कारसेवक और राम जन्मभूमि आंदोलन !

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( पवन बौद्ध )
देश में 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के गुंबद को हटाया गया और आस्था के नाम पर हिंदू विश्व परिषद, बजरंग दल,विहिप,हिंदू महासभा,राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने देश के कई युवाओं को जोशीले भाषणों, सभाओं के मध्य से अयोध्या जाने का रास्ता तय किया। इन सभी के मध्य कार सेवकों का अपना एक योगदान राम भूमि आंदोलन में रहा आज हम कारसेवकों के बारे में कुछ विस्तृत चर्चा करते हैं। कारसेवक का मतलब हाथों से सेवा करना, श्रमदान करने वाले स्वयंसेवक सेवक या किसी संस्थान से जुड़कर निशुल्क कार्य करके मानव सेवा को समर्पित होना कर सेवक कहलाता है। सिख और हिंदू धर्म में सेवक द्वारा अनेक निशुल्क कार्य समाज के लिए किए जाते हैं, जिनमें अधिकांश कार्य धार्मिक होते हैं जिनके लिए स्वयंसेवक तैयार होते हैं उन्हें धार्मिक कार्यों के प्रचार प्रसार हेतु तैयार किया जाता है।

उस समय आंदोलन राम के नाम पर चलाया गया था जिसके कारण जो व्यक्ति स्वयंसेवी बनता  उसे विश्व हिंदू परिषद अथवा हिंदू महासभा द्वारा कारसेवक के नाम से पहचाना जाता था और उन्हें अयोध्या जन्म भूमि की और भेजने का कार्य किया जाता था। राम भूमि आंदोलन से पहले सन 1983 में अमृतसर में स्वर्ण मंदिर ब्लू ऑपरेशन के दौरान सिखों के कुछ समूह ने स्वर्ण मंदिर की अस्मिता को बचाने हेतु अपना कार सेवक के रूप में कार्य किया। भारतीय जनता पार्टी ने हिंदुत्व छवि को जिंदा रखने के लिए अपना राजनीतिक रसूख विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सामने रखा, 1984 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को महज 2 सीटें प्राप्त हुई।


भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी (भूतपूर्व प्रधानमंत्री) ने चुनाव में लगे बड़े झटके के बाद बीजेपी ने अपने वैचारिक करीबी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के साथ राम मंदिर आंदोलन में पूरी ताकत झोंक दी। राम मंदिर आंदोलन जैसे-जैसे परवान चढ़ा,कांग्रेस ने 1986 में विवादित स्थल के ताले खुलवा दिए जिसके बाद से इस कदम से आंदोलन और तेज होता चला गया। हकीकत में राम मंदिर आंदोलन के इतिहास में 22-23 दिसंबर 1949 के बाद ताला खुलना सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव था, मुस्लिम पक्ष का आरोप था कि इस दौरान बाबरी मस्जिद की मुख्य गुंबद के नीचे चुपके से राम की मूर्तियां रख दी गईं।1989 के पालमपुर अधिवेशन में बीजेपी ने राम जन्मभूमि को मुक्त कराने और विवादित स्थल पर भव्य राम मंदिर के निर्माण का प्रस्ताव पारित किया।

राम मंदिर के मुद्दे को बीजेपी ने अपने मुख्य राजनैतिक अजेंडे में शामिल किया। इसके साथ ही कट्टर हिंदुत्व का चेहरा माने जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया। इसके साथ ही आडवाणी ने राम मंदिर के पक्ष में माहौल बनाने के लिए 1990 में रथयात्रा शुरू कर दी। पूरे भारतवर्ष में आडवाणी ने राम मंदिर बनाने के लिए रथ यात्रा प्रारंभ की ओर अनेक कारसेवकों एवं स्वयं सेवकों ने राम मंदिर बनाने में अपना योगदान देने का वादा किया। लालकृष्ण आडवाणी ने 1990 में रामजन्मभूमि आंदोलन के दौरान सोमनाथ से अयोध्या तक की ‘राम रथ यात्रा’ में अपनी भूमिका का स्मरण करते हुए कहा कि यह उनके और सभी भारतीयों के लिए ‘ऐतिहासिक और भावपूर्ण’ दिन है।

 
विश्व हिंदू परिषद के तत्वावधान में साधु संतों व राजनेताओें का उद्बोधन ह्रदय को रामजन्म भूमि की मुक्ति के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने की प्रेरणा देता था, रामजन्म भूमि सभा स्थल के मंच से यह घोषणा हुई कि सभी कारसेवक, सरयू से एक मुठ्ठी रेत लाकर डालेंगे और कारसेवा पूर्ण हो जाएगी। 1992 में नारा प्रचलित हो गया  कि सौगंध राम की खाते हैं मंदिर वहीं बनाएंगे, आसमान में ‘जय श्रीराम’, ‘रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे’, ‘एक धक्का और दो जैसे नारों से नुक्कड़ नाटकों सभाओं के मध्य लोगों से सीधा संवाद किया जाने लगा था।

