दिल्ली विधानसभा चुनाव “संयोग” नहीं, “काम” का प्रयोग है !

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–  चंद्र भूषण
दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी (आप) की “हैट्रिक” परंपरागत राजनीति के मिथक को तोड़ने वाला साबित हुआ है। काम के बल पर और सकारात्मक (पॉजिटिव) राजनीति के बूते चुनाव जीतना शायद आजाद भारत में यह पहली घटना है। इसे यूं  कह सकते हैं की बड़बोलेपन, गाली-गलौज ,अहंकार, विभेदकारी या सांप्रदायिक राजनीति के “संयोग” पर अब “काम” की राजनीति के प्रयोग की जीत है।

निश्चय ही दिल्ली विधानसभा चुनाव आम आदमी पार्टी और भाजपा दोनों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण था। आजाद भारत के इतिहास में अगर कोई पार्टी अपने 5 साल के काम की फेहरिस्त जनता के सामने गिना रही हो और सीना ठोंक कर कह रही हो कि यदि हमने काम किया है तभी हमें वोट देना अन्यथा न देना तो इस पर आम जनता के कान खड़े होना स्वाभाविक है वरना अभी तक जाति धर्म और फूट डालो शासन करो के परंपरागत तरीके से ही चुनाव जीते जाते थे।
    एक तरफ जब आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल स्कूल, अस्पताल, बिजली-पानी, होम डिलीवरी स्कीम, बसों में महिलाओं का फ्री सफर, बुजुर्गों की मुफ्त तीर्थ यात्रा, कच्ची या अनधिकृत कॉलोनियों में विकास जैसे स्कीम की सफलता के उदाहरण बता कर वोट मांग रहे थे तो दूसरी तरफ मुख्य प्रतिद्वंदी भारतीय जनता पार्टी नागरिकता कानून के विरोध का पर्याय बनी शाहीन बाग, हिंदू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद और देशभक्त पार्टी के जुमले आम जनता में परोस रही थी। भाजपा के इस मुहिम को जदयू, लोजपा जैसी पार्टियां साथ दे रही थी।इसके अतिरिक्त कांग्रेस और राजद मिलकर भी जोर आजमाइश कर रही थी। बसपा अपने वजूद को तलाश रही थी। 
कुल मिलाकर कह सकते हैं कि केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को हराने के लिए देश की सारी पार्टियां एकजुट हो गई थी। आखिर आम आदमी पार्टी जैसी छोटी पार्टी को हराने के लिए सभी पार्टियां एकजुट क्यों हो गई थी? बकौल केजरीवाल वह सभी पार्टियां नए तरह की जन्म ले रही “काम की राजनीति” को हराना चाहते थे और यह स्थापित करना चाहते थे कि पिछले 70 सालों में परंपरागत जाति-धर्म और जुमलेबाजी की ही राजनीति जीत सकती है।… अब चुंकि दिल्ली में काम की राजनीति का सूत्रपात हुआ है  तो निश्चय ही देश के अन्य हिस्सों में आम जनता में जुमलेबाज राजनीतिक दलों को खारिज करने का चलन जोर पकड़ेगा।


आखिर दिल्ली के चुनाव में केजरीवाल इतने महत्वपूर्ण क्यों हो गए थे? आखिर भाजपा या अन्य पार्टियों की फूट डालो शासन करने की रणनीति क्यों खारिज हो गई? आप की  जीत की रणनीति क्या थी? आइए विस्तार से इस पर चर्चा करें।
   क्या थी भाजपा की भूल ?   ——————————    भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस को कमजोर करने के क्रम में यह मानकर चल रही थी कि विपक्ष विकल्पहीनता की शिकार है। हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड के हालिया विधानसभा चुनाव के परिणाम से भी वह सबक लेने को तैयार नहीं थी।
हिंदुत्व/राष्ट्रवादी एजेंडा फिर से      —————————————-    भाजपा कट्टर हिंदुत्व और राष्ट्रवादी एजेंडे को लोकसभा चुनाव के तर्ज पर दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी भुनाने का प्रयास करने लगी। इसके साथ ही नागरिकता कानून (सी. ए. ए.) को हर हाल में लागू करने की प्रतिबद्धता तथा चोर दरवाजे से एन.पी.आर. के जरिए एन.आर.सी. लागू करने की मंशा ने भारत की सेकुलर आबादी में खलबली मचा दी। मुस्लिमों का एक बड़ा तबका भाजपा के खिलाफ हो गया।

