरह कहीं नहीं रुकती .

भूख और जातिवाद का विभत्स रूप

जैसा की यहाँ पहले कहा हैं कि किताब में यथार्थ ऐसा हैं जो यथार्थ की खबर से आगे बढ़ शंकर के साथ क्रांति हो जाता हैं . खुद शंकर के जीवन का संघर्ष, उनके लगातार सत्रह काम बदलने, पोल्ट्री फार्म में काम करने, वही सोने इन सब बातो के विवरण में एक संवेदना आपके स्वयं के भीतर जन्म लेती हैं . खुद अपनी ही बात कहूँ तो गाँव से होने के बाद भी सूदखोर दूकान वाले परिवार से होने के कारण मैं बालपन में भूख से बचा रहा और आगे की शिक्षा में भी बहुत हद तक उसी सूदखोरी का संरक्षण मिला की इंजीनियरिंग में प्रवेश हो पाया और शंकर का विवरण पढ़ते हुए, ये किताब लगातार काटती कचौटती रही की आख़िरकार उसी शोषण ने तो मुझे स्वयं को बनाया हैं .

तो क्या सिर्फ ग्लानि होना ही पर्याप्त हैं ? कुछ जगहों पर किताब ने मुझे अपने भूख के दिनों की याद दिलाई जब यंहा जिनेवा में पढ़ते हुए ऐसे दिन भी रहे की पूरे सप्ताह को सिर्फ एक ब्रेड और दूध पर चलाना था, कभी कभी आलू उबालकर भी काम चलाया .पढाई के साथ काम मिलना असंभव सा था और छात्रवृत्ति पाने के लिए शोषणवादी और पूंजीवादीं फाउंडेशन की आराधना करना सिद्धांतो के खिलाफ. जो कोई छोटी मोटी नौकरी मिली उसमे तनखाह का एक महीने से अगले महीने कोई पक्का हिसाब न था . समाज से बाहर शादी होने के कारण परिवार से पहले ही बहिष्कृत था और घर से पैसे मांगना असंभव था .अस्सी पैसे में बीस पैसे और दस पैसे के चार सिक्को को कई बार गिना और महीना खुलते ही सारी तनखाह के ख़त्म हो जाने के भय को महीनो तक कई बार जिया . कुछ बाते इस दौरान साफ़ हुई की व्रत और उपवास या डाइटिंग की भूख का असल भूख से होने वाले भय से बहुत दूर का रिश्ता होता हैं . इतना दूर का रिश्ता की पवित्रता, नैतिकता, समाज इन सब को कई बार ठुकराकर आगे निकल जाने का मन चाहता हैं . इसी जगह पर उच्चवर्गीय और सवर्ण संवेदना की मानवीयता और दयालुपन हार जाता हैं .

किताब में फेफी बाई के विवरण ने या उन बच्चों के विवरण ने जिनके माता पिता गुजर गए बहुत हद तक झझकोर दिया . ये वही पड़ाव हैं जहाँ आकर संस्कृति, राजनीति, अर्थव्यवस्था सारे बंधे बँधाए लेखन के विभाग टूट जाते हैं . शंकर के पढ़ने का संघर्ष और उस संघर्ष में भी शंकर के अपने मूल्यों के संघर्ष कितनी ही रपटों से बह निकले और यूँ कि कहीं कहीं तो कुछ नहीं रहा .इसलिए ये किताब आपके होने में एक परिवर्तन लाती हैं .

उदय प्रकाश की कहानी मोहनदास के सामान ही शंकर का डिग्री का संघर्ष बहुआयामी हैं (एक बार फिर से कहूंगा की किसी कहानी की तरह यथार्थवादी नहीं हैं ,यथार्थ ही हैं). इसमें शिक्षा पाना, मुश्किलों से पायी हुई शिक्षा को नौकरी के लिए छुपाना, नौकरी करते हुए वर्गीय हिंसा को सहना और सुविधा की नौकरी को छोड़कर आगे बढ़ जाना जैसे कई पड़ाव हैं . इसलिए किसी पूंजीपति की जीरो से एक विशाल साम्राज्य बना लेने के नायक कथानक के रूप में या किसी आदर्शवाद के रूप में नहीं बल्कि शंकर एक संभावना के रूप में खड़े होते हैं . ये वो संभावना हैं जिससे आप सम्पूर्ण रूप से सारे पड़ावों पर आंदोलित होते हैं . ये वो संवेदना हैं जो सिर्फ मानवीय से बढकर उत्तर-मानवीय नहीं होती बल्कि अंतर-मानवीय भी हो रहती हैं .इसमें वो परिस्थतिया हैं जिनसे संस्कृतिक आन्दोलन, जन आंदोलन में बदल जाता हैं .

हर सामाजिक कार्य करने वाले के लिए तो ये किताब मैनुएल है ही मगर गाँव कस्बो में रह रहे लोगो के लिए भी आस पास के सिस्टम से , सरकारी ताकतों से , सामूहिक हिंसा से , जातिवाद से किस तरह संघर्ष ले और इस संभावना के लिए की आप खुद भी ये संघर्ष कर सकते हैं ये किताब जरूर पढ़ी जानी चाहिए .

अंत में यही कहना हैं कि कुछ और पुस्तके भी पढ़नी थी इस समीक्षा को लिखने से पहले और दो किताबे पढ़नी थी, अरुणा जी की किताब ‘आर टी आई कैसे आई’ और निखिल डे की किताब, वी द पीपल भी पढ़नी थी . अभी तक नहीं पढ़ पाया और सोचा की इस समीक्षा को आप तक पहुँचाना पहले जरुरी हैं . जब पढूंगा शायद एक बार फिर से मौका मिलेगा की उन किताबों के कथ्य के माध्यम से कितनी कठपुतलियां किताब के बारे में कुछ बाते और खुले .

जिंदाबाद, जय भीम, राम सलाम, लाल सलाम

( विनीत अग्रवाल सॉफ्टवेयर इंजीनियर, कवि एवं शोधकर्ता हैं . विनीत ने जिनेवा में कला एवं आलोचनात्मक सिद्धांत, साइबरनेटिक्स एवं शोधकार्य विभाग से मास्टर्स वर्ष 2019 में ऑरलॉस्मोसिस नामक शोध के साथ पूरी की . पिछले एक वर्ष से विनीत पूर्वी जर्मनी और शीत युद्धकाल में सिनेमा, अंतर्राष्ट्रीयवाद और समाजवाद के शोध विभाग में HEAD जिनेवा में कार्यरत हैं ) 

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