चार दशक के अदम्य संघर्ष की कहानी है “कितनी कठपुतलियाँ”

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( एस आर मेहरा )


“कितनी कठपुतलियाँ”में कठपुतलियाँ भले ही अनगिनत हों पर नायक शंकर सिंह जैसा वास्तविक और संघर्ष करने वाला हो और लेखक भंवर मेघवंशी जैसा बेबाक,निर्भिक,स्वतंत्र और जमीनीं स्तर का संजीदगी से भरा हो तो इन्हीं अनगिनत कठपुतलियों को लामबन्द कर दोनों मुट्ठियों को भींचकर  ‘जिंदाबाद ‘ उद्घोष के साथ कंट्रोल किया जा सकता है और शोषकों के विरुद्ध इन्हीं  कठपुतलियोंको बाग़ी बनाया जा सकता है।


मैने अब तक के जीवन में पहली बार कोई उपन्यास “कितनी कठपुतलियाँ” पढ़ा है और पढ़ा भी क्या है ? शंकर सिंह व उनके साथियों के विगत चालीस सालों के अदम्य साहस और बेहद कठिन संघर्ष को मात्र चार दिन में जीया भी है। मुझे इस बात का सदैव गर्व रहेगा कि मेरी प्रथम पुस्तक के नायक और लेखक दोनों ही नैसर्गिक एवं जीवंत हैं जिनमें कल्पनाओं का कोई स्थान नहीं है।


युगों में कोई शंकर सिंह पैदा होता है जो अपना सम्पूर्ण जीवन ही सिस्टम सुधारने में लगाकर फलित हो जाता है जिस प्रकार एक बीज़ से विशाल वृक्ष बन जाता है ,लेकिन शर्त होती है कि बीज़ को सर्वस्व बलिदान करना पड़ेगा,वही शंकर सिंह व उनके संगठन ने किया है।मैं शंकर सिंह के बारे में कहता हूँ-

“आ गये हैं देखो ! फिर अत्याचार सारे सर पर हमारा धरा का धरा सारा इन्तकाम रह गया। ऐ !शंकर,यूँ हिम्मत ना हारना काया से आओ फिर हमारे पास,देखो दिल में क्या-क्या अरमाँ रह गया।

इस उपन्यास में कई कठिन,तीखी और तंजिया लहजे वाली बाते लेखक कठपुतलियों के माध्यम से कहलवाता है। इसमें कठपुतलियां कभी व्यंग्य रूप में तो कभी फिलाॅसाफी की बाते करती हैं। कठपुतलियां कहती हैं कि हमारे पेट है पर भूख नहीं अन्यथा हम भी कब की ही भूख से प्राण त्याग देती। पाठक स्तब्ध रह जाते हैं कि कितनी दृढ़ व गूढ़ बातें बहुत ही सरल लहजे में कठपुतलियां बेबाकी से कह जाती हैं।  

आदिवासी समुदाय में मौजूद गरीबी और दारुण भूख का करुण चित्र भी बार बार ध्यान खींचता है ,सारे अभावों के बावजूद भी आदिवासी लोगों की ईमानदार खुद्दार ज़िंदगी का सजीव चित्रण भी इस उपन्यास की एक खासियत कहा जा सकता हैं.अब तक यह देखा गया है कि लोग कठपुतलियों को चलाते हैं ,पर कितनी कठपुतलियाँ उपन्यास की कठपुतलियाँ लोगों को चलाती परिलक्षित होती है ,वे पूरे उपन्यास का नरेशन करती है ,यह अच्छा प्रयोग है .

ज़िंदा लोगों ,असली घटनाओं की हकीकत को लिखना और लोगों को नामज़द करते हुए लिखने का जोख़िम लेखक ने उठाया है ,हालांकि लेखक ने खुद भी इसे ज़िंदा उपन्यास कहा है ,वैसे तो इसे जीवनी कहा जाता तो भी उपयुक्त ही था। लेखक ने यह भी स्वीकार किया कि इस उपन्यास में काल्पनिकता का अभाव दिखेगा ,क्योंकि उपन्यास के नायक शंकर सिंह की ज़िंदगी इतनी विविध आयामी और बहुरंगी है कि उसमें कल्पना के लिए कोई जगह ही नहीं बचती है .

