भारतीय ट्राइबल पार्टी और आदिवासी लोग !

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  • कैलाश चंद्र रोत   

दक्षिण राजस्थान में हाल का राजनीतिक परिदृश्य देश के परिदृश्य से किन्हीं  बातों से खास है या यू कह सकते हैं कि किसी भी समाज और उसमें रहने  वाले लोगों के नियमों को  संस्कृति री  ति रिवाज परिपाटी इत्या दि से ही  समाज जीवंत हो जाता है ऐसा ही आदिवासी  समाज में सामाजिक आर्थिक सांस्कृतिक और राजनीतिक ,भूगोल का अपना अलग महत्व है इन में से किसी एक में परिवर्तन मात्र से संपूर्ण तत्त्वों में  में परिवर्तन आता है पूरे देश में आदिवासियों का केवल राजस्थान के आठ जिलों का  ही 70  प्रतिशत है   

इस क्षेत्र में आजादी के बाद लंबे समय तक कांग्रेस की सरकार सत्ता में  रही बाद में बीजेपी की उपस्थिति भी लगातार यहां बढ़ती रही और उसके आनुषंगिक संगठन भी पैर पसारते  रहे यहां के आदिवासियों का विकास और कल्याण की पूरी जिम्मेदारी बेशक इन्हीं सत्ताधारी पार्टियों की रही थी और यही नहीं लंबे समय तक बारी-बारी से कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही सत्ता के साझेदार है  दक्षिणी राजस्थान में सरकारी आंकड़ों से भी अगर हम देखें तो हालात कुछ ठीक नहीं है अस्पताल आने वाली हर कामकाजी आदिवासी महिला खून की कमी से पीड़ित है खेती किसानी कोई खास नहीं होती है पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण ट्रैक्टर से किसानी खेती संभव ही नहीं है जो खेतों के जोत  का आकार बहुत ही छोटा है इसलिए यहां की आदिवासी समुदाय छोटे-छोटे दो देशी पशु बेल रखते हैं

जिससे अपना खेत जोतने में उन्हें आसानी रहती है बीमारियों को वह देवी प्रकोप ही मानता है जहां-जहां आदिवासी निरक्षर हैं अक्षर ज्ञान नहीं जानता है शिक्षित नहीं है वहां अंधविश्वास खूब पाया जाता है और इन्हीं अंधविश्वासों रूप जमीन  की लड़ाई तक पहुच जाता है  खैर यह सब बातें समाज में अपना आधार तो बना ही चुकी है मूल बात यह है कि  आदिवासी समुदाय में सामाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक ताना-बाना लंबे अरसे से बना हुआ है आदिवासियों की  अपनी संस्कृति है देश और दुनिया में आए बड़े परिवर्तनों  वहाँ हुए हेर फेर से यहां बदलाव भी लाजिमी हैं असल में दक्षिणी राजस्थान  में आदिवासी समुदाय में 2015 से समाज में एक नया नवजागरण आया इस शब्द को खुद आदिवासियों ने दिया है 70 साल से अधिक समय तक गुजरा तब तक सामाजिक धार्मिक सांस्कृतिक परिवर्तन एक जैसा था  लेकिन 2015 और उसके बाद लगातार 2020 तक आदिवासियों ने अपनी अस्मिता को पहचान की इसे लगा कि इस देश में हमारा गौरव पूर्ण इतिहास है

उसकी अपनी संस्कृति है  राजनीति विज्ञानी एरिक रोवे का कहना है कि हर देश की राजनीति निर्दिष्ट समय एवं स्थान और मानवीय पर्यावरण में ही संचालित होती है इस पर्यावरण में भौतिक आर्थिक सामाजिक और सांस्कृतिक पक्ष सम्मिलित होते हैं अर्थात हर देश और उस देश के राज्यों की राजनीति पर्यावरण के इन  केंद्र के आसपास रहती है विभिन्न सामाजिक आर्थिक धार्मिक सांस्कृतिक पहलुओं से प्रभावित रहती है किंतु उसमें अगर हम बात करें संस्कृति का संस्कृति का पहलू एक अपना विशिष्ट महत्व रखता है समाज में संस्कृति व्यक्ति के मूल्य विश्वास और स्वयं की चेतना से जुड़ी  रहती है आज देश में खुद मोदी सरकार संस्कृति के नाम से ही सत्ता में आई है और वह संस्कृति थी हिंदू संस्कृति मोदीजी को वोट विकास की कीमत पर कम बल्कि संस्कृति  की कीमत पर मिला है संस्कृति के मूल्य को राजनीतिक साधनों में बदला जाता है 

