डॉक्टर कफील की रिहाई के लिये सोशल मीडिया पर प्रदर्शन

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डा कफील खान की रिहाई की मांग के साथ उदयपुर के न्यायपसंद और लोकतांत्रिक- जनवादी संगठनों एवं  नागरिकों ने, कोरोना के शहर में बढ़ते मामलों के चलते सोशल मीडिया पर फ़ोटो और वीडियो के  माध्यम से, रिहाई की मांग के साथ प्रदर्शन किया।

इसमें प्रमुख रुप से वरिष्ठ पत्रकार एवं महावीर समता संदेश के संपादक हिम्मत सेठ ,ए. आई. पी. एफ के   प्रोफेसर आर. एन. व्यास , प्रोफेसर एल. आर. पटेल ,  पीयूसीएल से  अधिवक्ता अरुण व्यास एवं आर डी व्यास ,बोहरा यूथ के  गजनफर अली , डॉक्टर फ़रहत बानो, रिटायर्ड इंजीनियर अफ़ज़ल क़ादरी,  एपवा  की हीना खान, लेखक प्रोफ़ेसर हेमेंद्र चंडालिया,  भाकपा-माले के शंकरलाल चौधरी, कैलाश रोत, रफत कुर्बान, क़मर इकबाल ,  किसान महासभा के डाक्टर चंद्रदेव औला , ऐक्टू के सोरभ नरूका  आदि ने भागीदारी करी ।


डा कफील वही शख्स हैं जिन्होंने अगस्त 2017 में गोरखपुर के बी.आर. डी होस्पीटल में निजी स्तर पर प्रयत्न कर आक्सीजन सिलेण्डरों की त्वरित व्यवस्था कर  सैकडों बच्चों की जान बचाई थी। तब इस अस्पताल में  बजट के अभाव में या उस समय भुगतान के लिए कमीशन की बात सामने आयी के कारण अस्पताल प्रशासन द्वारा   ठेकेदार को भुगतान नहीं किया गया।  इसके चलते आक्सीजन सप्लाई रूक जाने से सैकड़ों बच्चों की जान चली गयी। 
 जहाँ इसके चलते उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को शर्मशार होना पड़ा था वही डाक्टर कफील की भूरी भूरी प्रशंसा हुई थी। इस से रूष्ट होकर बाद में डा कफील के खिलाफ अस्पताल प्रशासन ने जांच कमेटी बिठाई थी जिसमें उनको क्लीन चिट मिली । परन्तु फिर एक नयी  जांच कमेटी बिठाई गयी,जिसकी रिपोर्ट का आजतक अता-पता नहीं है।   वर्तमान में डाक्टर कफील द्वारा 12 दिसम्बर, 2019 को अलीगढ विश्वविद्यालय में सी ए ए के खिलाफ भाषण देने पर एफ आई आर दर्ज की और लगभग दो महीने बाद 10 फरवरी 2020 को डाक्टर कफील को मुम्बई हवाई अड्डे से गिरफ्तार किया गया।इस मामले में डाक्टर कफील को 14 फरवरी को  जमानत मिल  भी गयी परन्तु जमानत मिल जाने के पश्चात भी उन्हें रिहा नहीं किया गया और चार दिन पश्चात 14 फरवरी को तीन महीने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत फिर से जेल में डाल दिया गया। 12 मई को इस आधार पर कि रिहा करने पर  कानून और व्यवस्था के बिगड़ जाने का खतरा है, फिर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत अवधि बढ़ा दी गई।

एक तरफ जहां विकास दुबे जैसे दुर्दांत अपराधियों को दर्जनों हत्या जैसै गंभीर मामले लंबित होने के बावजूद रासुका जैसे कानून नहीं लगाये गये वहीं डाक्टर कफील जैसे सामान्य नागरिक को सरकार के खिलाफ बोलने मात्र पर रासुका जैसे  दमनकारी कानून के तहत कार्रवाई कर जेल में डाल देना उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की डॉक्टर कफील के खिलाफ ज्यादती और उनके संविधान के तहत मौलिक अधिकारों और मानवाधिकारों का घोर हनन है और यह राज्य  में प्रजातंत्र को कुचल डालने जैसा है।


देश भर में चल रहे डाक्टर कफील की रिहाई की मांग के अभियान के तहत उदयपुर में भी आज उनकी रिहाई के लिए सोशल मीडिया पर अभियान चलाया गया। आंदोलन उनकी रिहाई तक जारी रहेगा ।

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