यह किताब साहित्य की ब्राह्मणवादी अति बौद्धिक भाषा शैली से मुक्त है ।यह बहुजनों की बोलचाल की भाषा मे रचा गया कथानक है जो अपनी पूरी सहजता के साथ उपस्थित रहता है । यह एक ग्रामीण पृष्ठभूमि के पिछड़े वर्ग के साधारण सामाजिक कार्यकर्ता की असाधारण कहानी की सहजतम अभिव्यक्ति है ,जिसमें शब्दाडंबर नहीं है ,कर्म का ताप है ,जिसके सामने सिद्धांत फीके दिखते हैं ।जो लोग सामाजिक बदलाव के कार्य को एलीट ,अभिजात्य ,सवर्ण समुदाय की भलमनसाहत और त्याग के रूप में प्रस्तुत करते हैं,उनके लिए यह उपन्यास एक सबक के रूप में सामने आता है ।


उपन्यास का नायक शंकर सिंह हजारों लोगों के लिए किसी मास्टर ऑफ सोशल वर्क की जीवंत यूनिवर्सिटी बन जाता है । ऐसी किताबें समाज शास्त्र के पाठ्यक्रमों के हिस्सा बननी चाहिए और हर राजनीतिक सामाजिक कार्यकर्ता को इसे पढ़ना चाहिये, ताकि वे बदलाव के कामों के असली अर्थ को समझ सकें ।
कितनी कठपुतलियाँ उम्मीदों का एक सफर है और जन संघर्षों के जीवंत दस्तावेज भी ,यह सूचना के अधिकार सहित तमाम लोकतांत्रिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए किए जाने वाले लोक संघर्षों की झलक प्रदान करता है।यह एक फीचर फिल्म की तरह अपनी गति से आगे बढ़ता है और इसकी सहज,सरल ,सुगम्य भाषा शैली व कथावस्तु पाठकों को एक प्रवाह में प्रवाहित किये रहता है ।एक बार इसे पढ़ना शुरू करने पर मध्य में छोड़ देना मुश्किल लगता है ।

इस उपन्यास के ज़रिए जानने के हक़ के आंदोलन और उसके अगुआ रहे अरुणा रॉय ,शंकरसिंह ,निखिल डे और उनके साथियों के सामूहिक काम की भी झलक मिल जाती है । सामाजिक कामों में सामूहिकता की जरूरत भी यह किताब स्थापित करती है।


यह उपन्यास आर टी आई मूवमेंट के पूरे संघर्ष का दृक साक्षी वर्णन है ,लेखक का पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता होना और उपन्यास में वर्णित मजदूर किसान शक्ति संगठन का फुल टाइमर होना भी इसे प्रामाणिक बनाता है ,लेखक खुद भी इस कथानक का पात्र रहा है ,पर वह पूरे उपन्यास से गायब रहता है ,यह मझधार में तैरते हुए समंदर को साक्षी भाव से देख पाने का लेखकीय कौशल है ,जो भंवर मेघवंशी करके दिखाते हैं ,हालांकि उनका पत्रकार और एक्टिविस्ट पूरे उपन्यास पर छाया रहता ,शायद कोई और इस कहानी को लिखता तो वह ऐसे बयां नहीं की जा सकती ।बहुजन समाज मे पैदा हो कर उसी के लिए जीवन लगा देने वाले शंकर सिंह जैसे समाज कर्मियों को बतौर नायक स्थापित करने का यह श्लाघनीय काम बहुजन चिंतक भंवर मेघवंशी ने किया है ,जो कि काबिले तारीफ है ।

सूचना के अधिकार के जन्म का संघर्ष  उपन्यास के नायक शंकर सिंह और उनके साथियों के सामूहिक संघर्ष से उपजा है , यह बात इस पुस्तक के प्रकाशन को गौरव से भर देती है।जब यह पुस्तक पढ़ रहे होते हैं तो पूरा चलचित्र सा चलता है और मस्तिष्क को ब्रेक देने के लिए भी टाईम नहीं दिया जा सकता।


इस उपन्यास में बताया गया है कि किस प्रकार और कैसे हम अन्याय,भेदभाव,शोषण,भूख और सामाजिक कुरीतियों का मुकाबला कर सकते हैं तथा अपनें अधिकारों और स्वतंत्रता के लिए कानून के समक्ष किस प्रकार पेश होकर जनता को जागरूक कर इन्हें प्राप्त कर सकते हैं। यह उपन्यास बहुत सी मार्मिक घटनाओं का जिक्र कर उनसे आम इंसान के साथ-साथ राजनैतिक दुनियाँ को भी साक्ष्यों सहित अवगत करवाता है।

इन सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित लोगों के हक के लिए आवाज़ उठाना कोई मामूली बात नहीं है। बहुत हिम्मत चाहिए शंकर सिंह बनने के लिए और अरूणा राय आईएएस की नौकरी छोड़ दर-बदर राहों पर चलने के लिए। इन विभिन्न परिस्थितियों से लड़ते लोगों के लिए-

“मर गये हम फिर भूखे पेट,पर न आये खबर लेने ऐ ! लोकतंत्र तुम,
खुशबू महज़ एक रोटी की,मन की मन में ही ले गये हम। “


