राजस्थान के दलितों को अपनी रक्षा खुद ही करनी होगी !

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– भँवर मेघवंशी

नागौर जिले के करणू गांव में दो दलित युवाओं के साथ जिस तरह से क्रूर,निर्मम व भयानक अत्याचार किया गया है,उसको लेकर मुझे कुछ बातें कहनी है …………

1- मत भूलिये कि नागौर जिला लंबे समय से क्रूरतम दलित अत्याचारों में अग्रणी रहा है,दलितों के साथ वहाँ पर गंभीर अत्याचार हो रहे हैं,कभी एक जाति के लोग करते हैं तो कभी दूसरी जाति के,जिस जाति के अपराधी होते हैं,उस जाति के जनप्रतिनिधि और वो समाज अपराधियों की तरफ़दारी करता है और उसकी प्रतिद्वंद्वी दूसरी जाति इसकी खुलकर मुखालफत करती है, यह काफी समय से ट्रेंड बना हुआ है,पर कोई भी जाति अपनी समाज के आरोपियों के खिलाफ न्याय और इंसानियत के पक्ष में खड़ी नहीं होती है,यह बेहद दुखद स्थिति है,इससे यह नतीजा निकाला जा सकता है कि दलितों के हितैषी कोई भी नहीं है,न कथित सामंत और न ही कथित किसान ,दोनों को ही जब भी मौका मिलता है,वह अन्याय,अत्याचार, भेदभाव व उत्पीड़न में पीछे नहीं रहते हैं।

2-इस तरह के भयानक अत्याचारों की एक बड़ी वजह आरोपियों के समुदाय की शासन व प्रशासन में आवश्यकता से अधिक भागीदारी और फील्ड पोस्टिंग का होना भी है,कईं बार उस जिले के मुखर जनप्रतिनिधि और थानेदार के स्वजातीय होने मात्र से भी अपराधियों के हौंसले बढ़े हुए रहते हैं, इसके लिए सत्ता प्रतिष्ठान को ऐसे अत्याचार परक क्षेत्रों में बहुसंख्यक व अकसर दलित अत्याचारों में लिप्त रहने वाली जाति के अफसरों की फील्ड पोस्टिंग नहीं करनी चाहिये, यह मांग उठानी बहुत जरूरी है।

3-इस प्रकरण में यह भी देखा जा रहा है कि हर बार की तरह इस बार भी पीड़ित वर्ग ही कार्यवाही और इंसाफ की मांग उठा रहा है,जबकि आरोपियों के समुदाय के न्याय पसन्द लोग एकदम चुप्पी साध गये हैं,इस प्रकार खामोशी भयानक है,यह अन्याय को समर्थन का संकेत है और जातीय अपराधों को मूक सहमति है,इससे यह साफ हो रहा है कि कथित भाईचारे की बातें महज़ दिखावा भर है,जातिगत द्वेष अभी भी भयंकर रूप में व्याप्त है,यह सामाजिक सदभाव के लिये खतरनाक संकेत है,इससे माहौल और अधिक तनावपूर्ण होगा ,क्योंकि शांति,सदभाव और कथित भाईचारा बरकरार रखने की जिम्मेदारी सिर्फ पीड़ित वर्ग की नहीं है।

4-विभिन्न जाति दम्भ की बीमारी से ग्रस्त समाजों में मौब लिंचिंग की हत्यारी प्रवृति बढ़ती जा रही है,उनको अपनी इन आपराधिक धतकर्मों में दबंगई का अहसास होता है,उनमें कानून और व्यवस्था के प्रति अजीब सा हिकारत का भाव आ चुका है,ये लोग मनोरोगी हो चुके है,इनको इलाज़ की जरूरत है .

5-इस प्रकरण ने यह भी साबित कर दिया है कि आज भी एससी एसटी एट्रोसिटी जैसे सख्त कानूनों की जरूरत क्यों है ? आज संविधान व कानून होने के बावजूद यह हालात हैं तो सुरक्षात्मक कानून नहीं होने पर दलित आदिवासियों की क्या स्थिति हो सकती है ?

