समाज का ऋण चुकाने में निवेश

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( पे बैक टू सोसायटी के एक असफल तथा दो सफल प्रयोगों पर डॉ. सिरीषा पटिबंदला और डॉ.जस सिमरन कहल का विचारोत्तेजक आलेख  )

गुरप्रीत (बदला हुआ नाम), पंजाब के एक ग़रीब परिवार की दलित लड़की, बारहवीं कक्षा के इम्तिहान में 99 फ़ीसद से भी ज़्यादा अंक हासिल करती है और एक राष्ट्रीय अख़बार उसे सुर्ख़ियों में ले आता है। सोशल मीडिया उसकी इस क़ामयाबी पर एक उन्माद में खो जाता है। दिल्ली के एक नेक़दिल वक़ील अपने संपर्कों से गुरप्रीत की आगे की पढ़ाई के लिए पैसा जुटाते हैं और देखते ही देखते गुरप्रीत के खाते में लाखों रुपए जमा हो जाते हैं। 

जब दिल्ली विश्वविद्यालय में उसका दाख़िला होने ही वाला होता है तभी यह ग़रीब दलित परिवार उस वक़ील से पूरी तरह संपर्क ख़त्म कर देता है और गुरप्रीत को एक स्थानीय सरकारी कॉलेज में दाख़िला दिला देता है। इन पैसों का इस्तेमाल वे अपनी बच्ची के भविष्य के बजाय अपना घर बनाने में ख़र्च करना चाहते हैं। अंततः परोपकार का यह प्रयास बेकार हो जाता है और सभी दानदाता मायूस रह जाते हैं।

कहावत है कि किसी को एक मछली देकर आप उसे एक दिन का खाना तो दे सकते हैं लेकिन अगर उसे मछली पकड़ना सिखा दें तो ज़िंदगी भर का इंतज़ाम हो जाता है। दुर्भाग्य से, गुरप्रीत के माता-पिता ने उसे सिर्फ़ एक दिन की दावत ही खिलाने का फ़ैसला किया। वक़ील साहब और उनके साथी दानदाता उसे किसी भी क़ीमत पर प्रशासनिक अधिकारी बनाना चाहते थे। कम से कम पैसा तो इसमें कोई बाधा नहीं बनता। लेकिन वे कहां ग़लती कर गए? वे कैसे सुनिश्चित कर सकते थे कि उनके दान किए पैसों का बेहतर इस्तेमाल होता? 

शायद हम सभी को ऐसी स्थितियों का सामना करना पड़ता है जब हम अपने समाज को योगदान तो देना चाहते हैं लेकिन कोई उचित दिशा दिखाई नहीं देती। हम जैसे पहली पीढ़ी के पेशेवर और सीमित संसाधनों वाले लोगों के लिए यह बहुत अहम हो जाता है कि हम समाज का ऋण चुकाने के लिए अपने पैसे का इस्तेमाल कितना बेहतर तरीक़े से कर सकें। देश में दो ऐसी सामाजिक क्रांतियां हैं जो शायद इस उलझन से हमें निकाल सकती हैं और परोपकार का सही रास्ता दिखा सकती हैं।

उत्तर भारत में, प्रबुद्ध भारत फ़ाउंडेशन (PBF) ने आने वाली पीढ़ियों में अंबेडकरवाद की जड़ें मज़बूत करने का बीड़ा उठाया है। पांच राज्यों में फैला हुआ PBF डॉ. अंबेडकर और अन्य दलित नायकों  की विचारधारा पर एक वार्षिक परीक्षा आयोजित करता है जिसकी अहम विशेषता इसका विस्तार और समावेशी प्रवृत्ति है। पिछले साल, ‘भारतीय संविधान’ विषय पर हुई परीक्षा में 50,000 से भी ज़्यादा विद्यार्थियों ने भाग लिया। यह विद्यार्थी अलग-अलग सामाजिक वर्गों, धर्मों, भाषाओं और राज्यों के थे लेकिन अंबेडकरवाद इन्हें एक साथ ले आया। शिक्षकों, चिकित्सकों, वक़ीलों और अन्य बुद्धिजीवियों का पूरे साल इस मुहिम से जुड़े रहना, हर साल एक नई क़िताब तैयार कर उसका 500 किलोमीटर के दायरे में स्वैच्छिक वितरण और एक ही दिन इतने बड़े स्तर पर इस परीक्षा का आयोजन निश्चय ही क्रांतिकारी हैं। 

