भिक्षुओं ! जो मेरी सेवा करना चाहता है वह रोगी की सेवा करें

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(डॉ.एम .एल.परिहार)
एक बार गौतम बुद्ध आनंद के साथ एक बड़े विहार में भिक्षु निवास का निरीक्षण कर रहे थे. एक कमरे में एक भिक्षु अपने मल मूत्र में असहाय पड़ा था.
बुद्ध ने पूछा.
–भिक्षु ! तुम्हे क्या कष्ट है ?
–भयंकर दस्त से पीड़ित हूं भगवान.
–भिक्षु ! क्या दूसरे भिक्षु तुम्हारी देखभाल नहीं कर रहे है?
–भन्ते! मैंने भिक्षुओं की कभी कोई सेवा नहीं की थी इसलिए भिक्षु मेरी सेवा नहीं करते.
तब तथागत ने आनंद से कहा ,
आनंद! पानी लाओ, मैं भिक्षु के शरीर को धोकर साफ करुंगा.
तथागत ने पानी डाला आनंद ने उस भिक्खु का पूरा शरीर धोया, साफ किया.
तथागत ने उसे सिर की ओर से उठाया, आनंद ने पैर से. दोनों ने मिलकर उसे बिस्तर पर लेटा दिया.
तब तथागत ने भिक्षुओं को इकट्ठा कर पूछा-
–भिक्षुओं! यहां तुम्हारी देखभाल के लिए किसी के माता पिता नहीं है. यदि तुम एक दूसरे की सेवा नहीं करोगे तो अन्य कौन करेगा?
चाहे रोगी आचार्य, समकक्ष या शिष्य हो, सभी की सेवा करनी चाहिए. यदि नहीं करता है तो उसका दोष माना जाएगा.
–भिक्षुओं! इन पाच गुणों वाला भिक्षु, रोगी की सेवा योग्य होता है.
1.औषधि ठीक समय पर देने वाला.
2.अनुकूल व प्रतिकूल को समझकर अनुकूल औषधि देने वाला.
3.किसी लाभ की बजाय मैत्रीपूर्ण चित्त से सेवा करने वाला.
4.मल मूत्र, थूक, उल्टी दस्त की सफाई में घृणा नहीं करने वाला.
5.कभी कभी धम्म कथा सुना कर धम्म के प्रति प्रेरित और हर्षित करने वाला.
इसलिए भिक्षुओं ! हमेशा ध्यान रखो..जो मेरी सेवा करना चाहता है वह रोगी की सेवा करें
यो भिक्खवे, मं उपट्ठहेय्य
सो गिलानं उपट्ठहेय्य
सबका मंगल हो…..सभी निरोगी हो
(डॉ. एम.एल.परिहार से साभार)

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