यह कठपुतलियों के बोलने का समय है।

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(डाॅ. रेणु व्यास )

‘ये दुनिया है रंगमंच, हम हैं इसकी कठपुतलियाँ’ अगर इतना सा ही सच होता तो दुनिया-भर में कुछ ताक़तवर कठपुतलियाँ बाकी सभी को अपने इशारों पर न नचातीं। यानी शेक्सपियर को कहना चाहिए था – ये दुनिया अगर ‘रंगमंच’ है तो कुछ नचाने वाले हैं और बाक़ी हैं उनके इशारों पर नाचने वाली कठपुतलियाँ। राजनीति, अर्थतंत्र, धर्मतंत्र और समाज की घोषित-अघोषित आदर्श नियमावली इन्हीं नचाने वालों के हाथों की अदृश्य डोरियाँ हैं। ऐसे समय में ऐसी ‘मुँहफट’ कठपुतलियों की ज़रूरत है जो गा सकें – ‘‘चोरीवाड़ो घणो होग्यो रे, कोई तो मुण्डे बोलो’’। लकड़ी-कपड़े की पुतलियाँ बोलने लगेंगी तो हाड़-माँस की चुप रहेंगी? वे भी स्कूल में पढ़ाई और अस्पताल में दवाई माँगने लगेंगी, नारा लगाने लगेंगी – ‘‘हमारा पैसा, हमारा हिसाब’’! ‘मुँहफट’ को चलाने वाला शंकर सिंह का हाथ भी उसकी ज़बान को नहीं रोक पाता। वह वह सब कह देता है जो हाड़-माँस की पुतलियाँ कहने से डरती हैं। दरअस्ल शंकर ही बोलते हैं ‘मुँहफट’ के मुँह से। शंकर सिंह! अरुणा राय, निखिल डे के साथ ‘मज़दूर किसान शक्ति संगठन’ के संस्थापक। बेजु़बानों को बोलने, अपने हक़ के लिए संघर्ष करना सिखाने वाला संगठन और उससे जुड़े लोग!
‘‘मैंने उसको
जब-जब देखा,
लोहा देखा,
लोहा जैसा –
गलते देखा,
ढलते देखा
मैंने उसको
गोली जैसा
चलते देखा!’’
केदारनाथ अग्रवाल से माफ़ी के साथ इस कविता के एक शब्द ‘उसको’ को बहुवचन करना चाहूँगी क्योंकि भंवर मेघवंशी की नई पुस्तक ‘कितनी कठपुतलियाँ’ के नायक शंकर सिंह ज़रूर हैं पर यह उन सब लौह-संकल्पित व्यक्तियों की कथा है जिन्होंने ‘कठपुतलियों’ को जागरूक जनता बनाने के प्रयास में अपना जीवन होम दिया है। शंकर सिंह की जीवन-साथी अंछी बाई, अरुणा राय, निखिल डे, मोहन बा,चुन्नी बाई ही नहीं, ‘मज़दूर किसान शक्ति संगठन’ की परिवर्तनकारी मुहिम से जुड़े सैंकड़ों अनाम कार्यकर्ता।


शंकर सिर्फ़ ‘मुँहफट’ ही नहीं हैं, वे ‘जोखिम चाचा’ भी हैं जो किसी गाँव में पहुँचते हैं तो ‘‘बच्चों से बातें करते हैं, ग्रामीणों से ‘राम सलाम’ कहते हैं। महिलाओं से राज़ की बात कर लेते हैं। बुज़ुर्गों से बतिया लेते हैं। आख़िर कौनसा प्राणी है जिससे ‘जोखिम चाचा’ बात करने का जोख़िम न उठा लेते हों।’’ (पृ. 58) आम लोगों में यह पैठ, उनके दुख-दर्द के साथ ख़ुद को एक कर देने की क्षमता शंकर सिंह को अपने ही जीवनानुभवों से हासिल हुई है।

‘कितनी कठपुतलियाँ’ में शंकर सिंह के जीवन-संघर्ष की कथा है। पर साथ ही यह गाथा है, ‘सूचना के अधिकार’ के लिए चले आंदोलन की, उसकी जन्मभूमि ‘देवडूंगरी’ की अनोखी गृहस्थी की। यह पुस्तक भारत के लोकतंत्र के विकास में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन लाने वाले इस आंदोलन के भीम और ब्यावर कस्बों में संघर्ष से उरूज़ पर आने और अंततः उसकी विजय की महागाथा भी है।

