रेत : उपेक्षित वर्ग की यथार्थपरक दास्तान

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( डॉ रामानंद कुलदीप )


आधुनिक हिंदी साहित्य के नामचीन रचनाकार हैं भगवानदास मोरवाल । निपट ग्रामीण परिवेश के माहौल में पले-बढ़े होने के बावजूद बिना किसी विरासतीय बपौती के साहित्यिक जगत में जो वजूद आपने स्थापित किया है, वह न केवल सराहनीय है अपितु अनुकरणीय भी है ।

कोरोना काल की अन्यमनस्कता  व किंकर्तव्यविमूढ़ता मैं मैंने ‘काला पहाड़’ व ‘वंचना’ उपन्यास के बाद अभी-अभी ‘रेत’ उपन्यास पढ़ा। यद्यपि में हिंदी साहित्य में अनाधिकृत हस्तक्षेप करता हूँ परंतु यह भी विश्वास करता हूँ कि आम पाठक भी यदि किसी रचना पर कोई अपनी राय जाहिर करे, तो यह हिंदी साहित्य के लिए शुभ संकेत होगा। मोरवाल जी का यह उपन्यास ‘रेत’ कथावस्तु की दृष्टि से बड़ा रोचक है ।

भारतीय समाज के एक उपेक्षित वर्ग की नितांत यथार्थपरक दास्तान है यह रचना । किसी भी पाठक के लिए जो इस देह व्यापार की दुनिया से अनजान है, ज़रायमपेशा समाज के तमाम ताने-बाने बारीकी से यहाँ उपलब्ध है । महत्वपूर्ण यह है कि सियासी चालें व स्वार्थी सत्तालोलुपों ने किस प्रकार सदियों से समाज को गहरे अंधकार के गर्त में डाल रखा है और दैहिक-शोषण को उनकी नियति बना दिया गया है। आशा व निराशा , अपेक्षा और उपेक्षा की मिश्रित अभिव्यक्ति है यह उपन्यास ।

उपन्यास की कथा का जो परिवेश है ‘गाजूकी’ गांव  उपन्यास की जीवंतता को बढ़ा देता है। उपन्यास का मुख्य पात्र वैद्यजी निस्वार्थ, निष्कपट,  निष्कलुष, निस्पृह ढंग से उपस्थित रहता है । लगता है इस समाज की पीड़ा वैद्यजी की पीड़ा बन गई । हर उस अवसर पर वेदजी गाजूकी में पहुंच जाते हैं जब कमला बुआ किसी परेशानी में होती है। वैद्यजी भली-भाँति देह-व्यापार की परेशानियों को समझते हैं । शारीरिक बीमारियाँ और इनसे भी घिनौनी पुलिस व प्रशासन की जिल्लत, जिसको यह समाज मजबूरी मे स्वीकार करता है यह  वैद्यजी के लिए दुखदाई है । इसलिए गाहे-बगाहे वैद्यजी रुकमणी व अन्य को इस पेशे को छोड़ने व इस नरक से निकलने की सलाह देते रहते हैं ।

वैद्यजी की सलाह का ही असर है या वक्त की नजाकत को समझने की रुक्मणी की क्षमता कि वह सावित्री एवं मुरली जैसे राजनीतिक व्यक्तित्व के साथ जुड़कर राजनीतिक दाँवपेंच सीख जाती है और अंत में चुनाव जीतकर राज्य सरकार में मंत्री बनती है। रुकमणी एक संदेश है, एक आशा है, हर उस स्त्री के लिए जो समाज व वक्त के द्वारा प्रताड़ित है । उपन्यास के शीर्षक ‘रेत’ जो जीवन के कण-कण के बिखराव का संकेत है, के विपरीत दृढ़ इच्छाशक्ति के द्वारा अपनी जिजीविषा से रुकमणी जीवन के बिखराव को संगठित कर तथाकथित इज्जतदारों की श्रेणी में ऊंचाई पर जा बैठती है ।

दूसरी महत्वपूर्ण पात्र कमला बुआ एक ऐसी पात्र है, जो इस समाज की स्त्री की दुर्दशा से अंदर ही अंदर दुखी है परंतु इसे नियति मानकर पूरी दृढ़ता से हर परिस्थिति का मुकाबला करती है। कमला बुआ एक दबंग, दूर दृष्टि व एक सफल नेतृत्व क्षमता से युक्त महिला है , जो हर क्षण सतर्क और सावधान रहकर समाज के हितों की चिंता व रक्षा करती है । उपन्यास ‘रेत’ अनेक विषयों पर एकसाथ पाठक की चेतना को झकझोरता है ।

उपन्यास में आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक व धार्मिक सभी दृष्टि से एक समाज विशेष को आधार बनाकर गहन चिंतन प्रस्तुत किया गया है । यह आर्थिक विडंबना ही है जिसके कारण इस समाज की स्त्रियों को अपना शरीर बेचने के लिए विवश होना पड़ता है । धार्मिक दृष्टि से भूरा पीर की मज़ार का उतरोत्तर प्रसिद्धि पाते जाना मानवीय जीवन की कमजोरी का एक और पक्ष है । राजनीतिक   दाँवपेंच और उठापटक जिसमें धोखेबाजी, षड्यंत्र शामिल है इस उपन्यास में मुरली व तिवारी जी जैसे पात्रों के माध्यम से बखूबी दिखाए गए है ।

यह उपन्यास प्रचलित व मान्य परंपराओं के विरुद्ध विद्रोह करने वाली स्त्रियों के रूप में संतो व रंभा का मार्मिक चित्रण प्रस्तुत करता है। एक समाज विशेष में प्रचलित शब्दों का प्रयोग यथा- कज्जा, खिलावडी, इज्जतदार आदि इस उपन्यास की मौलिकता में वृद्धि करते हैं और पाठक की चेतना के दायरे को विस्तृत करता है। उपन्यास कई अवसर पर पाठक के अंतर्मन में एक चिंतायुक्त आंदोलन, विचलन,स्पंदन उत्पन्न कर देता है । जिसका एक उदाहरण है जब पिंकी कहती है उसे तो बुआ बनना है, या जब रंभा को देह व्यापार के लिए बांटे पर दिया जाता है इन दृश्यों में मानवता तार-तार होकर बिखरती लगती है ।

हर दृष्टि से पिछड़े वर्ग के रूप में जीवन जीने वाले समाज की वेदना पूर्ण दास्तान प्रमाणिकता से प्रस्तुत करने के लिए मोरवाल जी को बधाई।सामान्य पाठक हूँ । इतना ही समझ पाया।


( लेखक अजमेर, राजस्थान में  दर्शनशास्त्र के प्राध्यापक हैं )

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