गीताप्रेस, गोरखपुर : जिसने संकट का सामना करते हुए पूरे भारत का धार्मिक पासा ही पलट दिया !

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– डॉ. एम एल परिहार

सिर्फ किताबों से सामाजिक,वैचारिक व सांस्कृतिक कायापलट की जा सकती है यह साबित कर दिखाया गीता प्रेस गोरखपुर ने. भारत के सबसे पुराने व बड़े इस संस्थान की स्थापना 1923 में जयदयाल गोयनका ने की थी. इसके संस्थापक संपादक हनुमान प्रसाद पोद्दार थे. दोनों चूरु, राजस्थान के थे और कोलकाता में व्यापार करते थे. 

यह वह दौर था जब हिंदू धर्म पर भारी संकट था. पूरे भारत में वर्ण व्यवस्था, जात पात, भेदभाव व शोषण के खिलाफ दलितों, आदिवासियों व पिछड़ों में भयंकर आक्रोश था. देश के कोने कोने में वे भारी संख्या में दूसरे धर्मों को अपना रहे थे. दूसरी और स्वयं हिंदू परिवारों में भी धार्मिक ग्रंथ नहीं थे और ना ही कोई प्रचारक. 

ऐसे संकट में गीता प्रेस ने धार्मिक ग्रंथों व पत्र पत्रिकाओं को बड़ी संख्या में छापने व तेजी से वितरण कर  सांस्कृतिक बदवाल करने की जिम्मेदारी का बीड़ा उठाया. गोरखपुर में एक छोटे मकान से शुरू हुई धार्मिक ग्रंथों द्वारा प्रचार की इस मुहिम के तहत बहुत ही सस्ती कीमत पर अच्छी क्वालिटी के ग्रंथ देशभर में फैलाए गए. यही नहीं देशभर में कई कथावाचक  भेजे गए जो जगह जगह  रामचरितमानस का पाठ करते थे.

यहीं से प्रकाशित होने वाली मासिक मंथली मैग्जीन ‘कल्याण’ भारत के गांव गांव में पहुंच गई. इन प्रयासों से दूसरे धर्मों में जाना थम गया और पूरा धार्मिक पासा ही पलट दिया.  आज हिंदी,अंग्रेजी व संस्कृत के अलावा पंद्रह अन्य भाषाओं में लगभग ढाई हजार तरह के प्रमुख ग्रंथों व अन्य किताबों का करोड़ों की संख्या मे हर साल प्रकाशन होता है. इनमें सबसे ज्यादा रामचरितमानस व भगवत गीता छपती है. देश विदेश में इन किताबों की भारी मांग भी यह प्रेस पूरी नहीं कर पाता है. सिर्फ हनुमान चालीसा व शिव चालीसा ही इतनी अधिक संख्या में छपती हैं जिसका कोई हिसाब नहीं. 

आपको हैरानी होगी कि जब घर घर में रामचरित मानस व भगवतगीता पहुंच गई तब तक आम हिंदू को गीता प्रेस के बारे में पता भी नहीं था. क्योंकि इस समूह ने अपने धार्मिक प्रचार के लक्ष्य को छोड़कर कभी स्वयं के प्रचार, सम्मान या राजनीतिक पहुंच बनाने में रुचि नहीं ली. यहां के ग्रंथों में ही नहीं बल्कि पत्र पत्रिकाओं में भी में ना किसी का विज्ञापन छपता है ना किसी जीवित व्यक्ति का चित्र या गुणगान किया जाता है. इन्होंने आत्म प्रशंसा व व्यक्ति पूजा को बंद कर दिया और सिर्फ धर्म, अवतारों, देवी देवताओं के ग्रंथों के प्रकाशन व उनका देश विदेश में तेजी से वितरण को ही महत्व दिया. बच्चों व महिलाओं के उपयोगी धार्मिक साहित्य भी बड़े पैमाने पर प्रकाशित किया जाता है. 

पहले गीता प्रेस की किताबें शहर व कस्बों की दुकानों व रेलवे स्टेशनों पर ही बिकती थी लेकिन आज गीता प्रेस की गाड़ियां गांव गांव के चौराहे पर खड़ी नजर आती हैं. इस इंटरनेट के युग में ऑनलाइन भी खूब सेल होती हैं. इसी का परिणाम है कि आज घर घर में रामचरितमानस, भगवतगीता से लेकर उपनिषद, पुराण,कई तरह की चालीसाएं, भजन मालाएं आदि पहुंच गई हैं.    एक साधारण हिंदू गीता प्रेस को बहुत सम्मान की दृष्टि से देखता है और इन ग्रंथों को बड़ी संख्या में खरीद कर अलग अलग अवसरों पर समाज में दान करता हैं. 

आपको यह जानकर भी हैरानी होगी की गीता प्रेस के संस्थापक संपादक हनुमान प्रसाद पोद्दार को तत्कालीन गृहमंत्री गोविंद बल्लभ पंत ने भारत रत्न का सम्मान देने की अनुशंसा की थी लेकिन उन्होंने स्पष्ट मना कर दिया. लगभग सौ साल पहले गीता प्रेस ने किताबों से क्रांति लाने की जो मुहिम शुरू की थी उसका असर आज भारत के सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व धार्मिक क्षेत्र में स्पष्ट रूप से देखने को मिल रहा है.  

लेकिन दूसरी ओर बुद्ध, फुले,अंबेडकर की बात करने वाले लोग इनकी मूर्तियां चौराहों पर लगवाने के आंदोलन करते है. घर घर संस्थाएं व पॉलिटिकल पार्टियां बनाने की मुहिम चला रखी है. बुद्ध, फुले अंबेडकर को आगे कर दूसरों को सिर्फ कोसने में ही सारी ऊर्जा लगा रहे हैं. और  यह भी कहते हैं भला किताबों से क्या होता है, किताबें कौन पढ़ता हैं. उनकी संस्था को फैलाना व आरक्षण बचाना जरूरी है. विचारों व किताबों को कौन पूछता है पहले एमएलए, मंत्री की कुर्सी जरूरी है.

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