लोग हो गये गोरधन !

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( राजा राम भादू )
दीपावली से जुड़ी पर्व- श्रृंखला में गोबर्धन भी एक पर्व है। इस दिन की महिमा मैं ने वैसी अन्यत्र नहीं देखी जैसी ब्रज में विद्यमान है। मथुरा के निकट गोबर्धन है। उसी अंचल में गोवर्धन पर्वत स्थित है। पहाड की परिभाषा के हिसाब से देखें तो यह एक छोटी पहाड़ी जैसी भू- आकृति से ज्यादा नहीं है। इससे कई गुना बड़ा तो कुछ दूर मेवात का काला पहाड़ है। लेकिन गोवर्धन को महिमा उस पौराणिक आख्यान से मिली है जहां यह देवताओं के राजा इन्द्र से संघर्ष में ब्रज- वासियों की ढाल बन गया था।अब हजारों लोग दूर- दूर से चलकर साल में दो- तीन बार इसकी परिक्रमा करने आते हैं। इसका परिक्रमा- मार्ग सात कोस में फैला है जो कई बार जन- संकीर्ण हो जाता है। गोबर्धन त्यौहार का संदर्भ इसी के प्रसंग से जुड़ा है। ब्रज क्षेत्र में महिलाएं इस दिन गोबर से जमीन पर एक आकृति बनाती हैं जिसे शाम को सभी लोग इकट्ठे होकर पूजते हैं। गोबर्धन की आकृति के इर्द गिर्द गाय- भैंस- बकरी वगैरह पालतू पशुओं की भी आकृतियाँ गोबर से ही बनायी जाती हैं। अगली सुबह इसे विसर्जित कर दिया जाता है। इस दिन गोवर्धन की परिक्रमा का महात्म्य और भी ज्यादा माना जाता है।


यह आठवें दशक के शुरूआती साल थे। मैं भरतपुर में अपनी स्नातकोत्तर की पढाई कर रहा था अथवा कर चुका था। यह मैं किसी दंभ से नहीं कह रहा हूँ कि मुझे आरम्भ से ही सांस्कृतिक, धार्मिक और साम्प्रदायिक के बीच अंतराल नज़र आता था। आगे चलकर जीवन- अनुभवों, बहसों और अध्ययन से इन अंतरालों में व्याप्त अंतर और स्पष्ट होता गया। इसलिए मैं वामधारा से जुडने के बाबजूद थोडा भिन्न कामरेड था। उन दिनों हमारे शहर में एक साथी बीकानेर से स्थानांतरित होकर आये थे। उनकी कथित वैचारिक दृढताएं जडता की हद तक मजबूत थीं। वे जनवादी लेखक संघ की शीर्ष इकाई में सूचीबद्ध थे और रामविलास शर्मा के प्रबल पक्षधर। एक शाम को मैं अपने घर के पास नुक्कड़ पर पान वाले की दूकान के पास खडा था। तभी वे साथी दो स्थानीय साथियों के साथ आये। हम खडे बात कर रहे थे कि तभी पान वाले ने अपनी दूकान की बत्ती जलायी और हमें राम- राम की, प्रत्युत्तर में मैं ने भी हाथ जोडकर उसे राम- राम की। हम लोग दूकान के एक तरफ खडे बात कर रहे थे तो बीकानेर वाले कामरेड ने मुझसे सिगरेट पिलाने की गुजारिश की। उन्हें पता था कि मेरी वहाँ उधार चलती है। मैं ने उन्हें बताया कि पान वाले ने अभी बत्ती जलायी है, उसकी बोहनी नहीं हुई इसलिए अभी वह उधार नहीं देगा। हमें थोडी प्रतीक्षा करनी चाहिए।