वर्ष 1990 एवं 1992 में हुए आंदोलन की बात करें तो 1990 में मध्यप्रदेश से करीब 36 हजार कारसेवकों ने अयोध्या के लिए कूच किया था, जिसमें ग्वालियर-चंबल अंचल के करीब आठ हजार कारसेवक शामिल थे। कारसेवकों की दो टुकडिय़ा बनाई गईं थी, जिसमें से एक को गुप्त वाहिनी तो दूसरी को खुली वाहिनी नाम दिया गया था।

अंचल से जब कारसेवकों की टुकडिय़ां अयोध्या के लिए कूच कर रहीं थीं तो तत्कालीन उत्तरप्रदेश की मुलायम सिंह सरकार ने कारसेवकों पर गोली कांड करवाया जिससे मुलायम सरकार की बहुत आलोचना हुई एवं विपक्ष के द्वारा उन पर मुस्लिम बाहुबली को बढ़ाने का आरोप  निरंतर लगते रहे हैं।  कारसेवकों को रोकने के लिए झांसी में लक्ष्मीबाई व्यायाम शाला में अस्थाई जेल बनाकर कैद कर दिया गया। वहीं 1992 में हुए राम भूमि आंदोलन की बात करें तो दूसरी बार ग्वालियर-चंबल अंचल से हजारों की संख्या में कारसेवकों का जत्था अयोध्या के लिए रवाना हुआ, टुकडिय़ों के रूप में यह जत्थे अयोध्या पहुंचे और कारसेवा में शामिल रहे।


तमाम कठिनाइयों के बावजूद 5 दिसंबर 1992 को अयोध्या शहर में कारसेवकों की संख्या दो लाख के तकरीबन हो गए जिसमें विहिप, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ,  हिंदू परिषद के बड़े नेता सम्मिलित रहे। 5 दिसंबर 1992 को कारसेवकों ने पूर्व अभ्यास किया जिस पर बाबरी मस्जिद को ढहाने का अभ्यास मिल रहा, रामकथाकुंज के पास कई राज्यों से आए कारसेवकों को दो लाइनों में खड़ा किया गया। सबसे पहले आंध्र प्रदेश के कारसेवकों को कारसेवा का मौक़ा दिया जाएगा उसके बाद अन्य राज्यों से आने वाले कारसेवकों को अपनी बारी का इंतजार करना पड़ा विश्व हिंदू परिषद के नेता मुरली मनोहर जोशी ने जनता को संबोधित करते हुए कहा था कि अधिकतर कारसेवक आंध्र प्रदेश और दूसरे दक्षिण भारतीय राज्यों से आते हैं।

अगर केंद्र सरकार के आदेश पर कारसेवा को बाधित किया जाता है तो वो सीधे-सीधे प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के खिलाफ हो जाएंगे, जो खुद आंध्र प्रदेश से ताल्लुक रखते हैं। 6 दिसंबर 1992 को कारसेवकों के नेतृत्व में बाबरी मस्जिद कोहथौड़े, गैंती, बेलचा, लोहे की नुकीली रॉड, रस्सियां, ड्रिल मशीन जैसे औजार और कुछ हल्के विस्फोट की मदद से मस्जिद के ऊपर गुंबद को गिरा दिया गया। कारसेवकों ने गुंबद के ऊपर चढ़कर जय श्रीराम के नारे आसमान में लगाए एवं भगवा लहरा कर अपनी विजय पताका बाबरी मस्जिद पर चढ़ा दी। देश में आपातकाल की स्थिति घोषणा कर दी गई एवं उत्तर प्रदेश सरकार को बर्खास्त करके धार्मिक दंगे छिड़ गये जिसके कारण अनेक लोगों की मृत्यु हुई।


1992 की घटना के दस दिनों में 16 दिसंबर 1992 को केंद्र सरकार ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के रिटायर्ड चीफ जस्टिस मनमोहन सिंह लिब्रहान की अध्यक्षता में कमिटी गठित की गया राम भूमि, बाबरी मस्जिद के ढहने के बाद के घटनाक्रम को  विस्तृत अध्ययन के बाद  लिब्रहान कमीशन को कहा गया। बाबरी मस्जिद गिराने के बाद  लिब्राहन कमीशन को तीन महीने की डेडलाइन दी गयी मतलब तीन महीनों के भीतर कमीशन को अपनी रिपोर्ट सौंपनी थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

कुल 48 बार डेडलाइन बढ़ाने के बाद इसने अपनी रिपोर्ट साल 2009 में सौंपी आजादी के बाद घटित घटनाओं को जांच करने में इसे अब तक का सबसे लबां आयोग कहा जाता है जिसकी 17 साल के अंतराल के बाद इसकी रिपोर्ट आई थी। 6 अगस्त 2020 को राम जन्मभूमि की स्थापना की गई जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीव की आधारशिला रखी एवं भाजपा नेताओं ने कारसेवक आंदोलन से जुड़े हुए सभी लोगों को सम्मान समारोह के मध्यम से सम्मानित करने का प्रयास किया। देश में जिस प्रकार से राजनीतिक माहौल को भगवा रंग का रूप दिया जा रहा है वह देश की आपसी भाईचारे के लिए कहीं ना कहीं अधिक घातक है। 

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