जातिवाद जिंदा है बस तरीका बदला है।

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( रिछपाल ‘विद्रोही’ )

सामंतवाद को सियासत आज भी शह देती है।


कितनी कठपुतलियाँ पढ़ी ,उसकी संक्षिप्त समीक्षा लिखते हुये कुछ ये विचार दिमाग में आये .भले ही 21वीं सदी का दौर चल रहा होगा मगर आज भी सबके सब कठपुतलियां है.कोई सियासत की,कोई रियासत की, कोई धर्म की, कोई जाति की और कोई पार्टी की तो कोई पंथ-सम्प्रदाय की।कुल मिला के जुबां होके भी बेजुबां-बेजान है सारे इंसान।


भूख का कोई धर्म नहीं,कोई जाति नहीं और ना ही कोई पार्टी है, फिर भी इसके खिलाफ कोई नहीं बोलता-लिखता है।रोटी पर आज भी कोई चर्चा नहीं करता।हां,चर्चाएं चुनावों के वक्त जरुर थोड़ी-बहुत हो आती है और जिसका हमेशा की तरह ही नतीजा निकलता है।कथनी और करनी में अंतर आम बात सी बन गई है।


बेशक ये उपन्यास किसी एक व्यक्ति की दास्तां नहीं है बल्कि वंचित-शोषित-पीडित वर्ग का जीता-जागता सबूत है,जो ये पू्र्णतया साबित करता है कि देश भले ही डिजिटल क्यों ना हो गया हो, मगर भूखमरी और इसकी जननी (बेरोजगारी) हर गांव , हर शहर , हर गली में कोहराम दिनदहाडे मचा रही है। ऐसी स्थिति में भी सब कठपुतलियां बने बहुत खुश है.


सियासी हुकूमतें बदली मगर भुखमरी और बेरोजगारी का स्तर कभी ना बदला। बस कागजों में हम विश्वगुरु जरुर बने हुए है।प्रशासन तो सबसे बडी कठपुतली है और ये संविधान की सबसे ज्यादा तौहीन करता है.

जिस प्रकार ओमप्रकाश वाल्मीकि जी की ‘जूठन’ रचना भारतीय समाज की हकीकत साफ तौर पर जाहिर करती है, वैसे ही ये ‘कितनी कठपुतलियां’ नामक रचना भी ढोल बजा के कच्चा चिट्ठा खोलती है।

और अंत में,सचमुच जमीं से जुड़े हुए लोग ही नायक की पदवी पाने के हकदार है।ये रचना संघर्ष, स्वाभिमान, कुर्बानी,सफेदपोश लोगों की तानाशाही,अफसरशाही की लीपा-पोती और 21 वीं सदी के भारत की जीवंत व सम्पूर्ण कहानी है।सूचना का अधिकार ‘आम जन’ को दिलाने मे जी-जान     झोंकने वाले तमाम लोगों की तारीफ करना किसी के बस की बात नहीं है। आज यह अधिकार संविधान की रक्षा करने का अहम किरदार बन चुका है।लेखक भंवर मेघवंशी को तहे दिल से बधाइयां समर्पित करता हूँ.

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