जम्मू कश्मीर के दलित शहीद : भगत अमरनाथ !

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( प्रवीण कुमार अवर्ण )

शहीद भगत अमरनाथ जी का जन्म, सन् 1928 बटोत के नजदीक, एक छोटे से गाँव चम्पा, तहसील और जिला रामबन में हुआ था. इनके पिताजी का नाम श्री मोती राम और माताजी का नाम श्रीमती जानकी देवी था. भगत अमरनाथ जी ने अपनी आठवीं तक की शिक्षा प्राप्त करने के बाद, एन ए सी (नोटीफाईड एरिया कमेटी,बटोत) में नौकरी करनी शुरू कर दी. अपनी नौकरी के साथ- साथ, भगत अमरनाथ जी ने सामाजिक कार्य भी जारी रखा और आर्थिक, सामाजिक , सांसकृतिक एवं राजनीतिक तौर पर पिछड़े हुए दलित समुदाय में जागरूकता लाने के प्रयास करते रहे. इसी दौरान उनका विवाह श्रीमती शान्ति देवी से सम्पन्न हुआ और इनके घर छ: संतानों ने जन्म लिया,जिसमें एक बेटा तथा पांच बेटीयाँ थीं, परन्तु भगत अमरनाथ जी अपने पारिवारिक जीवन, सरकारी नौकरी में व्यसत होते हुए भी सामाजिक कार्य को लगातार जारी रखे हुए थे .एक समय तक आते- आते भगत अमरनाथ जी, दलित समुदाय के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक हालातों से इतने विचलित हो गए कि उन्होंने सरकारी नौकरी को छोड़कर , दलित अधिकारों की लड़ाई को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया. 


जम्मू शहर का जीवन और उनका कार्य
भगत अमरनाथ जी ने नौकरी छोड़ने के बाद, जम्मू में आकर सामाजिक कार्य करना शुरू कर दिया . जम्मू में भगत अमरनाथ जी ने एक कमरा किराए पर लिया और वहाँ पर रहना शुरू कर दिया.यही कमरा उनका कार्यालय भी बन गया. बताते चलें कि भगत अमरनाथ जी का जन्म मेघ परिवार में हुआ था ,परन्तु, उन्होंने कभी भी जाति की राजनीति नहीं की, उन्होंने तो सारे शोषित, वंचित और पिड़ित दलित समाज की आवाज उठाई थी . जम्मू में रहते हुए भगत अमरनाथ जी ने “पसमांदगी” नाम की पत्रिका भी निकालनी शुरू की और इस पत्रिका के माध्यम से पिछड़े और वंचित समाज की समस्याओं को सामने लाने के प्रयास करते रहे. इसी दौरान भगत अमरनाथ जी और भी कई दलित नेताओं से मिलते रहे तथा दलित हालातों पर उनके साथ विचार विमर्श भी करते रहे . उस समय के मुख्य दलित नेता , जिनके साथ उनका मेल – जोल था, बाबू मिलखी राम, बाबू परमानन्द, भगत शज्जू  राम, महाशा नाहर सिंह, जगत राम आर्यन इत्यादि.


जम्मू कश्मीर में दलित आरक्षण की शुरुआत
जम्मू कश्मीर में दलित आंदोलन 1920 के दशक की शुरुआत से ही आकार लेने लग गया था . 1930 के दशक में मेघ मंडल समाज संगठन का निर्माण किया गया और यही संगठन आगे चलकर हरिजन मंडल के नाम से प्रचलित हुआ . इसी संगठन के नेतृत्व में सन् 1935 में महाशा नाहर सिंह, भगत शज्जू राम इत्यादि के सम्मिलित प्रयासों से 1 लाख से अधिक दलित कीरपींड – रत्तीयां मे इकट्ठा हुए थे . यहाँ सारा दलित समुदाय धर्म परिवर्तन के लिए इकट्ठा हुआ था, जो बाद में महाराजा हरि सिंह के आश्वासन के बाद रूक गया. बाद में  महाराजा हरि सिंह ने दलित उत्थान के लिए कुछ महत्वपूर्ण कार्य भी किए थे.