गोपाल, कपिल गुर्जर जैसे सिरफिरे द्वारा जामिया, शाहीन बाग में गोली चलाना और सरजील इमाम की आड़ में आम आदमी पार्टी को घेरने का कुत्सित प्रयास भी काम ना आया। भाजपा को लगा कि 75 से 80 फ़ीसदी हिंदू आबादी पर 20 से 25% मुस्लिम आबादी अगर नाराज भी होती है तो हिंदू वोट बैंक झक मारकर उन्हीं की तरफ मुड़ेगा। उसकी यह सोच कि चुनाव में जीत जाति- धर्म की “केमिस्ट्री” से जीती जाती है यह दांव उल्टा पड़ा।
   नेताओं के बिगड़े बोल    —————————  केजरीवाल को अराजकतावादी, आतंकवादी, हिंदुओं का गद्दार, नक्सलवादी और गाली-गलौज को दिल्ली की पढ़ी-लिखी आबादी बर्दाश्त नहीं कर सकी। उसे यह सब नागवार लगा जिसमें अमित शाह, अनुराग ठाकुर, प्रवेश साहिब सिंह वर्मा, गिरिराज सिंह एवं स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अहंकारी और नेगेटिव कैंपेनिंग का असर यह रहा कि आम जनता यह सोचने को  विवश हो गई कि यह कौन सी राजनीति है जिसमें अपने ही देश के नेताओं को आतंकवादी, गद्दार या पाकिस्तानी एजेंट कहा जा रहा है। यह दांव भी भाजपा को उल्टा पड़ा।
 कड़वाहट और विभेदकारी राजनीति —————————————    दिल्ली जैसी मिश्रित दो करोड़ की “मिनी भारत ” के लिए पहली बार भाजपा के कड़वाहट भरी भाषा और तीखे हमले की राजनीति लोगों को असहज करने वाली लगी। दिल्ली, जहां देश के हर कोने- कोने से हर जाति- धर्म के लोग निवास करते हैं, वहां इस तरह की भाषा लोग पचा नहीं पाए और भाजपा के खिलाफ वोट किया।
मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा नहीं ———————————————   भाजपा  केजरीवाल के खिलाफ कोई सशक्त मुख्यमंत्री उम्मीदवार के नाम की घोषणा नहीं कर पाई, जिससे यह चुनाव शुरू से ही एकतरफा लगने लगा था। लोग खुद कहने लगे थे कि केजरीवाल बेहतर मुख्यमंत्री हैं और दिल्ली के लिए यही ठीक है। “आप” द्वारा बार-बार भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा की चुनौती देना और इस चुनौती को न स्वीकारना भी भाजपा के लिए उल्टा पड़ा। मोदी के नाम पर बार- बार चुनाव लड़ना और ऊपर से मुख्यमंत्री पद के लिए किसी ऐरे- गैरे को बैठाने की मंशा आम जनता के सिरे नहीं चढ़ पाई।

असली मुद्दों से ध्यान भटकाने का प्रयास ———————————————   भाजपा लोकसभा और विधानसभा चुनाव के फर्क को नहीं समझ पाई। एक तरफ जहां केजरीवाल दिल्ली में अपनी सरकार द्वारा 5 वर्षों में शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली- पानी, सड़क, नाली आदि के क्षेत्र में किए गए कामों और “फ्रीबीज” की बात कर रहे थे तो दूसरी तरफ भाजपा शाहीन बाग, फर्जी राष्ट्रवाद जैसी गंदी राजनीति का खेल खेलकर असली मुद्दों से ध्यान भटकाने का प्रयास करती रही।वह यह मानकर चलती रही कि देश के अन्य भागों में विकल्प हीनता के अभाव में लोग झक मारकर भाजपा को ही वोट करेगी, यह आंकलन गलत निकला।
   भारी-भरकम नेताओं की फौज, नाम बड़े दर्शन छोटे ——————————————-   भाजपा ने अपने 9 मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों, 200 से ऊपर सांसदों के भारी-भरकम लाव- लश्कर को उतार दिया, जो सभी राजनेता थे कार्यकर्ता बनकर नहीं उतरे। सभी भाषणवीर और केजरीवाल को पानी पी -पीकर कोसने में व्यस्त रहे और आत्ममुग्ध रहे। दूसरी तरफ केजरीवाल द्वारा अकेले मोर्चा संभालना आम जनता में असर दायक रहा।
 नई राजनीति को न समझ पाने की भूल ———————————————- भाजपा या मानकर चल रही थी कि मीडिया पर आक्रामक प्रचार- प्रसार, होर्डिंग, बैनर ,बढ़- चढ़कर भाषणबाजी के झांसे में आम जनता आ जाएगी लेकिन वह यह नहीं समझ पाई कि “काम” की राजनीति परंपरागत राजनीति को काफी पीछे छोड़ चुकी है।

