अब भी अगर ख़ामोश रहे तो …!

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– भंवर मेघवंशी

भीमा कोरेगाँव प्रकरण में जेल में बंद मानव अधिकार समर्थकों को आज दो साल हो गये है . क्या देश है और क्या ही उसका निजाम है ? जिन्होंने दलितों के ख़िलाफ़ हिंसा भड़काई , वे नामज़द आरोपी आराम से बाहर घूम रहे है , लेकिन जो हिंसा के ख़िलाफ़ न्याय के पक्ष में आवाज़ बुलंद करने में लगे थे, उन पर बेबुनियाद आरोप लगा कर उन्हें जेल में ठूँस दिया गया है . ऐसा तो ब्रिटिश गवर्नमेंट भी नहीं करती थी , पर लगता है कि वर्तमान में दिल्ली में राज गद्दी पर बैठे लोग बदले और प्रतिहिंसा ही भावना से भरे हुये है ,इसलिये वे चुन चुन कर अपने विरोधियों को ठिकाने पर लगाने पर आमादा हैं.यह भारतीय लोकतंत्र के लिए निहायत ही दुःखद समय है , जब पीड़ितों को ही दोषी ठहराने का सबसे गंदा खेल सबसे शातिर तरीक़े से खेला जा रहा है .

भीमा कोरेगाँव प्रकरण को गौर से देखने तथा उससे पहले तथा उसके बाद के घटनाक्रमों के सूत्र जोड़ने पर सत्ता प्रतिष्ठान की पूरी साज़िश और प्रारूप समझ में आ जाता है कि किस तरह विनिर्मित मुद्दों व काल्पनिक भय को आधार बना कर एक सरकार अपने ही मुल्क के जागरुक व मुखर नागरिकों को फँसा कर जेलों में डालने का कुकृत्य कर रही है .इस फ़ासीवादी फ़साओवाद का डिजायन यह होता है कि सबसे पहले एक ख़तरा निर्मित किया जाता है , फिर उस पर प्रॉपगैंडा साहित्य रचा जाता है , बाद में इस विचार से सहमति रखने वाले मीडिया संस्थानों के ज़रिये इसे विमर्श में लाया जाता है .

इसके बाद कईं दिनों तक मीडिया उस मेंयुफेक्क्चर्ड काल्पनिक भय से कांपने का प्रहसन करता है, ताकि जनता इस फ़र्जीवाड़े को असली मानकर डर से थर थर कांपने लगे. अंतत: हर चीज़ में खतरनाक साजिश के सूत्र खोज लेने वाले लोग किसी एक धर्म , संस्था या विचार अथवा व्यक्ति को उस काल्पनिक भय का मास्टर माइंड साबित करने में लग जाते हैं . इसके बाद इस कल्पना को हक़ीक़त में बदलने के लिए बहुत सारे ज़िंदा लोग फ़साएँ जाते है और उन्हें अनिश्चित काल के लिए जेलों में ठूंस दिया जाता है .

भीमा कोरेगाँव प्रकरण में ठीक यही डिजायन इस्तेमाल किया गया है .सबसे पहले दक्षिणपंथी लेखकों ने ‘अर्बन नक्सल’ की अवधारणा रची ,उस पर किताबें लिखी . फिर भक्त मीडिया ने सत्ता की गोद में बैठकर अर्बन नक्सल के सम्भावित ख़तरों से देश को चेताया. जब जनता को भरोसा होने लगा कि इस समय देश का सबसे बड़ा ख़तरा अर्बन इलाकों में चुपचाप पाँव पसार रहा शहरी नक्सलवाद है , तब जगह जगह से उन लोगों की धर पकड़ होने लगी . उन लोगों को गिरफ़्तार किया गया जो सत्ता प्रतिष्ठान के विरुद्ध देश भर में सक्रिय हैं .