शंकर सिंह के साथ-साथ यह पुस्तक झाबुआ के अनजान इलाके में काम करने वाले राजस्थान के काॅमरेड खेमराज चैधरी (जिन्हें ‘स्वर्गीय’ के बजाय ‘अमर’ विशेषण देना उपयुक्त होगा) एवं और कई जुझारू कार्यकर्ताओं की फ़ाकामस्ती और संघर्षमय ज़िन्दगी की कहानी है जिन्होंने अपने लिए ग़रीबी और अभाव की ज़िन्दगी इसलिए चुनी ताकि दुनिया में कोई अभावग्रस्त और ग़रीब न रहे। यह प्रयास केवल व्यक्तिगत क्षमता से की जाने वाली चैरिटी मात्र नहीं है, यह शोषक व्यवस्था को परिवर्तित करने और उसे मानवीय बनाने का संघर्ष है।

इस पुस्तक के लेखक भंवर मेघवंशी भी एक ऐसी नई दुनिया बनाने के लिए संघर्षरत इन्हीं योद्धाओं में से एक हैं जिसमें सभी इंसानों के लिए समता और गरिमा सुनिश्चित हो। इन्होंने तेरह साल शंकर सिंह के साथ ‘मज़दूर किसान शक्ति संगठन’ में काम किया है। यानी लेखक पुस्तक के बाहर भी है और भीतर भी। यह तथ्य इस पुस्तक को तथ्यात्मक प्रामाणिकता देने के साथ ही उस जज़्बे को प्रभावशाली रूप से सामने लाता है जो शंकर सिंह के जीवन का संचालक रहा है। एक संघर्षधर्मी की जीवंत कथा एक और संघर्षधर्मी के शब्दों में। भंवर मेघवंशी की पारदर्शी भाषा शंकर सिंह के जीवन को आगे रखती है, भाषिक बाजीगरी में ज़्यादा नहीं फँसती।

यह पुस्तक एक व्यक्ति के साथ अपने समय की कथा कहती है पर इस बहस में हम नहीं पड़ेंगे कि यह ‘उपन्यास’ है या नहीं! यह बात और है कि इस पुस्तक के फ्लैप और भीतर के प्रकाशन विवरण में इसके लिए ‘उपन्यास’ अंकित है। वैसे भी आज महाकाव्यों और उपन्यासों के महा-आख्यानों का ज़माना नहीं रहा। ‘कथेतर’ विधाओं के वर्चस्व हासिल करने के इस युग में एक जीवनी के रूप में यह कृति पाठकों का सम्मान पाए तो क्या हर्ज़ है? क्योंकि आज का दौर दुनिया बदलने के लिए ‘महापुरुषों’ के इंतज़ार से मोहभंग का है। इस दौर में बदलाव की क्षमता शंकर सिंह जैसे आम आदमी के नायकत्व में है।

इस पुस्तक को पढ़कर आने वाली पीढ़ियाँ विश्वास करेंगी कि हाड़-माँस का एक साधारण-सा गृहस्थ भी अपने जैसे कई त्यागी और साहसी लोगों के साथ बदलाव की शुरूआत कर सकता है। इस देश का हर व्यक्ति शंकर सिंह के झोले की कठपुतलियों जैसे साहस के साथ सच कहना कब सीखेगा? सच कहना और उसके लिए जान की बाज़ी लगाकर संघर्ष करना भी ताकि किसी बूढ़ी माई को दो वक़्त की रोटी के लिए आज़ादी के बाद भी सात दशक तक प्रतीक्षा न करनी पड़े! किसी लाचार सीता और उसके अनाथ बच्चों को अपने अड़ौस-पड़ौस में ही कोई शंकर सिंह मिल जाए।

पुस्तक – कितनी कठपुतलियाँ, लेखक – भंवर मेघवंशी, रिखिया प्रकाशन, ए-314, कुम्भा सर्कल के पास, आजाद नगर, भीलवाड़ा(राज.), पिन-311001, मूल्य-295, पृष्ठ संख्या-216

( लेखिका राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर में हिंदी की असिस्टेंट प्रोफेसर है )

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