क्या आप सत्यनारायण सोनी को जानते हैं ?

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-सतीश छिम्पा


” जिस तरह हिंदी में ‘कॉमरेड का कोट’ कहानी से अचानक ही सृंजय का जोरदार उभार और चर्चा का तूफानी दौर चला। ‘पीली छतरी वाली लड़की’ से उदयप्रकाश विख्यात हुए- सत्यनारायण सोनी ने ‘घमसाण’ कहानी संग्रह से राजस्थानी कहानी में ऐसा सफल प्रयोग किया जिससे समकालीन कहानीकार अभी तक निकल नहीं पाए हैं.”


क्षेत्र के बेहतरीन रचनाकारों को दो तरह की मुख्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है। पहली- बिसराने, नजर अंदाज करने की, मूल्यांकन ही मत करो, नाम ही मत लो, लेखक मर जाएगा खुद ही। दूसरी – खुद को फिर से सृजन के मोर्चे पर खड़ा करने की अलगरजी, आलस, भटकाव या और भी बहुत से स्वतः ही पैदा हुई व्याधियां, जिम्मेदारियां। सत्यनारायण सोनी को दोनों का सामना करना पड़ा है। 1995 में छपी ‘घमसाण’  उस समय परलीका से छपा पहला कहानी संग्रह था जिसने राजस्थानी कहानी में तूफान ला दिया था। यह इतना चर्चित रहा था कि सम्मान और पुरस्कारों की झड़ी लग गई थी। कारण था परम्परागत राजस्थानी कहानी में आमूल- चूल बदलाव।