उनको नक्सलियों के हमदर्द अथवा अर्बन नक्सली कह कर उठा लिया गया और उन्हें विधि विरुद्ध क्रिया कलाप निवारण अधिनियम (यूएपीए) जैसे क्रूर क़ानूनों के तहत जेलों में डाल दिया गया है , ताकि वे ताज़िंदगी लौट कर ही न आ सके .इस वक़्त भीमा कोरेगाँव हिंसा मामले में देश के अलग अलग राज्यों के 12 सामाजिक कार्यकर्ता , वकील , लेखक , पत्रकार व अध्यापक जेल में बंद है , इनमें डॉक्टर आनंद तेलतुम्बड़े , अरुण फ़रेरा, गौतम नवलखा ,हनी बाबू , महेश राउत, सुरेंद्र गाडलिंग, सुधा भारद्वाज , शोमा सेन,सुधीर धवले,रोना विल्सन ,वर्नन गोंजाल्विस तथा वरवरा राव जैसे मुखर लोग प्रमुख है .इनके अलावा भी पूछताछ व जाँच के नाम पर कईं सारे अन्य लोगों के यहाँ भी छापेमारी की गई और उनको प्रताड़ित किया गया है .भीमा कोरेगांव हिंसा के लिए नामजद मिलिंद एकबोटे और संभाजी भिड़े के खिलाफ कुछ भी नहीं किया गया .क्योंकि वे सत्तासीन लोगों के आदर्श हैं .

जबकि ऐसे लोग गिरफ्तार हैं जो यलगार परिषद् में गये तक भी नहीं .आनंद तेलतुम्ब्ड़े ने तो उसकी आलोचना तक में आलेख लिखे .पर अब यह बात कोई मायने नहीं रखती है .क्योंकि एक तयशुदा डिजायन के तहत उनको फंसाना ही इस फ़ासीवादी सत्ता का एक मात्र लक्ष्य बन चुका है ,अन्यथा महाराष्ट्र की वर्तमान सरकार इस पूरे मामले को ही वापस लेने को तैयार थी ,इससे पहले ही भीमा कोरेगांव षड्यंत्र केस केन्द्रीय जाँच एजेंसी ने अपने हाथ में ले लिया .आज देश के हालात यह बना दिये गये हैं कि असहमति की कोई भी आवाज़ सहन नहीं की जा रही है .आततायी सत्ता का सन्देश साफ है कि जो भी मुखालिफ़ हैं ,जो भी विरोध में बोलेंगे ,मुंह खोलेंगे ,उनके लिये जेलों के दरवाजे खुले हैं .देशद्रोह,राष्ट्रीय सुरक्षा और विधि विरुद्ध क्रिया कलाप सत्ता के प्रिय उपकरण रहे हैं ,वह बार बार अपने ही देश के असहमत नागरिकों पर इसका दुरूपयोग करती रही है .

भीमा कोरेगांव केस में भी यही हो रहा है .असहमतियों को कुचलने के इन फासिस्ट तौर तरीकों के खिलाफ आवाज उठानी होगी .आज से पांच सितम्बर तक एक अभियान के रूप में लोग हर जगह भीमा कोरेगांव साजिश के खिलाफ आवाज बुलंद करेंगे .आप भी इसमें शिरकत कर सकते हैं .इस अभियान की मांग है कि भीमा कोरेगांव प्रकरण के जेल में बंद लोगों को रिहा किया जाये ,उन पर थौपे गये सभी झूठे मामले वापस लिए जाएँ .इसके अलावा भी जिन जिन लोगों को देश भर में अन लाफुल एक्टिविटी एक्ट के तहत जेलों में डाला गया है ,उन सबको छोड़ा जाये ,साथ ही भारतीय दंड संहिता की धरा 124 ( क) राजद्रोह एवं धरा 499 ( मानहानि ) ,विधि विरुद्ध क्रिया कलाप ( निवारण ) अधिनयम एवं राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनयम को रद्द किया जाये .मेरा इस अभियान को सम्पूर्ण समर्थन है.आपसे भी आग्रह है कि इस अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करें

( संपादक – शून्यकाल डॉटकॉम )

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