राजस्थान में अनुसूचित जाति व जनजाति उपयोजनाओं पर कानून बनाने की मांग ने जोर पकड़ा

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4 फरवरी, 2020-राजस्थान में अनुसूचित जाति व जनजाति उपयोजनाओं पर कानून बनाने की आवश्यकता पर बजट अध्ययन एवं अनुसंधान केन्द्र (BARC), सूचना एवं रोजगार अधिकार अभियान (SR Abhiyan), दलित अधिकार केन्द्र (CDR), अखिल भारतीय दलित महिला मंच (AIDMM), राजस्थान आदिवासी अधिकार मंच (RAAM) एवं अम्बेडकर सोशल इक्विटी एंड एम्पॉवरमेंट मिशन द्वारा एक दिवसीय बैठक का आयोजन आज विकास अध्ययन संस्थान, जयपुर में किया गया ।

बजट अध्ययन एवं अनुसंधान केन्द्र के निदेशक डॉ नेसार अहमद ने बताया कि केन्द्र एवं अन्य राज्य सरकारों की तरह राजस्थान सरकार द्वारा भी वित्त वर्ष 2017-18 से बजट के योजना व गैर योजना वर्गीकरण को समाप्त कर दिया गया है। इसके परिवणामस्वरुप राज्य में भी अनुसूचित जाति एवं जनजाति उपयोजनाओं का आधार समाप्त होने से ये उपयोजनाएं भी कमज़ोर हो गयी हैं। हालांकि राज्य सरकार ने योजना व गैर-योजना खर्च को समाप्त किये जाने के बावजूद 28 दिसम्बर 2016 को इस संबंध में एक परिपत्र जारी कर दोनों उपयोजनाओं में बजट आवंटन पूर्व की भांति यथावत् रखे जाने की बात कही थी।

सोशल एक्टिविस्ट भंवर मेघवंशी ने कहा कि आयोजना बजट में इस बदलाव व योजना आयोग को समाप्त किये जाने के बाद तेलंगाना, उत्तराखंड आदि राज्यों द्वारा उपयोजनाओं के क्रियांवयन हेतु कानून बनाकर प्रभावी रुप से लागू किये जा रहे हैं। इस स्थिति में यह आवश्यक है कि राजस्थान सरकार भी बजट में हुये बदलावों को ध्यान में रखते हुये तेलंगाना सरकार की तर्ज पर कानून बनाकर लागू करें .

इस बैठक में राज्य में अनुसूचित जाति एवं जनजाति उपयोजनाओं के क्रियांवयन की स्थिति, देश के अन्य राज्यों में इनका क्रियांवयन एवं राज्य में उपयोजनाओं के बेहतर क्रियांवयन हेतु कानून संबंधी मांग पर चर्चा की गयी । इस कार्यशाला में उपयोजनाओं पर चर्चा कर सरकार को देने के लिए एक मांग पत्र तैयार किया गया । इसमें मुख्य रुप से यह सुझाव आया कि राज्य सरकार सरकार द्वारा इन उपयोजनाओं हेतु बजट में हुये बदलावों को ध्यान में रखते हुये तेलंगाना सरकार की तर्ज पर कानून बनाकर लागू किया जाये। जिससे राज्य के दलितों व आदिवासी समुदाय को उनके समुचित आर्थिक अधिकार मिल सके व राज्य के बजट व वित्तीय प्रक्रिया में उनकी सहभागिता हो सके ताकि इन वर्गों का सामाजिक एवं आर्थिक सशक्तिकरण हो सके। 

इसके अलावा उपयोजनाओं के व्यवस्थित क्रियांवयन के संबंध में निम्नलिखित मांगे एवं सुझाव आये:

  • राज्य सरकार को केंद्र सरकार की तरह उपयोजनाओं के अंतर्गत किये जाने बजट आवंटन का दर्शाने हेतु अलग स्टेटमेंट (21 एवं 21 ए) जारी करने चाहिए।
  • उपयोजनाओं हेतु आयोजना,बजट आवंटन एवम खर्च ,निगरानी तथा पारदर्शिता हेतु राज्य,जिला एवं निम्न स्तर के सभी विभागों के साथ पंचायतीराज संस्थाओं को दिशा निर्देश जारी किए जाए।
  • उपयोजनाओं के व्यवस्थित क्रियान्वयन हेतु पारदर्शिता एवम जवाबदेही की मजबूत व्यवस्था हो।
  • अनुसूचित क्षेत्रों में पेसा कानून ग्रामसभा को आयोजना का अधिकार देता है ,उपयोजनाओं से सम्बंधित आगामी कानून एवं रणनीति में पेसा के इस प्रावधान को शामिल किया जाना जरूरी है।
  • विधेयक में जनजाति कल्याण निधि (महाराष्ट्र पैटर्न) के संबंध में नियम भी शामिल किए जाए ।
  • कुछ दक्षिण भारतीय राज्यों की सरकारों द्वारा भूमिहीन दलितों एवम आदिवासियों को उपयोजनाओं के तहत भूमि उपलब्ध नही होते हुए भी भूमि खरीद कर वितरित की जा रही है जो कि सफल कार्यक्रम है । अतः राज्य सरकार भी ऐसे कार्यक्रम बना सकती है।

बैठक में असीम से डॉ राजेन्द्र जाटोलिया, डॉ बी एल बैरवा, अजाक के प्रवक्ता जी.एल वर्मा, सेंटर फॉर दलित राइट्स से सतीश वर्मा, एस. आर. अभियान से मुकेश निर्वासित, कमल कुमार, एडवोकेट ताराचंद वर्मा, डॉ नवीन नारायण, गोवर्धन जयपाल,विकास अध्ययन संस्थान से डॉ मोतीलाल महामलिक,सामाजिक न्याय एवं विकास समिति के सचिव  गोपाल वर्मा,जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वयन के राज्य संयोजक कैलाश मीना,राजस्थान आदिवासी अधिकार मंच के कारू लाल ,भीम सिंह ,अंकुश कुमार ,महेंद्र सिंह ,राकेश शर्मा,पवन देव ,शुएब खान चन्दा लाल बैरवा तथा अशोक मेघवाल और डॉ एम एल परिहार आदि उपस्थित थे ।

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