इस प्रतीक्षा- काल में उस शीर्ष साथी ने मेरी क्लास लेना शुरू कर दिया, मेरे प्रत्युत्तर में हाथ जोडकर राम- राम करने को तो अपराध की तरह माना ही, यह भी कहा कि मैं पान वाले को बोहनी होने जैसी रूढि से भी मुक्त नहीं करवा सका। मैं यथासंभव उनके तर्कों का प्रतिकार करता रहा।  बीकानेर के ये साथी कवि हरीश भादानी से अपनी नजदीकियों का अनवरत बखान करते रहते थे। वैसे उनकी नजदीकी पर किसी को संदेह नहीं था क्योंकि हरीश जी अक्सर इन्हीं के आवास पर रुकते थे। नंद भारद्वाज उन दिनों मथुरा आकाशवाणी केन्द्र पर थे। हरीश जी जलेसं के राज्य महासचिव थे। इन मिले- जुले कारणों से वे प्रायः भरतपुर आते रहते थे और जैसी कि उनकी प्रकृति थी, सबसे घुल- मिल गये थे। एक बार हम सर्कुलर रोड से गुजर रहे थे जिस पर गोवर्धन जाने वाले पदयात्रियों के रेले गुजर रहे थे। हरीश जी ने उनके बारे में जानने की सहज जिज्ञासा जतायी। मेरे अलावा जो दो और साथी थे , वे कुछ तो बीकानेर वाले उस शीर्ष साथी के बौद्धिक आतंक से आतंकित थे और कुछ समर्पण जैसा भी कर चुके थे, इसलिए उन्होंने हरीश को गोवर्धन और पदयात्रियों के बारे में काफी हिकारत से बताया। मैं ने चुप रहना ही बेहतर समझा। हरीश जी भी शायद भांप गये और उन्होंने ज्यादा पूछा भी नहीं।


उस बार वे आगे मथुरा चले गए। उनके आगमन पर होने वाली गोष्ठी उनकी वापसी के समय हुई। अपने कुछ गीत सुनाने के बाद उन्होंने इस बार की यात्रा की उपलब्धि के रूप में गोवर्धन की यात्रा को बताया जो शायद उन्होंने नंद भारद्वाज के सौजन्य से कर ली थी। और फिर  उन्होंने गोबर्धन पर लिखा वह गीत सुनाया- काल का हुआ इशारा, लोग हो गये गोरधन, जय – जय गोबर्धन ! दुर्भाग्य से मुझे गीत पूरा याद नहीं है इसलिए इसे पूरा उद्धृत नहीं कर पा रहा हूं। गीत में इन्द्र का दंभ, मूसलाधार वर्षा, कृष्ण का नेतृत्व, गोवर्धन की ओट और सर्वोपरि जनशक्ति की प्रतिष्ठा की गयी थी। जिन्होंने हरीश भादानी को रूबरू सुना है , वे सहज अनुमान लगा सकते हैं कि इस गीत की एक ब्रज के वाशिंदे पर क्या प्रतिक्रिया हो सकती है। तभी तो वे जनकवि थे। एक कवि मिथक ओर इतिहास को किस अन्तदृष्टि से पुनर्व्याख्यायित कर रचना में ढाल सकता है, यह मेरे लिए भी कम रोमांचकारी नहीं था। उसके बाद रविवार में लोहिया की कृष्ण, राधा और द्रौपदी पर सांस्कृतिक व्याख्याएं छपीं, जिनसे मैं आज भी अपने को सहमत पाता हूं। पिछले दिनों समालोचन में सुदीप्त कविराज का महाभारत पर एक अनूदित व्याख्यान छपा है, उसमें भी एक तरह से इसी दृष्टि का प्रत्याख्यान है। बहरहाल, हरीश जी को मिले मीरा पुरस्कार के सम्मान में भरतपुर में हुई गोष्ठी में, तब जितनी मेरी समझ थी, मैं ने इस गीत को रेखांकित किया। तब से ही घर में गोबर्धन पूजा के समय मैं हरीश भादानी की याद रह गयी इन पंक्तियों का पाठ करता हूं।


पुनश्च: बीकानेर के साथी बुरा नहीं मानें, वैसा कोई दूसरा मुझे आज तक बीकानेर वालों में नहीं मिला। और हरीश जी भी तो बीकानेर के ही थे।

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