मास्टर भंवरलाल : राजस्थान के वंचित वर्ग की राजनीति का प्रभावी चेहरा

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( त्रिभुवन )

मास्टर भंवरलाल मेघवाल का जाना राजस्थान की राजनीति से उस सितारे का लुप्त हो जाना है, जो वंचित समुदायों के एक प्रभावशाली प्रतिनिधित्व का नाम था। वह बेहद मुँहफट थे और अपनी बात निःसंकोच रखते थे। वे चिकनी चुपड़ी करने वालों में नहीं थे। यह बेहद दुःखद है कि पहले उनकी बेटी बनारसीदेवी गईं और अब वे ख़ुद चले गए। 


भंवरलाल मेघवाल मीडिया की पसंद के नेता नहीं थे। इसलिए गाहे बगाहे उनकी आलोचना वाली ख़बरें भी आती रहती थीं। यह दुःखद पहलू है कि गाँव-देहात से आए वंचित वर्ग के नेता जब कोई तीखी टिप्पणी कर देते हैं तो वह लोगों के सीने में छुरी सी लगती है। वजह ये कि वे शहरी और घुटे हुए नेताओं जैसे शातिर नहीं होते। इसलिए भंवरलाल मेघवाल की एक टिप्पणी भारी वबाल का विषय हो जाती है और गुलाबचंद कटारिया या अन्य किसी नेता का बयान फूहड़ मानकर क्षम्य हो जाता है। 


भंवरलाल जमीनी नेता थे। उदयपुर में आख़िरी मुलाक़ात में उन्होंने कहा था कि काँग्रेस पर इस समय के दिन और रात भारी हैं। हालात के सितम से बे-ज़ार इस पार्टी के नेता ढहते जा रहे हैं। इस दल के हिस्से में कोई सुब्ह आती है तो वह इसके नेताओं को और बुरी लगती है। और तो और, वे कहने लगे कि उस पार्टी का भगवान ही मालिक है, जिसे अपने ही चिराग़ों की रोशनी बुरी लगने लगती है। 


हालांकि दलित राजनीति में भंवरलाल का कोई उल्लेखनीय रचनात्मक योगदान कदाचित नहीं है; लेकिन काँग्रेस में वंचित वर्ग के वे इकलौते नेता थे, जो अनुसूचित जाति की राजनीति और इसके मुद्दों को बारीकी से समझते थे। वे इन मुद्दों पर बोलते भी थे। निःसंकोच। निडर थे और इतने निडर थे कि एक समय मुख्यमंत्री का सपना देखने लगे थे। पिछली गहलोत सरकार में उनका मंत्रिपद गया तो बहुत से लोगों ने उनके इस सपने को भी एक वजह माना। लेकिन भंवरलाल का कहना था कि अब अशोक गहलोत और उनकी वर्चस्ववादी राजनीति का मुकाबला नहीं कर पाते तो नहीं कर पाते; लेकिन द्वंद्व के बावजूद वे लक्ष्मणरेखाओं को पार करने को समझदारी नहीं मानते थे।

 
आज उनके जाने के बाद काँग्रेस में ऐसा कोई दलित नेता नहीं है, जो उनकी जगह ले सके। न तो वैसी समझ है और न ही वैसा कोई कद्दावर। इस बार वे सचिन पायलट के अधिक निकट थे.संभवतः वे बीमार नहीं हुए होते तो बात कुछ और होती। लेकिन आज का दौर ही ऐसा है कि काँग्रेस को अच्छे नेताओं की न तो ज़रूरत है और न ही  अनुसूचित जाति की ही कोई परवाह है।

वह अतीत के उजालों से वर्तमान के अँधेरे हटाने के लिए जूझ रही है और उन्हें यह समझाने वाला तक कोई नहीं है कि भैया आपने दीया उलटा थाम रखा है और तेल बहकर आपके कपड़ों पर लग चुका है। भीगी बाती जब तक जलेगी तब तक जलेगी और अंत में हालात कुछ यों हैं : ज़मीं पर गिर रहे थे चाँद तारे जल्दी जल्दीअंधेरा घर की दीवारों से ऊँचा हो रहा था!


( लेखक की फेसबुक टाइमलाइन से साभार )

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