पंजाब के कुछ अंबेडकरवादी चिकित्सकों द्वारा शुरू किया गया यह प्रयास अनवरत एक दशक से भी अधिक समय से इस दिशा में काम कर रहा है और अब इसे अपने शुरुआती प्रयासों का फ़ायदा भी मिलने लगा है। इस मुहिम की अगुआई करने वालों में शामिल सर्जन डॉ. राहुल कहते हैं कि PBF का विश्वास ‘अप्प दीपो भव:’ (यानी अपना प्रकाश स्वयं बनो) के विचार में है। 8-10 साल पहले जो विद्यार्थी इन परीक्षाओं में शामिल हुए वह परिपक्व होकर अब कार्यकर्ता बन चुके हैं और अंबेडकरवादियों के तौर पर समाज का ऋण चुकाने के लिए तत्पर हैं।

सीखना, भुला देना और फिर से सीखना (learn, unlearn and relearn) – यह सिद्धांत PBF का अभिन्न अंग है। जिसके ज़रिए किशोरों को विद्यालयों में जो कुछ फ़र्ज़ी ‘बापुओं और चाचाओं’ के बारे में सिखाया गया है उसे छोड़कर असली विचारकों के बारे में सीखने के लिए उन्हें प्रेरित किया जाता है। बाबा साहब की विचारधारा पर आधारित इस इम्तिहान के ज़रिए कई सालों तक उनके बाल मन में उतारे जाने से वे न सिर्फ़ शिक्षा की महत्ता को समझ पाये हैं बल्कि समुदाय के लिए काम करने की भावनाओं में भी प्रवृत्त हुए हैं। दुखद है कि गुरप्रीत इस क्रांति से वंचित रह गई। अगर वह PBF का हिस्सा होती तो न सिर्फ़ वह हार्वर्ड या ऑक्सफोर्ड के बारे में सोच रही होती बल्कि अपने जैसे दूसरे लोगों को मदद करने के बारे में भी सोच रही होती। 

इसी तरह, दक्षिण भारत में, हमारे यहां “Swaeros” है; यह शब्द ही अपने आप में सामाजिक असमानता को ध्वस्त करने का एक हथियार है। दूरदर्शी आईपीएस अफ़सर डॉ. आर एस प्रवीण कुमार की परिकल्पना से उपजे इस संगठन की ‘तेलंगाना आदिवासी और सामाजिक कल्याण आवासीय शैक्षणिक संस्थान सोसाइटी’ (TSWREIS) के विद्यार्थियों को प्रेरित करने में अहम भूमिका है। 2012 में, TSWREIS के सचिव का पदभार सम्भालते ही वे अलग-अलग काम कर रहे इन स्कूलों के पूर्व छात्रों के संगठनों और स्कूलों के विद्यार्थियों को एक साथ लाए और इस संगम को नाम दिया: SWAEROS (Social Welfare Aeros)। (‘Aero’ ग्रीक भाषा में आकाश को कहते हैं।) इन विद्यालयों के विद्यार्थी अब इस नाम की तरह ही असाधारण उद्देश्यों को लेकर अपने जीवन में आगे बढ़ रहे हैं।

समाज कल्याण और आदिवासी कल्याण की ये शिक्षण संस्थाएं समय, पैसे और हुनर को साथ लाकर विश्वभर में फैले हज़ारों समर्पित Swaeros को अपनी साथी संस्थाओं में विशेष ज़िम्मेदारियाँ देकर विद्यार्थियों की ज़रूरतों पर काम करने के लिए एक मंच प्रदान करती हैं। इन सभी सह-संस्थाओं के सामूहिक प्रयास से विद्यार्थियों की जीवन-शैली और महत्वाकांक्षाओं में एक असाधारण बदलाव आया है। हर उभरता Swaero अंबेडकर की विचारधारा को अपने में इतना जज़्ब कर लेता है कि Swaero-ism ही उनकी जीवन-शैली बन गया है। Swaero-ism की सीख और विश्वास है कि समाज को अपना योगदान देना व्यक्ति की ज़िम्मेदारी है, कोई ख़ैरात नहीं। 

विद्यालयों का सौंदर्यीकरण, शौचालय निर्माण, फ़्यूचर पेरेंटिंग पर सत्र, भारत और उसके बाहर पढ़ाई के लिए छात्रवृत्तियाँ, फ़िट्नेस प्रोग्राम, स्वास्थ्य नेट्वर्क, मेडिकल हेल्पलाइन नंबर, Swaero के स्टडी सर्कल, गांवों में लर्निंग सेंटर, ललित-कला प्रशिक्षण, भीम-दीक्षा, Swaero उत्सव, Swaero गान और कितना कुछ! विद्यार्थियों के समग्र विकास के हर पहलू में इन Swaeros का योगदान शामिल है और अंततः इस मुहिम के लाभार्थियों में विद्यार्थियों के परिवार ही नहीं बल्कि उनके समुदाय भी जुड़ गए हैं। 