कांग्रेस की शिथिलता ——————————- कांग्रेस पार्टी यह जान चुकी थी कि उसका वोट बैंक आम आदमी पार्टी की ओर खिसक चुका है इसलिए एक तरह से पार्टी ने अपने उम्मीदवार तो उतारे लेकिन ” वाक ओवर “दे दिया। बड़े नेताओं में राहुल और प्रियंका भी अंतिम तीन-चार दिनों में सक्रिय हुए और कुछ जनसभाएं की।
  क्या थी केजरीवाल की रणनीति ?——————————————–  2013 की 49 दिनों की ही सरकार चलाने पर जनता से माफी मांग कर दोबारा 2015 का चुनाव लड़ना और जीतना ज्यादा चुनौतीपूर्ण था। सबसे बड़ी बात यह थी कि नई बनी पार्टी की कोई “परफॉर्मेंस” नहीं थी। लोगों ने 2015 में केजरीवाल की ईमानदारी, साफगोई, देशभक्ति और उसकी संघर्षशीलता पर वोट दिया था।
 2020 में केजरीवाल द्वारा 5 साल में किए गए अच्छे काम और लोगों के जीवन में कितने बड़े पैमाने पर बदलाव आया, उसे लेकर आम जनता ने वोट दिया। सबसे बड़ी खासियत यह थी कि 2015 से 2017 तक आक्रामक और हर बात पर मोदी को पानी पी-पी कर कोसने वाले केजरीवाल में 2020 आते-आते गजब का बदलाव या परिवर्तन देखने को मिला। वह अपने भाषणों में राज्य और केंद्र के बीच सौहार्दपूर्ण संबंधों की वकालत करते नजर आए। मोदी पर 2019 में लगभग न के बराबर हमला बोला। केवल और केवल अपने कामों की चर्चा करते नजर आए।

भाषा में सौम्यता ———————– केजरीवाल की छवि धरना-प्रदर्शन, चिल्लाकर बोलने वाली की बनी हुई थी। राजनीति में आए इस नए खिलाड़ी को और पार्टी के प्रति लोग संदेह की निगाह से देख रहे थे लेकिन 5 वर्षों में अपने किए गए सारे वादे के अलावा अन्य काम करके आम जनता का दिल जीत लिया। अपनी भाषा में संयम और सौम्यता का परिचय देकर अपर मिडिल क्लास का भी दिल जीतने में सफलता पाई। भाजपा सहित अन्य पार्टियों की गाली-गलौज की राजनीति के विपरीत हर सवाल का बेबाकी, ईमानदारी और सटीक जवाब देने की शैली ने आम जनता को प्रभावित किया।
चुनाव की तैयारी 2 वर्ष पूर्व शुरू —————————————- केजरीवाल ने देश में चुनाव की राजनीति से इतर अपना सारा फोकस दिल्ली पर कर एक मॉडल तैयार करने में लगे रहे। शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी और आम जनता के कल्याण के जितने भी काम हो सकते हैं उसकी खूब पब्लिसिटी शुरू की। गोपाल राय, संजय सिंह जैसे नेताओं को संगठन मजबूत करने के लिए भरपूर मेहनत करवाया। नतीजा यह रहा कि 2 सालों में संगठन को चाक-चौबंद कर दिया। वह हर घर को समझाने में कामयाब हुए कि केंद्र की तमाम अड़चनों के बावजूद इतने काम हुए।
 रिपोर्ट कार्ड और गारंटी कार्ड ————————————– अमेरिका की तर्ज पर दो चरणों में 13 टाउन हॉल मीटिंग कर जनता के सामने अपनी सरकार द्वारा 5 वर्षों में किए गए कार्यों का रिपोर्ट कार्ड पेश किया। यह प्रयास तुरुप का पत्ता साबित हुआ। फिर इसी मीटिंग में जनता के सवालों का जवाब भी दिया। आमतौर पर जनता के समक्ष अपने काम की बदौलत सीधा संवाद अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री नहीं करते लेकिन केजरीवाल ने परंपरागत लीक को तोड़ते हुए सीना ठोंककर जनता के समक्ष रिपोर्ट कार्ड पेश कर उनके सवालों के जवाब दिए। यह अंदाज जनता को भा गया। 
बाद में हजारों कार्यकर्ता 50 लाख से ऊपर 11 घरों में जाकर रिपोर्ट कार्ड सौंपा। इससे लोगों में भरोसा जगा और ऐसे ईमानदार राजनीति के कायल हो गए। पुनः विपक्षियों द्वारा जब यह आरोप लगा कि बिजली, पानी या बसों में महिलाओं का फ्री सफर केवल मार्च 2020 तक ही लागू रहेगा तब केजरीवाल को 10 कामों की गारंटी कार्ड लेकर आना पड़ा और आम जनता को भरोसा दिलाया कि यदि उनकी सरकार पुनः बनती है तो यह सारी सुविधाएं अगले 5 सालों तक जारी रहेंगी।
घोषणा पत्र के जरिए अगले 5 साल का विजन ——————————————– 10 कामों की गारंटी देने के बाद केजरीवाल 28 सूत्री घोषणा पत्र लेकर आते हैं जिसमें 21 वीं सदी के सपने को पूरा करने की बात होती है। दिल्ली को साफ सुथरा करने, घर-घर साफ जल मुहैया कराने, यमुना को साफ करने तथा महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों को घोषणा पत्र में शामिल किया गया।

