भारतीय सामाजिक व्यवस्था पर करारा प्रहार करती है पुस्तक “कब तक मारे जाओगे”

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( डॉ. प्रवीन कुमार )
पुस्तक ‘कब तक मारे जाओगे’ युवा कवि नरेंद्र वाल्मीकि द्वारा सम्पादित दूसरा काव्य संग्रह है। इससे पूर्व वे “व्यवस्था पर चोट” नामक एक अन्य काव्य संग्रह भी सम्पादित कर चुके हैं। नरेंद्र वाल्मीकि को मैं लगभग पिछले पंद्रह सालों से जानता हूँ। यह सन् 2007 की बात है, तब मैं चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय परिसर, मेरठ  में एम०फिल इतिहास विषय का छात्र था तब नरेंद्र मुझे खोजते हुए इतिहास विभाग में आए और मुझसे मिले। वे उस समय छात्र राजनीति में भी सक्रिय रहे तभी से मेरा उनका मिलना अक्सर होता रहा तथा साहित्य एवं समाज के प्रति मेरे और उनके समान लगाव के कारण ही मेरी और उनकी अभी तक अच्छी मित्रता हैं। 

नरेंद्र एक अच्छे कवि व लेखक होने के साथ-साथ एक संवेदनशील व्यक्ति भी है। पुस्तक “कब तक मारे जाओगे’ का प्रथम संस्करण वे किन्हीं कारणों से वे मुझ तक पहुँचा न सके इस बीच लगभग दो-तीन महीने का समय भी बीत चुका था और मैं भी उनसे कुछ नाराज था कि वे मुझे पुस्तक क्यों नहीं भेज पाए तब तक पुस्तक का दूसरा संस्करण भी आ चुका था। पुस्तक को वे अब तक मुझ तक पहुँचाना टाल न सके और जैसे ही पुस्तक प्रकाशक ने सहारनपुर भेजी नरेंद्र जी स्वयं पुस्तक भेंट करने मेरे घर आए वास्तव में यह उनकी संवेदनशीलता और कर्तव्य का ही प्रकटीकरण हैं। मैं भी पुस्तक “कब तक मारे जाओगे” को पढ़ने के बाद इस पर अपनी राय व्यक्त करने से अपने आप को रोक नहीं पा रहा हूँ। साफ-सफाई का कार्य पूरी दुनिया में किया जाता है, सफाई कर्मचारी भी पूरी दुनिया में पाए जाते हैं लेकिन किसी जाति विशेष का यह कार्य है। यह सोच और व्यवस्था केवल भारत में ही प्रचलित है।

साफ-सफाई का कार्य भारत में केवल एक जाति विशेष से ही कराया जाता है। “कराया जाता है” मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि हिंदू धर्म ग्रंथों में विशेषतः यह उल्लेख है कि यह कार्य एक जाति विशेष के लोग ही करे। हजारों सालों से एक जाति विशेष के लोग ही यह कार्य करते आए हैं। इस कार्य से इन लोगों का जीवन यापन तो होता रहा लेकिन इतने महत्वपूर्ण कार्य को करते रहने के बावजूद भी इन लोगों की न तो आर्थिक स्थिति में ही कोई विशेष बदलाव हो सका और सामाजिक स्थिति में भी ज्यादा बदलाव न हो पाया। शायद यही कारण है कि नरेंद्र वाल्मीकि को सभी सफाई कर्मचारियों की व्यथा पर यह काव्य संग्रह प्रकाशित कराना पडा़। 


संग्रह में बारह राज्यों के बासठ कवियों की लगभग सौ कविताएँ हैं। अलग-अलग राज्यों से तथा कवियों के अलग जाति/वर्ग का होने के कारण सफाई कामगार जातियों के साथ होने वाले भेदभाव के प्रति उनके अनुभव भी अलग है जिसका प्रतिबिंब इन कविताओं में आया है। सफाई कामगार जातियों की समस्याओं पर अपनी तरह का यह पहला काव्य संग्रह है। यह पुस्तक निश्चित रूप से सफाई कामगार जातियों के उत्थान मे मिल का पत्थर साबित होगी। नरेंद्र वाल्मीकि को इस अति महत्वपूर्ण कार्य को प्रकाश में लाने के लिए हार्दिक बधाई। 

पुस्तक : कब तक मारे जाओगे,सम्पादक : नरेंद्र वाल्मीकि,प्रकाशक : सिद्धार्थ बुक्स शाहदरा, दिल्ली-110032,पृष्ठ : 240,  मूल्य : ₹150

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