कोरोना वायरस : दलित समाज के लिए घातक हो सकता है

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(डाॅ गुलाब चन्द जिन्दल ‘मेघ’ ) मैं बहुत चिंता में हूँ। जबसे कोरोना वायरस संक्रमण फैलने की जानकारी भारत में आने लगी है। और इस वैश्विक महामारी के खतरे और प्रसार से बचने के लिए विभिन्न उपाय किए जा रहे हैं। इनमें मंदिर, मस्जिद, चर्च, गिरिजाघर, गुरुद्वारों, धार्मिक पर्व मेलों आदि पर रोक लगा दी गई है। बस यही बात आगामी समय में मेरे दलित समाज के लोगों को सामाजिक द्वेषता के दंश से प्रभावित कर सकती है। इसका कारण कोई और नहीं हमारे  दलित समाज के कुछ उत्साहित युवक-युवती ही होंगे। यह चिंता मुझे हो रही है।
कोरोना महामारी से बचाव के लिए जब से यह जानकारी लगी कि इससे केवल चिकित्सा विशेषज्ञ, दवाइयां, वैज्ञानिक, स्वच्छता के साधन ही अपनी भूमिका निभा सकते हैं कोई दिव्य शक्ति (देवी-देवता आदि) हमारी सहायता नहीं कर सकती, तभी से हमारे उत्साही लोग सोशल मीडिया पर धड़ा-धड़ मनुवाद और कथित देवी देवताओं के खिलाफ अपनी पोस्ट डाल रहे हैं। इससे माहोल बहुत बिगड़ रहा है। 
इसका खामियाजा हमारे लोगों को ही भुगतना पड़ेगा। हमें यह समझ नहीं है कि मनुवाद, और देवी-देवताओं के खिलाफ पोस्ट कहाँ डालनी है, मनुवाद के खिलाफ किसको जागरूक करना है ? इस समझ का अभाव नज़र आ रहा है। कोरोना महामारी ने दलित समाज को मनुवाद के विरोध में जागरूक करने का सुअवसर दिया है। लेकिन हम इस अवसर का सही इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। 
हम हमारी मनुवाद के प्रति विचारधारा का प्रचार-प्रसार मनुवादी लोगों के सोशल मीडिया पर ही करने लगे हैं। आप जो बता रहे हो यह सब वो स्वयं अच्छी तरह समझते हैं। लेकिन यही सब मनुवादी व्यवस्थाएं पाखंड आदि उनके आर्थिक समृद्ध होने का साधन है और अपने समाज के लोग उसके माध्यम हैं। जब किसी के आर्थिक संसाधन पर कुठाराघात होगा तो तकलीफ तो होगी ही। हमें यह काम केवल हमारे समाज को जागरूक करने पर करना था। हम तो बल्कि मनुवादियों को और सशक्त बनने को आगाह कर रहे हैं। 
अरे मेरे साथियों इस तरह तो हम मनुवादियों से कभी भी टक्कर नहीं ले सकते।  उत्साही लोगों की वजह से ही हम स्वयं हमारे मानव जीवन दाता डाॅ अंबेडकर साहब की शान में गुस्ताखी कराने के कारक बनते हैं। आपको यह कहने की जरूरत कहाँ पड़ी कि -“देखो तुम्हारे देवी-देवता, मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारे, आदि कोरोना महामारी रोकने में असमर्थ हैं।”
सोचिए – यदि वो लोग अपने महापुरुषों डाॅ अंबेडकर साहब, तथागत बुद्ध आदि के प्रति गलत टिप्पणी करेंगे तो आपको कैसा लगेगा ? 
बस यही बात अपने लिए भी लागू होती है। उत्साही लोगों से आग्रह है कि कोरोना महामारी से मिले सुअवसर से अपने समाज के लोगों को जागरूक करो। मनुवादियों पर दिमाग लगाना बंद करो। अपने लोगों में जब समझ आ गई तो समझो आप सफल हो गये। वो तो वैसे भी आप लोगों को मंदिरों में नहीं बुलाते। 
अपना समाज यह तय कर लें कि हम मंदिरों में मनुवादी देवी-देवताओं की शरण में नहीं जायेंगे, साधु-सन्तों पुजारियों, को नगद दान दक्षिणा भेंट नहीं देंगे, पाखंड से दूर रहेंगे  तो फिर देखना क्या इफेक्ट आता है। जहाँ तक हो सके मनुवादियों के खिलाफ पोस्ट केवल अपने लोगों को जागरूक करने के लिए ही वाट्सएप पर पोस्ट करें, फेसबुक का इस्तेमाल नहीं करें। 
नीतिगत विजय के लिए ‘साम-दाम-दंड-भेद’ की नीति काम में लेनी पड़ती है। ‘दाम और दंड’ की नीति में हम मनुवादियों से टक्कर नहीं ले सकते। साथियों अपने लोगों को जागरूक करने का काम करो। मनुवादियों से बहस और मानसिक तनाव से हमें ही नुकसान होगा। 
क्या आप लोगों ने कभी सोचा कि ‘इस लंबे लाॅक डाउन का प्रभाव हमारे समाज पर क्या पड़ेगा ?”
ध्यान रखना जब भी कोरोना महामारी के प्रकोप से हम बाहर आयेंगे तब हमारे हजारों लोग इन मनुवादी आर्थिक सक्षम लोगों की शरण में ना चाहते हुए भी जाने के लिए बाध्य होंगे। हमारी इतनी हिम्मत नहीं होगी कि हम उनको रोक सकें। आर्थिक रूप से दबा व्यक्ति उसका ही निर्देश मानता है जिसने उसके पेट की आग पर ठंडे छींटे दिए थे।
 कोरोना महामारी हमारे अंबेडकर मिशन को भी कई कदम पीछे धकेल देगी। हमें इस पर भी विचार करना होगा। मनुवादियों से बहस ना करें अपने लोगों को जागरूक करें। यदि यह कर लिया तो मनुवादी तो आप लोगों के सामने हाथ जोड़े खड़े मिलेंगे।”ख़ुदी को तू कर बुलंद इतना कि  खुदा बंदे से पूछे बता तेरी रज़ा क्या है?”
-डाॅ गुलाब चन्द जिन्दल ‘मेघ’ (अजमेर)

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