6-चोरी के शक में इस प्रकार की कबीलाई बर्बर सज़ा देने को कुछ असामाजिक तत्व किंतु परंतु के साथ जायज़ ठहराने की कोशिश कर रहे है,दरिंदगी करने वाले तत्वों की ओर से भी जवाबी एफआईआर दर्ज करवा दी गई है ताकि उसके ज़रिए दबाव बना कर पीड़ितों की न्याय की प्रत्याशा को कमजोर किया जा सके,उनको दबाव में लाया जा सके और अंततः पीड़ितों को राजीनामे के लिए मजबूर किया जा सके,पुलिस थाने और अदालतों में इस तरह के प्रयास बहुत आम बात है,इस प्रकरण में भी स्थानीय पुलिस आरोपियों के पक्ष में सबूत निर्माण में जुटी हुई प्रतीत होती है।जो कि बेहद शर्मनाक है और निंदनीय घटनाक्रम है,दोषी पुलिसकर्मियों के विरुद्ध भी कठोर कार्यवाही की जरूरत है।

7-बात बात में हिंदुओं को खतरे में बताने वाले,भारत,पाकिस्तान,बांग्लादेश और अफगानिस्तान तक के हिंदुओं की चिंता करने वाले हिंदुओं के किसी भी संगठन ने इस क्रूर पेचकश कांड को लेकर आंदोलन की चेतावनी नहीं दी है,जबकि यह जातिवादी सवर्ण हिंदुओं द्वारा इसी देश के अवर्ण हिंदुओं पर अत्याचार किया गया है,शायद इन दलित पीड़ितों के बजाय कोई गाय के पेचकश घोंप देता तो देश व्यापी आंदोलन खड़ा हो जाता,विश्व के हिंदुओं की परिषद और हुड़दंग करने वाले दल अब तक आग लगा देते ,पर यह कुकृत्य जानवरों के बजाय निम्न माने जाने वाले इंसानों पर किया गया,जिन्हें दक्षिणपंथी संगठन जानवरों से भी नीचे मानते हैं, हालांकि यह सब होने के बावजूद भी कईं दलित लोग अपने गलों में भगवे दुपट्टे ओढ़कर हिन्दू राष्ट्र के निर्माण में लगे रहेंगे,पर दलितों को इस तरह औकात बताने वाले प्रकरणों से सबक लेने की कोशिश जरूर करनी चाहिए।

8-अंतिम बात -सत्ता कोई भी आये यह सामाजिक आतंकवाद तब तक नहीं रुकेगा,जब तक कि उत्पीड़ित समुदाय संगठित होकर हर तरीक़े से पलटवार नहीं करेगा,जो जिस भाषा मे समझना चाहे और जिसे कम्फर्ट फील हो उसे उसी भाषा मे समझाना होगा,ताकि रोज रोज के इन अत्याचारों से मुक्ति मिले। सरकार भाजपा की हो अथवा कांग्रेस की कोई फर्क नहीं पड़ेगा,अत्याचार जारी है और आगे भी रहेंगे। 

प्रदेश की वर्तमान सरकार ने दलितों की पक्षधर होने का कोई सबूत अब तक नहीं दिया है,2 अप्रैल के मुकदमें बदस्तूर जारी है,उनको वापस लेने की सरकार की कोई मंशा नहीं है,सरकार और सत्ताधारी संगठन में दलितों आदिवासियों की कोई आवाज़ नहीं है,उनके बरसों से टेस्टेड व ट्रस्टेड पालतू किस्म के नेतागण प्रतिनिधित्व के नाम पर जगह घेरे हुए हैं ,जो कभी भी दलित अत्याचारों पर बात नहीं करते हैं और न ही करेंगे।

मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर फील्ड पोस्टिंग तक में दलित आदिवासी समुदाय के संवेदनशील अफसरों की भागीदारी नगण्य है,सुनवाई कार्यवाही का कोई मैकेनिज्म नहीं नजर आता है,इनके लिए बने आयोगों में नियुक्ति तक सरकार नहीं कर पा रही है,सत्ता प्रतिष्ठान के भीतर का अंतर्द्वंद ही इतना सघन है कि सब अपनी कुर्सी और नाक बचाने में लगे हैं,वे दलितों को क्या बचाएंगे ? 

इसलिए अब राजस्थान के वंचित वर्ग को अपने ही बलबूते और भरोसे, पराक्रम व सामर्थ्य से अपनी रक्षा करनी होगी,तभी वे बचेंगे वरना इस जातीय आतंकवाद का दावानल उनको लील जाएगा।

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