दिल्ली के हर घर में कार्यकर्ता तैयार हुआ ——————————————– शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी और महिलाओं को बस यात्रा फ्री करने जैसी योजनाओं का सीधा लाभ प्रत्येक घर को मिला जिससे दिल्ली का हर घर लाभान्वित हुआ। खासतौर पर महिलाओं को यह बात समझ में आ गई कि केजरीवाल ने जो वादा किया उसे निभाया। बुजुर्गों की तीर्थ योजना जैसे लाभ देकर चर्चा के केंद्र में बने। बिना किसी जाति- धर्म या अमीर गरीब की राजनीति करते हुए केजरीवाल सरकार की योजनाओं का सीधा लाभ प्रत्येक छोटे-बड़े परिवार को मिला जिससे उनके कामों की चर्चा खुद लोग करने लगे और यह धारणा बनी कि केजरीवाल सरकार सभी का ख्याल रखती है। वह लोगों को यह समझाने में भी सफल रहे कि वह सत्ता में नहीं आए तो सब फ्री की योजना खत्म हो जाएगी।
  मीडिया घरानों की घेराबंदी : ———————————————एक तरफ भाजपा और कांग्रेस मीडिया में बड़े-बड़े विज्ञापन दे रही थी तो दूसरी ओर केजरीवाल टाउन हॉल की मीटिंग हो या फिर जनसभा या फिर स्टूडियो टॉक के जरिए सभी चैनलों को अलग- अलग लंबा इंटरव्यू दिया जिसका सीधा प्रसारण हुआ और दिल्ली की लाखों जनता ने इसे देखा और सुना। इससे उन्हें अपनी सरकार के किए गए काम को खुलकर रखने में सहूलियत हुई और जनता में एक सकारात्मक बदलाव आया। भाजपा द्वारा शाहीन बाग हिंदू-मुस्लिम मंदिर-मस्जिद जैसे मुद्दों के जरिए केजरीवाल को घेरने की कोशिश नाकाम हुई। सभी तीखे सवालों का मुस्कुराकर, संजीदगी, धैर्य और सौम्यता के साथ जवाब देने के इस बदलाव को लोगों ने पसंद किया।
   केजरीवाल की जीत के मायने ——————————————-केजरीवाल की इस प्रचंड जीत के कई मायने निकाले जा सकते हैं। हालांकि वह बार-बार कहते हैं कि हम छोटे लोग हैं,छोटी पार्टी है और दिल्ली छोड़ कर कहीं जाने का इरादा नहीं है। प्रधानमंत्री बनने की लालसा को भी खारिज करते हैं लेकिन फिर वह कहते हैं कि देश भर में राज्यों की विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला पार्टी लेगी। इस भोलेपन के कई मायने हैं और इस जीत से साफ संकेत निकलते हैं –(1.) राष्ट्रीय राजनीति में केजरीवाल की धमाकेदार एंट्री होगी और मजबूत नेता के रूप में उभरेंगे। (2.)काम और विकास की राजनीति की हवा चलेगी (3.) राष्ट्रीय राजनीति में लोग उन्हें सीरियसली लेंगे(4.) राजनीति नेगेटिव से पॉजिटिव दिशा में घूमेगी और लोग काम की राजनीति की चर्चा करेंगे (5.) केजरीवाल को 21वीं सदी के भारत बनाने की स्पष्ट सोच अन्य नेताओं से अलग करता है।(6.) 2024 के लोकसभा चुनाव में मोदी के खिलाफ कद्दावर नेता के रूप में उभरने की संभावना बनेगी।

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