क्या पसमांदा शब्द पर पुनः विचार करने की ज़रुरत है ?

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जिस शब्द पर इतना खून पसीना लगा हो,उसे क्यों बदला जाये ?
( खालिद अनीस अंसारी )


एक-दो दिन से व्हाट्सएप ग्रुप्स में पसमांदा शब्द पर कुछ बहसों को देख रहा था. कुछ लोगों की राय थी कि पसमांदा शब्द को बदलने की ज़रुरत है. मेरे हिसाब से तीन मुख्य बिंदु हैं जिस पर विचार करना चाहिए-

1- दुनिया में सारे उपेक्षित समूहों को अपनी अलग पहचान बनानी पड़ती है इन्साफ पाने के लिए. पहचान के सिलसिले में भारत में ‘अछूत’ से ‘हरिजन’ और ‘हरिजन’ से ‘दलित’ तक और अमरीका में ‘नीग्रो’ से ‘ब्लैक’ और ‘ब्लैक’ से ‘अफ्रो-अमेरिकन’ तक का सफर हम जानते हैं. भारतीय मुसलमानों में भी सामाजिक-जातीय तौर पर उपेक्षित वर्गों ने ‘मोमिन’ से लेकर ‘पसमांदा’ केटेगरी तक सफ़र किया है. तो दो बातें स्पष्ट हैं: पहली, शोषितों की शोषकों से अपनी पहचान अलग करने की ज़रुरत; दूसरा, शोषितों की भी पहचान बदल सकती है मगर विशेष समय-काल की ज़रुरत के हिसाब से. पसमांदा शब्द भी बदला जा सकता है मगर कारण ठोस होने चाहिए.

2- अक्सर बहुजन आन्दोलन में भी ‘दलित’, ‘पिछड़े’, ‘बहुजन’  जैसे शब्दों से कुछ लोगों को दिक्कत रहती है. जब इन लोगों का वर्गीय चरित्र देखेंगे तो सब अक्सर मध्यम-वर्ग के नौकरीपेशा, प्रोफेशनल्स या बिज़नेसपर्सन  होते हैं जिन्होंने पूंजीवादी-उपभोक्तावादी कल्चर में अपनी जगह बना ली है. उनके पास मध्यम वर्गीय सपने हैं, तरक्की के रास्ते हैं, फ्रिज-गाड़ी-घर-ए.सी. इत्यादि है. बच्चे डीपीएस या कान्वेंट स्कूल में पढ़ते हैं, छुट्टी मनाने थाईलैंड जाते हैं. उनका सवाल जायज़ है “हम पसमांदा, दलित या पिछड़े  कैसे हुए भाई?” पसमांदा शब्द उनको रास नहीं आता है. आना भी नहीं चाहिए. मगर यहीं पर एक बड़ी गलती होती है. पसमांदा/दलित/बहुजन जैसे शब्द व्यक्तियों के लिए नहीं बल्कि समूहों के अधिकारों (ग्रुप राइट्स) के लिए इस्तेमाल होते हैं. हर दबे कुचले समूह में कुछ व्यक्ति तो तरक्की कर ही लेते हैं मगर वह समूह की पहचान निर्धारित नहीं कर सकते. ऐसा करना जनतांत्रिक नहीं होगा. समूह की पहचान तो अक्सरियत ही तय करेगी. तो जब पसमांदा शब्द इस्तेमाल किया जाता है तो वह दलित/पिछड़े/आदिवासी मुसलमान समूहों के लिए इस्तेमाल होता है जिन की 95% आबादी अभी भी मध्यम वर्ग नहीं बन पायी है. अब 5% पसमांदा आबादी के माध्यम वर्ग को तय करना है कि वह अपने पीछे छूटे हुए भाईयों/बहनों के साथ हमदर्दी दिखायेंगे और पसमांदा कहलाने में फख्र महसूस करेंगे. या फिर वह माध्यम वर्गीय पहचान और महत्वकांक्षाओं के तहत दबे कुचले लोगों की पहचान से दूरी अख्तियार करेंगे.

3- पसमांदा शब्द पर 20+ साल की मेहनत हुई है. यह शब्द चल निकला है. सैकड़ों रिसर्च, लेखों, पर्चों, पोस्टर्स, धरना-प्रदर्शन-रैली में इस शब्द का इस्तेमाल हुआ है. इस नाम से ‘पसमांदा आवाज़’ और ‘पसमांदा पहल’ नाम की पत्रिका निकलती थी या हैं. अब यह शब्द ‘adjective’ से ‘proper noun’ बन चुका है. अब पसमांदा एक क्रांतिकारी शब्द है जिस से सवर्ण/अशराफ तबके की नींद उड़ जाती है. जिस शब्द पर इतना खून-पसीना लगा हो उस को क्यों बदला जाये? क्या पसमांदा शब्द को सिर्फ इस लिए बदला जाये की कुछ मध्यम-वर्गीय व्यक्तियों का अशराफ इस शब्द का इस्तेमाल कर के मज़ाक उड़ाते हैं? या उन्हें अपने आप को पसमांदा कहलाना इस लिए पसंद नहीं है की वह तरक्की कर चुके हैं और एहसास-इ-कमतरी का शिकार हो जाते हैं? पंजाब की गलियों में आज ‘पुत्तर चमारा दा’ जैसे गाने और अमरीका में ‘ब्लैक इस ब्यूटीफुल’ जैसे नारे दिखाते हैं की कैसे पहचानों का शासक वर्गों के खिलाफ़ इस्तेमाल होता है. जब कोई पसमांदा व्यक्ति अपने नाम के आगे ‘हलालखोर’ या ‘कुंजड़ा’ लगाता है तो यह शर्म की बात नहीं सवर्ण-अशराफ जैसे शोषक तबकों के खिलाफ जंग का ऐलान होता है. अगर कुछ मध्यम-वर्गीय पसमांदा लोगों को सय्यद साहब अपने दस्तरखान पर बुला लेते हैं या तिवारी जी किसी दलित परिवार में भोज कर आते हैं तो इसका मतलब यह नहीं हुआ की अशराफ़/सवर्ण अब शोषक नहीं रहे. आन्दोलन में इस्तेमाल हुए शब्द, केटेगरी और नामकरण राजनीतिक होते हैं. किसी भी केटेगरी का मूल्यांकन समूह के अधिकारों या ग्रुप राइट्स के आधार पर होना चाहिए न की कुछ लोगों की  व्यक्तिगत वर्गीय परिस्तिथियों या पसंद-नापसंद पर.

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