व्यक्ति के  के मूल्य के रूप में परिवर्तन किया विश्वास मूल्य और संस्कृति मिलाकर के राजनीतिक संस्कृति का निर्माण होता है यही बात दक्षिण के राजस्थान के आदिवासियों और उनकी संस्कृति और समुदाय के प्रति मूल्य और विश्वास के प्रति लगाव का की बात  है तो इसका इस्तेमाल भारतीय ट्राइबल पार्टी ने किया इसमे हर्ज क्या है जब यहांके हालातों को देखते है  तो मैं ऊपर लिख चुका हूं यहां कांग्रेस और बीजेपी दोनों बारी-बारी से सत्ता में रहे हैं दोनों देश की बड़ी राष्ट्रीय पार्टियां हैं सत्ताधारी पार्टियां हैं वह दोनों ही पार्टी अपने मूल्य अपनी संस्कृति और अपने सिद्धांतों पर कायम रहे हैं बीजेपी के अनुसार आदिवासी वनवासी के सिवाय कुछ नही है और यह हिन्दू संस्कृति और सनातन संस्कृति का हिस्सा है इनकी नजरों में आदिवासियों की मूल धारणा के सारे पक्ष उल्टे है  स्त्री के प्रश्न पर मातृ  सत्ता स्वीकार नही है और हिंदू संस्कृति के मूल  रूप  में  कभी यह बड़ी पार्टियां  स्वीकार नहीं करती है हिंदू संस्कृति के मूल्य में आदिवासियों का कोई स्थान नहीं है केवल आदिवासी संस्कृति रीती रिवाज और तरीके धर्म के हिंदू धर्म के मूल रूप नही ले सकते ये केवल सहायक रूप में मुख्य होते है

मुख्य किरदार में नहीं राजस्थान में एक ऐसा जिला डूंगरपुर जिले का एक सरकारी कॉलेज इसका नाम भोगीलाल पंड्या राजकीय महाविद्यालय है यहाँ हर प्रकार के छात्र संगठन है वामपंथी छात्र संगठन और दक्षिणपंथी संगठनों की अपनी उपस्थिति है इसमें यह दावा नहीं है कि संगठन का आदिवासी समाज में किया योगदान  है यहां का स्टूडेंट जानता है पर इतना जरूर जानता है कि देश में संविधान है संविधान से  देश देश से चलता है हम लोकतांत्रिक देशहै  लोकतंत्र सहमति से चलता है इस बात को यहां का आदिवासी युवा छात्र नौजवान अच्छे से जान गया 2015 के मानगढ़ धाम से आदिवासी समुदाय ने अपनी चेतना को तीखा करने का काम किया  काम किया जिसका नाम इन्होंने  जन जागरण दिया जिसमें हजारों आदिवासी शामिल हुए आदिवासियों की  पारिभाषिक शब्दावली में  ने  जन-जागरण का नाम चिंतन शिविर दिया इसमें हमारे देश के संविधान में दिए गए अधिकारों को बखूबी समझाया गया और गरीब आदिवासी बिना अक्षर ज्ञान वाले आदिवासी को समझाया गया कि कठिन से कठिन अवधारणाएं होती हैंइन्हें समझ पाना थोड़ा मुश्किल है 

