मानसिक तनाव व खुदकुशी का सामाजिक पहलू

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(नीरज ‘थिंकर’)

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के साथ ही ‘डिप्रेशन’ और ‘मेंटल हेल्थ’ पर एक बार फ़िर से जोर-शोर से डिबेट शुरू हो गयी है..हालांकि आत्महत्या के आंकड़ों की अगर हम बात करें तो विश्व स्वास्थ्य संगठन(WHO) के अनुसार पूरी दुनिया मेँ हर वर्ष 8 लाख लोग आत्महत्या करते है जो की तक़रीबन 40 सेकंड मेँ 1 व्यक्ति की आत्महत्या के रूप में देखने को मिलता है | WHO के अनुसार एक रिसर्च में यह भी देखने में आया है कि जब कोई व्यक्ति आत्महत्या करके मरता है तो वो व्यक्ति उससे पहले 40 बार अनेक तरीकों से ख़ुदख़ुशी करने का प्रयास करता है | भारत की बात करे तो राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार 2017 में आत्महत्या के मामले 1,29,887 थे जो 2018 में बढ़कर 1,34,516 हुए और यें दर लगातर बढ़ रही है, वहीं शहरों में आत्महत्या की दर (13.3) अखिल भारतीय आत्महत्या दर की तुलना में (10.2) अधिक थी | अगर हम आत्महत्या करने के मुख्य साधनों की बात करे तो 2018 में 51.5 % मामले ‘फाँसी लगाने’, 26.7% मामले ‘जहर खाने’, 4.9 % मामले ‘डूबकर मरने’ व 4.4% मामले ‘आत्मदाह’ से हुए | साथ ही हम अगर कारणों की बात करे तो मुख्य रूप से ‘पारिवारिक समस्याएं'(विवाह सम्बन्धी समस्याओं के अलावा) व ‘बीमारी’ है जो की 2018 में क्रमशः  30.4 % व 17.7 % थी |  वर्तमान वर्ष का आंकड़ा उपलब्ध नहीं है पर हम इन आंकड़ों से हमारे देश में होने वाली आत्महत्या का अंदाजा लगा सकते है | हमारे देश में आत्महत्या को एक अपराध माना जाता है आईपीसी (IPC) की धारा 309 के तहत आत्महत्या की कोशिश करने पर एक साल की सज़ा या ज़ुर्माने का प्रावधान है..आत्महत्या को अपराध की श्रेणी से बाहर निकालने के लिए वर्तमान सरकार प्रयास कर रही है जिसमें 18 राज्य व 4 केंद्र शासित प्रदेश पक्ष में है, हालांकि यह एक डिबेट वाला मुद्दा है |

ऐसे बहुत से कारण है जो किसी व्यक्ति को खुदकुशी करने के लिए उकसाने का काम करते है जैसे की अकेलापन. आख़िर अकेलापन होता क्या है ? जितना दिखने में ये सरल और सुगम है उतना यह है नहीं । यह केवल एक शब्द ही नहीं है, इसको परिभाषित करना इतना आसान भी नहीं है कि इसके बारे में दो से तीन लाइन लिख या बोल कर समझा दिया जाये । दरअसल,जब हम इसे परिभाषित करने के लिये इसकी परत दर परत उधेड़ कर इसे खँगालते है तब हमें ऐसे तथ्य हाथ लगते है जिन्हें समझने के लिये हमें विभिन्न आयामों का सहारा लेना पड़ता है ।