यह उपन्यास सादगी और शाकाहार छोड़ ऊंची-ऊंची दुकानों पर मांसाहार खाने वालों को भी सचेत करती है कि फुटपाथ पर दो वक्त की रोटी के लिए कुछ बेचने वाले गरीब इंसान से हम कुछ नहीं खरीदते और अगर खरीदते भी हैं तो महंगा बताकर पैसे कम देते हैं लेकिन वह फिर भी दुआ देते हैं  और मरे एवं विभिन्न रोगग्रस्त मुर्गियों को खाकर टिप देते हैं।

“हरियाली है चार दिन की,जीवन के आलम में कहाँ बहार,
स्वप्न सब मुरझा गये,पेट खाली हमारा फिर रह गया। 

लेखक ने इस किताब के जीवंत संस्मरणों के ज़रिये अफसरशाही,नेताशाही,तानाशाही और लालफीताशाही को भी बेनकाब किया है। आज हम शंकर सिंह व उनके संगठन के शुक्रगुजार हैं कि उनके संघर्ष ने हम भारतीयों को सरकारी सिस्टम की सीधी जाँच का अधिकार दिया है।लेखक भंवर मेघवंशी बेहद शानदार व्यक्तित्व से सरोबार हैं। 

“ये जो भंवर है उसकी कलम को कम ना आंक लेना तुम /खिदमतगारो,समझ ना पाओगे कि कब आया लेखनी का भंवर घूर्णन करता हुआ/उड़ा ले जायेगा अनन्त में टाॅरनेडो सा,धरा से। “


अगर हम वर्तमान राजनीति की बात इस उपन्यास से जोडें तो बिल्कुल खरी उतरती हैं। हम देख रहें हैं कि किस प्रकार लोकतंत्र मात्र कुछेक स्वघोषित विश्वनेताओं के हाथों की मात्र कठपुतलियाँ ही बनकर रह गया है। भारत की एक बड़ी जनसंख्या आज भी भुखमरी की शिकार है। मीडिया आम बुनियादी खबरों को जमीन में गाड़ चुकी हैं,बड़ी-बड़ी स्वायत्त और संवैधानिक संस्थाओं को अँगुलियों पर विभिन्न कलाओं और मनमोहक अंदाज में नचाया जा रहा है। जिन जनप्रतिनिधियों को स्वयं जनता चुन कर अपनें हकों के लिए सदन में भेजती हैं ,वो वहाँ जाते ही कठपुतलियों के कपड़े पहनकर नाचनें के लिए बेताब हो जातें हैं। विकास के नाम पर देश को खोखला कर रहें हैं और युवा अपने  कैरियर को छोड़ रंग-बिरंगे झंडे थामें जयकारे लगा रहे हैं।

 
हमें इस उपन्यास के माध्यम से अधिकारों एवं संगठन के दायित्वों और रणनीतियों का ज्ञान होता है,साथ ही यह समझ भी विकसित होती है कि किसी भी कार्य को सम्भव किया जा सकता है ,बशर्ते कि लोग लगे रहें .हमें आलोचनाओं से भी सीखना है और अनुशासन,धैर्य एवं संगठन का विकेन्द्रीकरण आवश्यक है। टीम भावना से किया गया कार्य हमेशा सफल होता है वो चाहे किसी संघर्ष की दास्ताँ हो या बुनियादी मजबूती हो या फिर लोकतंत्र की रक्षा करनी हो। इस प्रकार मैं  कठपुतलियों के लिए यह कह सकता हूँ  –

“निर्जीव रंग-बिरंगी वस्तुओं की बनी,संघर्ष की सत्यता बयां करती है कठपुतलियाँ 
पैरों तले रौंदे और दबे-कुचले जीवन की पराकाष्ठा हैं कठपुतलियाँ
यूँ ना समझना कि महज़ रंगमंच की शोभा बढ़ाती हैं कठपुतलियाँ
ज़ेहन के भाव और सामर्थ्य के ताबूत को पहचानती हैं कठपुतलियाँ  

मेरा सुझाव है कि सामाजिक परिवर्तन की चाह रखने वाले हर इन्सान को यह उपन्यास जरुर पढना चाहिए .कितनी कठपुतलियाँ 216 पृष्ठ की किताब है ,जिसका मूल्य 295 रुपये है ,इसे बहुजन प्रकाशक रिखिया प्रकाशन ने छापा है। पृष्ठ सज्जा व मुद्रण के लिहाज से भी किताब बेहतर ही कही जाएगी,ऑनलाइन प्लेटफार्म पर और ऑफ लाइन तथा बहुजन बुक स्टोर्स पर भी यह उपन्यास उपलब्ध है । इसे अभी देश भर में काफी पढ़ा जा रहा है ,जो कि बहुजन वैचारिकी के लिए अच्छा संकेत माना जा सकता है ।

( लेखक विज्ञान शिक्षक है )

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