लेकिन उनको यहां की बोली भाषा और प्रतीकों से समजाया जाए तो  आदिवासी  समझ  पाता है  इसी चिंतन शिविर में वही काम किया कठिन अवधारणाओं को वहां की स्थानीय बोली   में समजाया गया  है  जैसे देश के संविधान में देश के वन और इस पर आदिवासी को दिये  अधिकार को बखूबी समजाया गया की  क्यों यह विशेष अधिकार हम आदिवासी को ही दिए गए हैं केवल यह अधिकार आदिवासी समुदाय को ही मिले हैं और आदिवासी का रिश्ता कितना कितना प्रक्रति से जुड़ा हुआ है  आदिवासी प्रकृति पूजक होते हैं उनकी पूजा करते हैं पहाड़ की पूजा करते हैं आखिर में आदिवासी समुदाय ही ऐसा क्यों करता है बाकी समुदाय यह काम क्यों नहीं करते बाकी समुदाय पर्वत पहाड़ नदी नालों को क्यों नहीं पूजा करता है इस बात को हर  चिंतन शिविर में बखूबी समझा जाने लगा इस तरह के अब तक सैंकड़ो  चिंतन शिविर आयोजित हो चुके है  इस चिंतन शिविर को आदिवासी होली दीपावली की तरह के रूप में लेने लगाहै  आदिवासी को सबसे  ज्यादा जगाने का काम शिक्षा ने किया, देश में आदिवासी जिलों में डूंगरपुर जिला शिक्षा के क्षेत्र में अव्वल है

सरकारी नौकरी सहित हर क्षेत्र में इसके प्रतिनिधित्व को बराबर करने के सवाल और तवज्जो को दिलवाने की बात पर ज्यादा मुखर होता रहा जैसे जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण खासकर आरपीएससी पुलिस विभाग और प्रशासनिक भर्तियों में वर्षों से चले आ रहे कांग्रेस बीजेपी के उदासीन रवैए के खिलाफ यहां का आदिवासी एकजूट हुया इसी वजह से आदिवासी जन जागरण हुआ चिंतन शिविर आयोजित किए चिंतन शिविर में अपने लिए मार्गदर्शक भी तैयार हए जैसे एक व्यक्ति का नाम आदिवासी समाज मे काफी सम्मानजनक रूप से लिया जाने लगा  एक व्यक्ति जो पेशे से शिक्षक हैं जिनका नाम भवर लाल परमार है जिन्होंने आदिवासियों की संस्कृति रिति रिवाजों और परंपरा पर खुब काम किया  लेकिन इनके अनुसार शिक्षक वह  है जो समाज को जागृत करता है समाज की बुराइयों को दूर करता है समाज की कुरीतियों को मिटाता है समाज और समुदाय को उसकी असली संस्कृति से अवगत कराता है सामाजिक मार्गदर्शन को के काम को  आदिवासियों में एक इन्हें सार्वभौमिक माना गया है इनकी हर बात को पूरा आदिवासी समुदाय आत्मसात कर रहा है

यह शख्स जिन्हें उनके अथक प्रयास से जिन्होंने आदिवासी समुदाय को संस्कृति के आधार पर इस क्षेत्र में खड़ा किया  ने आदिवासी संस्कृति को खड़ा किया इसी संस्कृति और आत्म गौरव से उत्साहित होकर आदिवासी अपने मुद्दे और राजनीतिक रूप से मुखर हुआ समाज समुदाय को लेकर क्षेत्र में कई मुद्दों पर आंदोलन चलाया इसी के चलते राजस्थान की विधानसभा में इन आदिवासियों द्वारा नवगठित राजनीतिक पार्टी पार्टी में भागीदारी की और उसके दो एमएलए दो प्रतिनिधि जीतकर राजस्थान की विधानसभा में पहली बार पहुंचे दोनों विधायक अपने समुदाय की मांगों को विधानसभा में जोर-शोर से उठा दे रहे और सवालों को संस्कृति और  समुदाय से जोड़ रहे है अपनी मांगों से  आदिवासियों की मूल अधिकारों को सदन में उठाया और सदन के बाहर जनता को खुले चिंतन शिविर के माध्यम से समझाया गया और  बताया गया की  कांग्रेस और बीजेपी लगातार इस क्षेत्र में बटीपी  पार्टी पर जो आदिवासियों के प्रतिनिधि होने का दावा करती है पर और  आदिवासियों के संगठनों पर हमलावर होती रही समुदाय के नाम पर आदिवासी युवाओं को भ्रमित करने का आरोप लगाती रही लेकिन कांग्रेस बीजेपी के इन्हीं आरोपों में आदिवासी समुदाय के सवाल दफ़न थे 