आख़िर ये आयाम क्या है ? ये आयाम वो चीज़ है जो अकेलापन को जन्म देने वाले कारकों को समझने में सहायता करते है । अकेलेपन के कई आयामों में से सबसे महत्वपूर्ण आयाम है सामाजिक विच्छेद,इसमें हम समाज से अलग हो जाते है और हमेशा एकाकीपन महसूस करते रहते है । अब सवाल यें उठता है कि हम जानबूझकर समाज से पृथक होते है या हमें प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से अलग किया जाता है | किसी भी प्रकार से आया एकाकीपन हमारे जीवन में नकारात्मकता भरने का काम करता है, हम हमारे अंदर चल रही विचारक्रांति को समाज के डर से बाहर निकालने की बजाय उसे और दबाने लगते है जिससे वो और बड़े रूप में भयावह तरीके से बढ़ती जाती है..हम अपने पास ऐसा कोई उपयुक्त व्यक्ति नहीं पाते है, जिससे खुलकर हम हमारे मन की बातें कह सकें और इस डिजिटलाइज़शन के दौर में व्यक्ति-व्यक्ति के बीच की दूरी भले ही कम हुयी है पर सिर्फ़ वर्चुअली(आभासी रूप से ), फिजिकली तो लोग दूर ही होते जा रहे है और वर्चुअलि पास आते जा रहे है जो कहीं न  कहीं जीवन में अवसाद लाने का भी काम कर रहा है.. लोगों के पास इतना समय नहीं है कि वो किसी की बात इत्मीनान से सुन सकें..हर कोई एक अंतहीन दौड़ में दौड़े जा रहा है | लोगों का हमारे जीवन से सिर्फ़ अपने मतलब के लिए आना कुछ वक़्त ठहरना और चले जाना और हमें जरुरत पड़ने पर व्यस्त होने का बहाना बनाना…और आखिर सबकुछ हमें स्वयं को झेलना ..हमारा उनसे एक उम्मीद पालना..फ़िर उस उम्मीद का टूटना हमें हताश कर देता है हमारी मन:स्थिति अस्थिर हो जाती है हम..धीरे-धीरे टूटने लगते है और यें प्रक्रिया हमारे जीवन में अवसाद पैदा करने का काम करती है |

पारिवारिक समस्याएं जिसमें विवाह से सम्बंधित मुद्दे भी शामिल है भारत में आत्महत्या का बहुत बड़ा कारण है जिसमें व्यक्ति परिवार की जिम्मेदारी के चलते अपनी इच्छाओं का गला घोंटता है,अपने सपनों को मारता है..अपने घर वालों की चाह में अपनी चाह को सम्मिलित कर देता है चाहे वो अपनी प्रेमिका को छोड़ना हो या अपनी मन-पसंद की लड़की से शादी न करके अपने घर वालों की पसंद से शादी करना हो…मैंने अपने ऑब्जरवेशन से पाया कि राजस्थान में अधिकतर विवाह बेमेल होते है जो सिर्फ़ कुछ वक़्त तक ही चलते है या तो लड़की कुएँ में कूद कर जान दे देती है या भाग जाती है अपनी पसंद के लड़के के साथ और लड़का भी एक समय तक ही बिना मर्ज़ी वाली शादी के बंधन में बंधा रहता है या तो अपनी प्रेमिका के साथ जहर खा कर मर जाता है या घर वालों को छोड़ कर भाग जाता है..घर वाले समाज में बदनामी के डर से खुदकुशी कर लेते है..भारत में लोग अपनी जाति पर इतना गर्व करते है कि अगर कोई लड़का या लड़की दूसरी जाति में शादी कर ले तो वो उस लड़के या लड़की का मरना उचित मानते है उन्हें लगता है कि यें समाज के कलंक है इनका जिंदा रहना सामाजिक दृष्टिकोण से ठीक नहीं है..समाज भागने वाले जोड़े को पकड़ के मारे उससे पहले ही प्रेमी जोड़ा कहीं जाकर मौत को गले लगा लेता है..

आखिर यें समाज का डर, अपनी जाति का गर्व, मर्यादा इतनी ज्यादा हावी क्यों है कि जीवन से ज्यादा मौत को उचित मानती है..क्यों किसी को जीने के लिए एक स्पेस व एनवायरनमेंट नहीं दे पाती है | चारों तरफ मारने-मरने का ही वातावरण बनाया जाता है जहाँ पर सब कुछ पूर्व निर्धारित सोशल आर्डर से ही चलता है अव्वल तो यह कि कोई उस से हटकर कदम उठाने का फैसला नहीं करता है और जो करता है वो या तो बदनामी, समाज के डर, व समाज द्वारा दी जाने वाली नाना प्रकार की यातनाएं,प्रताड़ना ,सामाजिक रूप से बहिष्कृत करना गांव से बाहर निकालना इत्यादि चीज़े उसे खुद की जान लेने के लिए बाध्य कर देती है …और अगर वो खुदकुशी नहीं भी करता है तो ‘ऑनर किलिंग’ के रूप में उसे मार कर कहीं लटका दिया जाता है और खुदकुशी करार दिया जाता है |

