बाहर मत भटको ,अपने अंदर देखो !

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(डॉ.एम.एल. परिहार)

बाहर यानी भटकाव, अंधेरा. अंदर यानी उजाला. अकेले हो तो ध्यान करो, समुह में हो तो प्रेम करो, मैत्री फैलाओ. भीतर का दीया जले, उजाला अंदर से हो, ज्ञान व ध्यान की ज्योति जले….
जो धन से नहीं मिलता है वह ध्यान से हासिल होता है ,जो पद व प्रतिष्ठा से नहीं मिलता है वह ध्यान से मिलता है. ध्यान की ज्योति हमेशा स्वयं व संसार को उजियारा देती है. भीतर प्रकाश नहीं जगा तो बाहर भी प्रकाश नहीं फैलेगा.
हम बाहर भटकते है लेकिन अंदर की ओर नहीं देखते है. बाहर यानी अंधेरा और अंदर यानी उजियारा, अदभुत जगमगाहट .हमारी सारी जीवन ऊर्जा बाहर की यात्रा मे बह रही है और भीतर अंधेरे में पड़े हैं। यह ऊर्जा भीतर की तरफ लौटे तो यही ऊर्जा प्रकाश बनेगी.
हम सारी रोशनी बाहर डालते है सबको देख लेते है लेकिन अपने प्रति अंधे रह जाते है. और सबको देखने से क्या होगा, जिसने भीतर नहीं झांका ? स्वयं को न देखा, उसने कुछ भी नहीं देखा. क्योंकि जिसे हम खोजने के लिए बाहर भटक रहे है वह हमारे भीतर है.
यदि भीतर के उजाले को देखना है तो विपस्सना ध्यान ही एक मात्र मार्ग है। हम सभी के पास उतनी ही ध्यान ऊर्जा है जितनी बुद्ध के पास, रत्ती भर कम नहीं। प्रकृति ने सभी को बराबर दी है उसकी किरणें सब पर बराबर फैलती हैं। उसका सूरज सबके लिए उगता है। उसकी नजर में न कोई छोटा है न कोई बड़ा है। हर कोई ध्यान से अपने भीतर प्रकाश जगा सकता है, बुद्धत्व को प्राप्त कर सकता है.
लेकिन हमने सारा ध्यान बाहर के विषयों पर लगा रखा है, हमारा ध्यान वस्तुओं पर टिका हुआ है. हमारा मन मोहक चीजों में फंसा हुआ है, हमारा चंचल चित्त बाहर की चकाचौंध में ज्यादा रम रहा है.
किसी का मन का धन में अटका है,किसी का प्रतिष्ठा में, किसी का वस्तुओं में अटका है और किसी का संबंधों में अटका हैं
इसलिए बुद्ध से लेकर कबीर तक सभी यही कहते है बाहर मत भटको ,अपने अंदर देखो. बाहर के राग ,मोह ,लोभ ,घृणा ,तृष्णा छोड़ो। मन को बाहर मत अटकाओ। सारी ऊर्जा को भीतर की ओर मोड़ दो. तुम स्वयं तो रोशन होते ही हो ,खुद तो प्रकाशवान होते ही हो. आस पास के वातावरण में भी सुख, आनंद व उजियारा छा जाता है. जब अपने दीपक स्वयं बनोगे तो बाहर भी रोशनी की जगमगाहट होगी. मैत्री की महक फैलेंगी.
भवतु सब्ब मंगलं….. सभी निरोगी हो
(डॉ. एम. एल. परिहार से साभार )

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