दक्षिणी राजस्थान में  गठित  भारतीय ट्राइबल पार्टी के सवाल छुपे थे इन आरोपो में  कांग्रेस और बीजेपी भले ही बिटीपी  पर आरोप लगाए पर बीटीपी के सवाल इन्हीं पार्टियों से थे क्योंकि लगातार सत्ता में कांग्रेस और बीजेपी रहे हैं यह विवाद आए दिन होते रहे हैं लेकिन हाल ही के दो विवाद बहुत ज्यादा दक्षिणी राजस्थान में चर्चित रहे हैं दिलचस्प है कि क्षेत्र में बीटीपी और आदिवासीओ के प्रतिनिधित्व की पार्टी क्योंकि अपने जन जागरण से कांग्रेस और बीजेपी आरएसएस लामबद्ध हुए  हैं यही कारण है कि अभी हाल ही में कुछ दिन पहले कांग्रेस के एक युवा विधायक राजस्थान के युवा कांग्रेस के अध्यक्ष भी हैं गणेश घोघरा ने भी बिटीपी पर राजनीतिक हमला किया और यहां बोले जाने वाले उद्बोधन शब्द “जोहार ,पर कड़ी आपत्ति जताई  सार्वजनिक रूप से सभा के माध्यम से  बीटीपी और आदिवासी समुदाय को जागृत करने वाले विद्वानों पर जोहार को लेकर  हमला किया बाहरी शब्द झारखंड छत्तीसगढ़ से लाकर यहां उद्बोधन करवाए जाने का आरोप कांग्रेस और बीजेपी ने लगाया कांग्रेस बीजेपी दोनों इस मुद्दे पर एक नजर आती है बीजेपी से पूर्व विधायक सुशील कटारा और कांग्रेस विधायक साथ ही इसके साथ आर एस एस का भी यही मानना है कि जोहार शब्द यहां का स्थानीय अभिवादन नहीं है यह बाहर से लाया गया है गया है लादा गया है

बीटीपी और आदिवासी समुदाय को जागृत करने वाले लोग यहां की जनता भर्मित कर रहे है और वोट के लिए समुदाय की राजनीति कर रहे है   रहे हैं इस  मुद्दे पर  कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही बोल रही हैवो भूल जाती है  कि भले ही यह सब बाहर से लाया गया है लेकिन एक राष्ट्र में वह चाहे कश्मीर हो या कन्याकुमारी केरल हो या झारखंड या दक्षिण राजस्थान के आदिवासी क्षेत्र में हमारे देश का ही हिस्सा है  राष्ट्र का ही हिस्सा है राजस्थान का डूंगरपुर कोई देश के बाहर का हिस्सा नहीं है यह बात भी बिटीपी अच्छे से जानती थी इस पर भारतीय ट्राइबल पार्टी का कहना है कि जोहार उद्बोधन कोई बाहरी शब्द नहीं है 

धीरे से आदिवासियों के पुरानी पीढ़ी को खोलें खंगाले तो स्थानीय स्तर ये मिल जाता है बोला जाता है  खैर  झारखंड में सब जाति पंथ के लोगों के द्वारा  सहर्ष स्वीकार किया जाता है आदिवासी समुदाय और भारतीय ट्राइबल पार्टी के लोगों का कहना है कि हम बचपन को देखें तो दादी या नानी से कहानियां सुनते हैं सामान्यतः पूर्णिमा की रात को सोने से पहले सौदा वापसी जोर-जोर अर्थात हे चांद बाबा आपको नमन कह कर अपनी मन्नतें मांगते हैं चंद्रमा को कोई देवता या देवी नहीं कहते हैं बल्कि बावसी कहते हैं इस तरह कई मौकों पर जोर  जोर या जोहार का प्रयोग होता है अगर जोहार के उद्बोधन से प्रकृति की जय कार करें तो इसमें बुरा क्या है आदिवासी प्रकृति से जुड़ा है तो जोहार का उद्बोधन स्वीकार करना चाहिए वही आर एस एस और कांग्रेस बीजेपी का कहना है कि जोहार बाहरी शब्द है यहां तो पहले से राम राम जय सीताराम जय गुरु ही बोला जाता है पर दक्षिणी राजस्थान का समझदार युवा जो चिंतन शिविर से तप  कर निकला हुआ जागृत आदिवासी इतना तो जानता ही है कि भारत के इतिहास में केवल राम राम जय सीता राम एक पौराणिक आख्यान से ज्यादा नही है।