लेकिन हमारा समाज बहुत ही ‘ट्रेंडिंगवादी’ है जब कोई घटना बड़े स्तर पर घटती है तो और सोशल मिडिया जैसे वर्चुअल प्लेटफार्म पर ट्रेंड करने लगती है तो तुरंत शरीक हो जाता है और उस आभासी दुनिया में मुद्दे के ट्रेंड में रहने तक अपनी भावनाएँ अलग-अलग प्रकार से प्रकट करता है वहीं समाज में ख़ुद व्यक्तिगत रूप से खुदकुशी करने के लिए उकसाने वाली परिस्थितियों के निर्माण में भी शरीक होता है और जब भी अपने आस-पास जाति के गर्व के नाम पर, धार्मिक उन्माद के चलते, प्रेम-प्रसंग के कारण या मानसिक तनाव व पियर प्रेशर के चलते कोई आत्महत्या करता है तो वो ही ‘ट्रेंडिंगवादी’ व्यक्ति चुप बैठा रहता है न तो अपनी भावनाएँ वर्चुअल रूप से और न ही फिजिकली प्रकट करता है …आखिर यें भावनाएँ इतनी सलेक्टिव कैसे हो सकती है |

हम जीवन में पांच चीज़ों के बीच सामंजस्य बिठा कर अपने जीवन में आने वाले अवसाद, मानसिक तनाव से  बच सकते है जिसमें शामिल है:- स्वास्थ्य, धन-सम्पदा,कार्य(ऑफिस वर्क, बिज़नेस वर्क इत्यादि), परिवार, सामाजिक या सार्वजनिक जीवन |  हालांकि और भी ऐसे पैमाने होंगे जो व्यक्तिगत स्तर पर  परिस्थति के अनुसार अपने जीवन में एकसार व् तनाव् मुक्त रहने में सहायता कर सकते है |

आत्महत्या का बहुजनवादी द्रष्टिकोण

अगर हम आत्महत्या को बहुजन परिप्रेक्ष्य से देखे तो आत्महत्या के कारणों में काफ़ी भिन्नता नज़र आती है. दलित-बहुजन  समुदाय में खुदकुशी के मामले जातिय हिंसा व प्रताड़नाओं का नतीजा है..जो की व्यक्तिगत न होकर सामुदायिक है..जहाँ पर उसके ऊपर सामाजिक स्तर पर अत्याचार होता है..उसे प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूपों से परेशान किया जाता है…यें सबकुछ एक छात्र जो किसी मेरिटधारी से मुकाबला करता है..और देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में पढ़ने जाते है..उनके साथ जाति के आधार पर भेदभाव किया जाता है, परेशान करने की सारी हदें जब पार कर दी जाती है तब अंत में वो छात्र आत्महत्या करने का फैसला करता है, इसी तरह से एक जाति व समुदाय आधारित अत्याचार, भेदभाव व छुआछूत जो की संरचनात्मक है दलित-बहुजनों की जान लेती जिसमें न जाने कितने रोहित वेमुला, पायल तड़वी मारे जाते है और वर्तमान में केरला की एक दलित लड़की इसलिए आत्महत्या करती है क्यूंकि वो ऑनलाइन क्लास ज्वाइन नही कर पाती है यें सब समाज व सिस्टम के जातिवादी रवैये व खोखलेपन के कारण होता है,दलित-बहुजन समाज में संसाधनों का आभाव, अवसर की कमी, कार्यस्थल पर भेदभाव, स्कूल व् कॉलेजों में स्वर्ण समुदाय के छात्रों द्वारा जातिगत प्रताडनाएं इत्यादि उनकों आत्महत्या के लिए उकसाती है |