विद्यालयों में नामांकन में बहुत वृद्धि के साथ-साथ ड्रॉपआउट की दर भी कम हुई है और अब TSWREIS तेलंगाना के निजी विद्यालयों और महाविद्यालयों के लिए एक कड़ा प्रतिस्पर्धी बनकर उभरा है। लगभग 50 सामाजिक कल्याण और आदिवासी कल्याण महिला आवासीय डिग्री महाविद्यालयों के ज़रिए TSWREIS ने हज़ारों लड़कियों को कम उम्र में शादी और किशोरावस्था में गर्भवती होने और जीवन की अन्य चुनौतियों से मुक्ति दिलाई है। महिलाओं के लिए, भारत के इतिहास में पहली बार, कुछ विशेष डिग्री कोर्स यहाँ शुरू हुए, जैसे – सैन्य बलों में भर्ती की तैयारी, नेटवर्किंग, पत्रकारिता आदि। इन महाविद्यालयों से निकले बीज अब जाने-माने शिक्षा प्रतिष्ठानों जैसे IISER, भारतीय प्रबंधन संस्थान, दिल्ली विश्वविद्यालय आदि में फैल चुके हैं। ऐसे कुछ विद्यार्थी जिन्होंने शायद अपने राज्य की राजधानी तक यात्रा करने का भी सपना नहीं देखा था वे अब विदेशों में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। यहाँ हर बच्चा अपने आप में सफलता की एक कहानी है।

Swaeros एक नया ब्रांड, एक नई संस्कृति और एक नया उपनाम हो चुका है, उन हज़ारों लोगों के लिए जिन्होंने इसे अपना योगदान दिया या इससे लाभान्वित हुए। संस्था के उद्देश्य के बारे में बात करते हुए आईपीएस अफ़सर आर एस प्रवीण कुमार गर्व से बताते हैं कि- “Swaeroism का मूल मंत्र बिना किसी मुक्तिदाता का इंतज़ार किए स्वयं अपने आप को आज़ाद करना है।” 

इन संस्थाओं के शानदार प्रदर्शन से हमें स्पष्ट संदेश मिलता है कि क्यों हमें समाज में किसी एक व्यक्ति पर आस लगाए बैठे रहने की बजाए लोगों को बड़े स्तर पर सशक्त करने पर ध्यान देना चाहिए। अगर किसी एक व्यक्ति से ही हम उम्मीद लगाए बैठे रहें और वह राह से भटक जाए तो फिर क्या होगा ?  इसकी प्रबल संभावना है कि 1956 में आगरा में बाबा साहब ने जिस ‘लिपिकों की भीड़ जो सिर्फ़ अपना पेट भरने में लगे हुए हैं’ के बारे में चेताया था गुरप्रीत भी उसी का हिस्सा बन जाए। ना तो उसे अब तक अपने समाज का ऋण चुकाने के प्रति संवेदनशील किया गया और ना ही वह Swaero जैसी किसी व्यवस्था में शामिल हो पाएगी जहाँ उसे संवेदनशील बनाया जा सके। शायद जिन दानदाताओं ने उसकी मदद की वे भी सिर्फ़ उसकी बुद्धिमत्ता को ही देख रहे थे उसके परोपकार में योगदान की सम्भावनाओं को नहीं।

वह एक अंबेडकरवादी निचले स्तर की कर्मचारी भी बने तो हम इसका स्वागत करेंगे बनिस्बत कि वह एक ऐसी उदासीन आईएएस अफ़सर बने जिसकी अपने समाज का ऋण चुकाने में कोई रुचि ना हो। किसी एक दलित बच्ची को शिक्षा के लिए प्रायोजित करने और एक ऐसे आंदोलन में सहयोग करने जहाँ वह स्वयं सफलता पाने के बाद अपने जैसी कई अन्य छात्राओं को मदद कर सके – इसमें बहुत फ़र्क़ है। बल्कि देखा जाए तो यह एक दूसरे के विपरीत हैं। चूँकि हमारे पास पैसा और शक्ति दोनों सीमित हैं तो यह ज़रूरी है कि हम उनका इस्तेमाल समझदारी से करें।

जैसा कि क्रांतिकारी पंजाबी कवि ‘पाश’ ने अपनी मशहूर कविता ‘सब से ख़तरनाक’ में इशारा किया – “सबसे दर्दनाक हादसा हमारे सपनों का मर जाना है।” सिर्फ़ गुरप्रीत के सपने ही इस हादसे के शिक़ार नहीं हुए बल्कि वे सब भी इसके शिक़ार हुए जिन्होंने उसे एक बेहतरीन भविष्य दिलाने का सपना देखा था। समाज को वापस चुकाने का सही तरीक़ा टाइम-टेस्टेड और स्थापित संस्थाओं को सहयोग करना है जिन्होंने लंबे समय से समाज के व्यापक उत्थान के लिए काम किया है ना कि किसी एक व्यक्ति को राहत देने के लिए।

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