आदिवासी संस्कृति का एक हिस्सा कभी नहीं है  आदिवासियों का कहना है कि राम-राम से पुरानी हमारी संस्कृति हमारी आदिवासी संस्कृति धर्मपुर्वी   है अर्थात  धर्म जब दुनिया में अस्तित्व  में नहीं था तभी हमारी संस्कृति पहले से ही मौजूद थी पहले आदिवासी संस्कृति अस्तित्व में थी जोहार एक प्रकृति का प्राकृतिक उद्बोधन है जिसमें नदी नाले जीव जंतु पहाड़ इत्यादि को संबोधन है राम-राम धर्म का बोध कराता है और खास बात यह है कि राम के नाम पर देश में राजनीतिक दल सत्ता में भी आते हैं लेकिन मूल बात  हैं कि आदिवासियों की चेतना का प्रभाव परंपरागत रूप से यहां की मूल पार्टियों जो सत्ताधारी रही हैं पर ही दिखाई देता है बड़ी राजनीतिक पार्टियों को अस्तित्व और वोट बैंक खतरे से यह सब होता रहा है जागृत होकर विकास का हिसाब भी पूछा इसलिए दक्षिणी राजस्थान में भारतीय ट्राइबल पार्टी को अन्य पार्टियां  हावी होने लगी  इस पर कांग्रेस और बीजेपी के  साथ ही क्षेत्र में वामपंथी पार्टियां भी हैं जो आदिवासियों की संस्कृति का समर्थन तो करती है

इनके रोटी कपड़ा मकान और काम के लिए आंदोलन तो करती है   और वन अधिकार नरेगा इत्यादि पर यह पार्टियों मुखरता से लड़ाई भी लड़ रही है  जोहार  शब्द पर कोई आपत्ति भी वामपंथी पार्टियों को नहीं है, यहां के वामपंथियों को लेकिन बिटीपी काउभरना  इन्हें भी रास नहीं अन्य पूरे मुद्दों पर वामपंथी पार्टी अग्रणी है पर बिटीपी कोंग्रेश की इस लड़ाई में तो  मौन धारण किए हुए हैं लेफ्ट पार्टी आदिवासियों की चेतना का फायदा क्यों नहीं उठा रही है जब देश के मुद्दे पर लेफ्ट पार्टी आदिवासी के मूल संस्कृति पर एक राय है जिस का मानना है कि ग्रामसभा संस्कृति और आदिवासियों के अधिकार उनके मूल अधिकार हैं इन्हें ये मिलने चाहिए तख्ती  दिया जाना चाहिए लेकिन लेफ्ट पार्टियां  स्थानीय मुद्दों पर मौन धारण किए रहते हैं अभी हाल ही में एक और विवाद हुआ दरअसल उदयपुर जिले के सलूंबर सोनार माता में झंडे या ध्वज को लेकर हुया था सोनार माता आदिवासी समुदाय के दायमा गोत्र की कुल देवी है

आदिवासीओ में कुलदेवी को टोटेम का रूप दिया गया है ये पवित्र मानते है  ध्वज को इनकी भाषा संस्कृति में  “नेजा,कहते है आदिवासी  की कुलदेवी गोत्र की कुलदेवी है बिटीपी जो एक उस क्षेत्र की मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है इसकाअपना अलग झण्डा है  जब कुलदेवी के गोत्र का झण्डा या नेजा सोनार माता पर फहराने की बात आई तो मीडिया और स्थानीय राजनीतिक दल के लोगो ख़ासकर हिन्दू समुदाय विरोध में उतर गया और यह कर्त्य बिटीपी का बताया धार्मिक मामलों को ठेस पहुचाने का आरोप लगाया मामला तुरंत पुलिस तक पहुच गया पुलिस बिना सोचे समजे वहाँ गोत्र के  नेजा या ध्वज फहराते आदिवासियों को अन्धादुन्ध मारपीट करने लगी और यहां के मीडिया में इस पूरे मामले को आदिवासी गौत्र के इस पूरे प्रकरण को बिटीपी से जोड़ कर बीटीपी जो राजनीतिक दल है उसका झण्डा फहराने की बात लिख दी इससे माहौल और खराब हो गया आदिवासियों को पूरा विलेन के रूप में देखा गया बिटीपी के ध्वज और झण्डे और आदिवासी समुदाय के गोत्र के झण्डे या ध्वज नेजा में फर्क है   