26 जनवरी 1950 को भारत में संविधान के लागू होते ही, दलित समुदाय को संवैधानिक अधिकार और आरक्षण जैसे प्रावधानों का लाभ मिलना शुरू हो गया था. परन्तु जम्मू कश्मीर में दलित समुदाय 1970 तक आरक्षण जैसे प्रावधानों से वंचित रहा है . जम्मू- कश्मीर में संवैधानिक अधिकारों और आरक्षण को लेकर सन् 1955 और सन् 1957 में दो बार भूख हड़ताल भी की गई थी| परन्तु सरकार द्वारा टाल- मटोल ही जारी रहा और दलित तथा पिछड़ा समाज अपने संवैधानिक अधिकारों और आरक्षण से लम्बे समय तक  वंचित ही रहा. इसी हालात में 21 मई 1970 को भगत अमरनाथ जी ने , कर्ण पार्क जम्मू में दलित अधिकारों को लेकर आमरण अनशन शुरू कर दिया .

एक बुजुर्ग साथी सुनाते हैं कि, “जब हम भगत साहब को मिलने कर्ण पार्क ,जम्मू पहुंचे तो भगत साहब आमरण अनशन पर बैठ चुके थे. हमने उनसे कहा कि अभी हमारा समाज तैयार नहीं है, आपको इतना कड़ा कदम उठाने से पहले थोड़ा वक्त और ले लेना चाहिए था ,परन्तु भगत साहब मजबूत इरादों वाले इंसान थे और वे आगे बढ़ने का मन बना चुके थे . भगत साहब ने उस वक्त,एक शेर दोहराया, चलन गे मेरे नाल, दुश्मन भी मेरे, जदूं मेरी अर्थी उठा के चलन गे,ओ बखरी ऐ गल की मुस्कुरा कर चलन गे ” और 1 जून 1970 को भगत अमरनाथ जी वंचित तथा पिछड़े समाज के लिए, दलित अधिकारों के लिए, अपने सामाजिक न्याय से प्रेरित विचारों के लिए शहीद हो गए .

भगत अमरनाथ जी की शहादत के बाद ही जम्मू कश्मीर में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़े हुए सामाजिक वर्गों को आरक्षण का लाभ मिलना शुरू हुआ . आज तक जम्मू कश्मीर में जितने भी लोगों ने आरक्षित सीटों से नौकरीयां ली, शिक्षा प्राप्त की या चुनाव लड़े हैं, यह सब शहीद भगत अमरनाथ जी की शहादत की बदौलत ही सम्भव हुआ है, परन्तु शहीद भगत अमरनाथ जी ने जो कारवां सामाजिक न्याय और दलित अधिकारों के लिए शुरू किया था वो कहीं पिछे ही छूट गया. लम्बे समय तक शहीद भगत अमरनाथ जी नाम तक नहीं लिया गया .यह जानबूझकर किया गया या लापरवाही से हुआ, परन्तु सच्चाई यही है कि भगत अमरनाथ का नाम तक विसार दिया गया था. आज से कुछ साल पहले ही भगत अमरनाथ जी का नाम और उनका कार्य लोगों के सामने आया है.

 
आज के परिप्रेक्ष्य में दलित आंदोलन
दलित आंदोलन जम्मू कश्मीर में बहुत ही निम्न स्तर पर है, सिवाय कुछ – कुछ दिन मनाने के दलित आंदोलन के नाम पर और कुछ नहीं हो रहा है. कोई सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगठन नहीं है जो दलित समुदाय को एकता के सूत्र में बांध सके. वास्तव में दलित समुदाय कई जातियों में बंटा हुआ है और हर दलित जाति सिर्फ अपनी जाति को मजबूत करने के और कुछ नहीं कर पा रही है. जब भी बात इकट्ठा होने की होती है तो सिर्फ राजनीतिक एकता की ही होती है. सामाजिक एवं सांस्कृतिक एकता के नाम पर बहुत कम प्रयास नजर  आते हैं. एक बात जो साफ तौर समझ लेनी चाहिए कि जब तक दलित समुदाय सामाजिक और सांस्कृतिक तौर पर एक नहीं हो जाता, राजनीतिक कामयाबी एक भ्रम के समान है. कुछ संगठन हैं जो ईमानदारी से दलित मुद्दों पर काम कर रहे हैं जैसे अम्बेडकर युवा संगठन ,परन्तु यह संगठन अभी शुरूआती दौर में है, इनको अभी लम्बा रास्ता तय करना है अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए.


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