मेरे भैया गए है रंगून, वहां से किया है टेलिफुन, धम्म की बात बताते है !

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(डॉ.एम.एल.परिहार)
साथियों, इन दिनों मैं म्यांमार (बर्मा) की धम्म यात्रा पर हूं.धम्म की गौरवशाली संस्कृति को संजोए रखने वाले इस देश का इतिहास व वर्तमान बहुत रोचक है. सन् 1200 से 1800 के बीच जब भारत से बौद्ध धर्म को नष्ट कर जमीन में दफनाया जा रहा था उस काल में म्यांमार में बुद्ध की वाणी का ध्वज गौरव से फहर रहा था .
लगभग साढे पांच करोड जनसंख्या वाले इस देश की लगभग 16 सौ किमी सीमा भारत के विभिन्न राज्यों से मिलती है यहां की 90 % जनसंख्या बौद्ध 6 % ईसाई और 4 % मुस्लिम है .चावल व टीक वुड का यह दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक देश है.19 वी सदी तक यहां कई शासकों के दौरान भारत से गया बौद्ध धर्म खूब फला फूला .
अंग्रेजों ने भारत के बाद 1852 में म्यामांर पर भी अधिकार कर लिया और इसका नाम बर्मा रख लिया. फिर 1937 में बर्मा को भारत से अलग देश का दर्जा दे दिया. 1942 में सेकंड वर्ल्ड वार के दौरान इस देश पर जापान ने कब्जा कर लिया .1945 में फिर से अंग्रेजों का कब्जा हुया. 1948 में बर्मा को ब्रिटिश राज से आजादी मिल गई और डेमोक्रेटिक गवर्नमेंट बनी. 1962 में यहां से सेना ने तख्तापलट कर खुद शासक बन गए. विपक्ष की नेता व नोबेल पुरस्कार विजेता सान सू की को लंबे समय तक जेल में रखा गया लेकिन 2016 में चुनाव में उनके दल के भारी विजय हुई और आज राष्ट्रपति की सलाहकार है.
कल से हम म्यांमार के सबसे बड़े व सुंदर शहर यांगून में है. पार्क, झीलों व प्राचीन विशाल बौद्ध स्तूपों के कारण यह विश्व प्रसिद्ध है. ब्रिटिश शासन की यहां स्पष्ट झलक मिलती है.उस समय की वैसी ही ईमारतें जैसी भारत में है. यातायात की बहुत अच्छी व्यवस्था है. सड़कों पर कार, बस व पब्लिक ट्रांसपोर्ट के फौर व्हीलर ही चलते हैं. पूरे शहर में स्कूटर बाइक पर रोक है.
जीवित बुद्ध के अवशेष……
कल हम चालीस भारतीय बुद्ध अनुयायियों के ग्रुप ने यांगून (रंगून)में विश्व विख्यात श्वेडागोन पेगोड़ा (स्तूप) देखा जहां बुद्ध के बाल के अवशेष रखे हुए हैं. जब सिद्धार्थ को बोधगया में बुद्धत्व प्राप्त हुआ तो बाद के सात सप्ताह के दौरान म्यांमार से दो वणिक भाई भी वहां आए थे. बुद्ध ने आशीर्वाद व निशानी के रूप में अपने सिर के आठ बाल दिए थे.
वापस म्यांमार लौटने पर किंग व प्रजा ने दोनों भाईयों का भव्य स्वागत किया और 588 ईसा पूर्व किंग ओकाल्पा ने बालों के अवशेष के साथ सोने से ढका बुद्ध विहार बनवाया. फिर बाद में 146 एकड़ में गगनचुंबी ऊंचाई वाला विशाल स्तूप बनवाया. बुद्ध के काल से 14वी सदी तक 32 राजाओं ने धम्म के इस महान धरोहर को संजोए रखा लेकिन भूकंप प्रभावित इस इलाके में समय समय पर भूकंप के कारण इस स्तूप को नुकसान हुआ. कई राजाओं वह रानियों ने इसकी सुरक्षा के लिए अपने वजन से कई गुना ज्यादा लगभग 500 किलो सोने का दान कर उसकी चौड़ी पत्तियां बनाकर स्तूप की सुरक्षा की.
आज ढाई हजार साल बाद भी विशाल क्षेत्र में फैला यह गौरवशाली स्तूप धम्म के गौरव की कहानी बखान कर रहा है .इसके चार दिशाओं में बुद्ध की भव्य विशाल चार प्रतिमाएं हैं. इसके अलावा चारों और सैकड़ों अन्य प्रतिमाएं हैं जिसके कारण अनुयायी कहीं भी बैठकर बुद्ध का वंदन कर सकते है. हर समय यहां हजारों की भीड़ होने के बावजूद चारों ओर अनुशासन व धम्म के प्रति सम्मान का समंदर बहता नजर आता है.
खास बात यह भी है कि ब्रिटिश शासकों ने भी बुद्ध के प्रति सम्मान के कारण इसके संरक्षण में काफी मदद की.
साधारण आर्थिक स्थिति के बावजूद म्यांमार के धम्म अनुयायी लोग बहुत सहज, सरल, ईमानदार व दानी होते है और धम्म के प्रति उनका समर्पण हम सभी के लिए अनुकरणीय है.
भवतु सब्ब मंगल…..सबका कल्याण हो…
(प्रस्तुति : डॉ एम एल परिहार)

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