वंचित समुदायों में आत्महत्या जैसा कदम उठाने की भावना बहुत ही मुश्किल से जन्म लेती है वो भी व्यक्तिगत कारणों से नहीं बल्कि जातिजन्य ढांचेगत शोषण व् भेदभाव के कारण होता है..रोहित वेमुला जैसा होनहार और मुखर स्कॉलर आत्महत्या कर लेता है लोग उसे कायर कहते है लेकिन क्या कोई उसका आत्मघात करने का निर्णय लेने तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया की जाँच-पड़ताल करता है ? देश में घटने वाली तमाम आत्महत्या की घटनाओं को एक ही चश्में से देखना उचित नहीं है | वर्षोँ से जिस समुदाय के पास सत्ता और संसाधन का आधिपत्य रहा हो उसमे किसी दलित-बहुजन समुदाय से आने वाले लोगों का शामिल होना या हिस्सेदारी मांगना, बराबरी करना उन्हें बिलकुल पसंद नहीं आता है और जो उनके द्वारा दलितों को उन संस्थानों से बाहर निकालने व् शिक्षा से वंचित करने के रूप में अलग अलग रूपों में परिणीत होता है..वे रोहित वेमुला जैसे छात्रों को टारगेट करते है जो अपने हकों के लिए आवाज उठाते है |

वंचित समुदाय के लोगों के साथ जातिजन्य भेदभाव करना, उन्हें प्रताड़ित करना और अगर इस प्रक्रिया में उनका थोडा मानसिक रूप से अस्थिर हो जाना , स्वर्ण समुदाय के लिए एक मौका हो जाता है इनको कम मेरिटधारी कहने का व् आरक्षण को गाली देने का !! जो लड़का या लड़की एक ऐसे समुदाय से आता है जहाँ उसे और उसके परिवार वालों को हर रोज जातिगत गालिया दी जाती हो, छुआछूत की जाती हो जब वो बड़े शहरों में पढने जाता है तो उन शैक्षणिक संस्थानों में जब इस सब की पुनरावृत्ति होती तब उस छात्र की क्या मनोदशा होगी यह सोचने वाली बात है !!

आत्महत्या के कारणों में जो एक और प्रमुख कारण है वो है ‘बीमारी’ वंचित समुदाय जो अपनी बीमारियों का इलाज समय पर संसाधनों के आभाव में नहीं करा पाते है, और उनकी बीमारी बढ़ती जाती है जो आगे चलकर असहनीय हो जाती है, अन्धविश्वासों के चलते अपनी बीमारी का इलाज़ स्थानीय मंदिरों, देवरों व् भोपों के सहारे छोड़ देते है जो की उनकी परेशानी और बढ़ाते जाते है और अंत में अपनी परेशानी से तंग हो कर अपनी बीमारी के दर्द से निज़ात पाने के लिए मौत को गले लगा कर जीवन से मुक्त हो जाते है !!

वहीं दूसरी और उच्च समुदाय से आने वाले लोगों द्वारा की जाने वाली आत्महत्याओं का संदर्भ अलग है इसका  स्वरूप व्यक्तिपरक(इंडिविजुअलस्टिक) है इसमें जाति की कोई भूमिका नहीं होती है ये उनके काम मे अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाने, अपने सहकर्मी से ऊपर उठने की लालसा, अपने ड्रीम्स को पूरा नही कर पाने की कुंठा आदि के कारण होता है !!

मेंटल हेल्थ और डिप्रेशन को दलित-बहुजनों के लिए अप्रासंगिक बता कर नकार देना सही नहीं है, हाँ ये जरुर है की इसका जो स्वरुप है वो भिन्न है सवर्णों के मुकाबले में और इससे उभरने के तरीके भी दोनों संदर्भ में अलग है ये संसाधनों की उपलब्धता के कारण भी है जहाँ दलित-बहुजन समुदाय के पास पहले से ही अपने निजी व् सार्वजनिक जीवन में इतनी परेशानियां है जिसके चलते ये मुद्दे व् समस्याएँ उसके लिए गौण हो जाती है. वहीं सवर्ण समुदाय इससे निपटने के लिए मनोचिकित्सक से परामर्श लेता है व् इसका इलाज कराता है !!

(लेखक – पूर्व छात्र, टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान, मुंबई  व् वर्तमान में राजस्थान में सामाजिक मुद्दों को लेकर सक्रीय)

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