मीडिया ने यह लिखा कि सोनार माता पहाड़ी पर उसके राजनीतिक पार्टी का झंडा गाढ़ा जबकि आदिवासियों और वहां के राजनीतिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि हमने हमारे पार्टी का झंडा नहीं बल्कि हमारे गोत्र की कुलदेवी का चढ़ाया था और गोत्र की कुलदेवी पर लाल  नेजा या कपड़ा डालने गए थे  यह काम आदिवासी अनादि काल से कर रहे हैं आदिवासियों की कुदरती मान्यताओं के अनुसार पुरुष देव देव  सफेद झंडा जिसमें चांद सूरज तारा तथा महिला देवी को देवरो पर लाल झंडा ध्वज की भाषा में इसे नेजा कहते हैं को चढ़ाया जाता है यह मातृ सत्ता का एक तरीके से प्रतीक भी है हरियाली नव सृजित जीव जंतु का हरा झंडा है उसमें भी चांद तारा व सूरज अंकित रहता है  और सोनार माता पर यह प्रकिर्या   यहा वर्षों से चली आ रही  है और यह हमारे आदिवासियों के लिए स्वर्णिम गौरव है हम भगवा झंडा हमारे इस स्वर्णिम गौरव पर कैसे स्वीकार करेंगे बीजेपी और आरएसएस भगवा झंडे के नाम से देश में वोट मांगती है और सत्ता में भी आती है यह काम अच्छे से जानते हैं 

आदिवासियों का  कहना है कि बीजेपी व कांग्रेस के लोग भोले भाले आदिवासी कोतवालो  को पकड़कर  मंदिर बनाने का झांसा दे रहे हैं आर एस एस अपने छुपे हुए एजेंडे में काम कर रहा है  है धूणी और धाम पर  वोटों पर कब्जा करने के फिराक में है दोनों दल मानवीय विकास को छुपा रहे हैं और बिटीपी  के संस्कृति के कामों को तोड़ मरोड़ कर देख रहे है  मूल मुद्दों से ध्यान भटका रहे हैं बिटीपी को  संस्कृति विरोधी और धर्म विरोधी होने का आरोप लगाए जा रहे हैं लेकिन सच्चाई यह है कि यहां का दक्षिणी राजस्थान का युवा आदिवासी युवा पढ़ लिखकर सरकारी नौकरियों में और अपने हक अधिकार हमारे देश के  संविधान से मांगने को जाग चुका है यही वजह है कि कांग्रेस और बीजेपी बड़े राजनीतिक दलों की जमीन राजनीतिक जमीन खिसकने के कगार  पर है और बिटीपी का पूरा आधार आदिवासियों के स्थानीय मुद्दों पर है स्थानीय मांगो पर है स्थानीय समस्याओं को लेकर है तो अब बड़ी राजनीतिक पार्टियां ये बात जानबूझकर समजना नही चाहती है   जान-बूझकर के सत्ता में रहकर किए हुए अपने कुकर्मों से पर्दा डालने उनके लिए बहुत जरूरी है आदिवासियों में पनपी चेतना को  दबाने के लिए पूरी तरह से कांग्रेस, बीजेपी और आरएसएस तैयार है  बचाव की मुद्रा में में आने के लिए नित नए नए जतन रोज तैयार किये जाते है 

(रिसर्च स्कोलर गोविन्द गुरु जनजाति विश्वविद्यालय बांसवाड़ा राजस्थान रिसर्च – भारतीय ट्राइबल पार्टी राजस्थान)

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