राजस्थानी कहानी के शिल्प-कथ्य का सांचा बदल कर जो नया तैयार हुआ वो इसी संग्रह की देन है- ना केवल सांचा बल्कि एक पूरी कथा पीढ़ी इसके बाद तैयार हुई थी। भरत ओला, रामेश्वर गोदारा, मेहरचंद धामू, पूर्ण शर्मा पूरण आदि जो महत्वपूर्ण नाम ह ,वे इस नाम के प्रचण्ड उभार के बाद सामने आए। कहा जा सकता है कि जिस तरह परम्परागत कहानी में बदलाव सांवर दईया के कारण हुआ उसमे कथ्यगत विविधताओं के साथ शिल्प विधान का सफल प्रयोग करके, गंगानगर परिक्षेत्र में नई शैली की राजस्थानी कहानी का पहला नाम सत्यनारायण सोनी बन गए, जो कालांतर में पूरे राजस्थान की कहानी चेतना में बदलाव का आगीवा बन गया। विख्यात कवि, लेखक, रंगकर्मी अर्जुन देव चारण ने सही लिखा है कि, “सत्यनारायण सोनी की कहानियां डायरी, संस्मरण और आत्मकथ्यात्मकता के बीच पुल की तरह काम करती है।”– यह विशेषता यूँ ही नहीं आई बल्कि इसके पीछे शब्द साधना का लंबा दौर था। विश्व साहित्य की कहानी में जो नयापन गोगोल और चेखव लेकर आए, वो हिंदी में स्वयं प्रकाश ने स्थापित किया था– और राजस्थानी में सत्यनारायण सोनी ने या कहें ‘घमसाण’ ने।        जहां तक मेरे पाठक की सचेतनता की बात है वो घमसाण के ग्रामीण परिवेश के पात्रों की उन छोटी छोटी और स्थानीय होते हुए भी वैश्विक मनोस्थिति का रंजकीय चित्रण को कैच करता है। कारण यह कि कोई भी रचना इसलिए कालजई नहीं बनती कि उसको गोर्की, रेणु या प्रेमचन्द या बिज्जी ने लिखा है, वो इसलिए समय की सीमाओं को पार करती है कि उसके पात्र जिन स्थानीय छोटी या बड़ी व्याधियों का सामना करते हैं, वे स्थानीय होते हुए भी वैश्विक है, उनका दुख और सुख साझा है। यही कारण घमसाण को आज चोवीस साल बाद भी जिंदा रखे हुए है- जिसका विस्तार और मंजा हुआ रूप  ‘धान कथावां’ में स्पष्ट दिखाई देता है। एक दिखने में छोटी, सरल सी कहानी किस तरह पाठक तो पाठक, आलोचक की टोचरी में याददिहानी का लठ मारती है वो ‘आ फोटू अठै किंयां’ कहानी को पढ़ने के बाद सहज पता चलती है। आज के इस कला विरोधी काले फ़ासिस्ट दौर में जब कलाओं को लोकधर्मिता से विमुख होकर पंथों- किलों में बदलते आसानी से देखा जा सकता है, वहीं ‘आ फोटू अठै किंयां’, कहानी में बहुत मुलायम या सॉफ्ट वैचारिक प्रतिरोध को भी देखा जा सकता है। किस तरह पात्र उग्र या आक्रोशित हुए बिना, सहज रहते हुए बात कहता और पकड़ता है।     मैं कई बार लेख, रक्षक और किरसा के संपादकीय में और यहां सोशल मीडिया पर लिख चुका हूँ कि एक बेहतरीन कथाकार वही होता है जो लाजवाब कवि होता है- वो चीजों, बात और विचारों के बीच लयात्मक तादात्म्य स्थापित करने में सबसे ज्यादा कलात्मकता लेकर आता है। उदय प्रकाश, स्वयं प्रकाश, सत्यनारायण (जोधपुर), रघुनंदन त्रिवेदी, रामस्वरूप किसान हो या सृंजय, सब के सब आंशिक, पूर्ण या कभी- कभार वाले कवि ही थे। सबकी शुरुआत कविता से हुई मगर भावों, संवेदना और  प्रतिबद्ध सामाजिक सरोकारों के कारण बेहतरीन कथाकार बन गए, और यही कुछ अपने इस लाजवाब कहानीकार सत्यनारायण सोनी के साथ भी है। भले ये कहते रहें कि ‘कवि होने की जिद में’, मगर इनका कवि ही इनके भीतर बेहतरीन कहानी कार को पैदा करने का जरिया है।       हैरानी इसकी नहीं है कि अपने लगभग तीन दशकों की कथा यात्रा में अभी बस दो ही कहानी संग्रह आए हैं, बल्कि इसकी है कि एक ऐसा रचनाकार जिसको पीठ पीछे उसी के आलोचक उसको ‘राजस्थानी का स्वयं प्रकाश’ कहते हैं ने इतना कम क्यों लिखा। क्यों वे भटकाव या दोलन (बाल साहित्य, कविता की तरफ) का शिकार हुए- जबकि उन्ही की कहानियों की पूंछ पकड़ कई कम योग्यता वाले थोक के भाव लिखकर शीर्ष पर बैठे हैं। कारण तो इसके लेखक ही जाने- मगर जो बात पाठक को पिंच करती है कि बिल्कुल छोटी, सामान्य, यूँ ही सी घटना- बात या विचार को शब्दों के घोळीये से इस तरह मिला कर कहानी लिखना कि हर व्यक्ति उससे जुड़ाव महसूस करे, मुश्किल नहीं नामुमकिन काम है। क्योंकि इसी शैलीगत विशेषता को चेखव तक पूरी तरह नहीं साध पाए और ‘छोटी सी बात’ कहानी को कभी पूरा ही नहीं कर पाए, वो सोनी के रचनाकार ने कर दिखाया।      इस बेहतरीन कथाकार के साथ दिक्कत क्या है कि अन्य लोगों की तरह लगातार क्यों नहीं लिखता, कारण नहीं पता। ‘कथेसर’ कि जिम्मेदारियां भी इतना बड़ा कोई कारण नहीं हो सकती। फिर भी पाठक, लेखक- वैचारिक साथी होने के नाते दबाव डाला जा सकता है कि ‘ज्ञानरंजन’ मत बन जाना कि कहानी भी नहीं लिख पाए और संपादन का यह पक्षपाती समय और गुट, कोई मूल्य ही ना पा सके।         सोनी भाई जी लगातार इसी तरह की कहानियां लिखते रहें, ऐसा कुछ उनके पाठकों को दबाव पैदा करना चाहिए, एक ऐसा दबाव जिससे लेखक के भीतर का सृजनधर्मी मन सिर्फ उत्साहित हो, ना कि इतना कि दबाव का ज्यादा बोझ सहते दब ही जाए। अगले संग्रह के इंतज़ार में हम सब आपके पाठक…..Attachments

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