थम नहीं रहे महिलाओं पर अत्याचार !

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( भंवर मेघवंशी )

सत्ताओं के बदलाव से उत्पीडित समुदायों में उमीदें जागती है ,उन्हें लगता है कि राज बदलने से उनके दिन फिर जायेंगे ,उनकी अर्जियां सुनी जाएगी ,उन पर कार्यवाही होगी ,उनके लिये न्याय का बंदोबस्त होगा ,लेकिन राज बदलने मात्र से स्थितियां नहीं बदलती ,न ही सुनवाई कार्यवाही होती और न ही सत्ता प्रतिष्ठान जवाबदेह बन पाता है ,इसका कारण यह रहता है कि राज तो बदलते हैं पर समाज वही रहता है ,सत्ता तंत्र पर वही गैर जवाबदेह नौकरशाही काबिज़ रहती है ,पुलिस प्रशासन का रवैया तनिक भी नहीं बदलता है ,वे उतने ही असंवेदनशील बने रहते है ,जैसे कि वे किसी भी सत्ता के दौर में बने रहने के आदी हो चुके होते हैं .

( तथ्यों के आईने में महिला उत्पीडन )

पुलिस विभाग राजस्थान द्वारा प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक राजस्थान की नई सरकार बनने के बाद जनवरी से अक्तूबर 2019 की समयावधि में राज्य में महिला उत्पीडन के कुल 36,050 प्रकरण दर्ज किये गये ,जिनमें दहेज़ मृत्यु के 395 मामले थे ,आत्महत्या के लिये दुष्प्रेरण के 171,दहेज़ उत्पीडन के 16,178 और बलात्कार के 5,194,छेड़छाड़ के 7,728 ,अपहरण के 5,190 व अन्य अभियोगों के 1194 मामले दर्ज किये गये .

इन मामलों में पुलिस कार्यवाही की स्थितियों पर गौर करें तो हम पायेंगे कि दहेज़ उत्पीडन के कुल 395 प्रकरणों में से महज़ 195 मामलों में चालान पेश किया ,जबकि 25 प्रतिशत मामलों को अदम वकु (झूठा ) बता कर फाईनल रिपोर्ट दे दी गई ,वहीँ 33 फीसदी मामलों को पेडिंग अनुसन्धान बता कर लटकाए रखा गया .आत्महत्या के लिये मजबूर करने के 171 मामलों में सिर्फ 79 का चालान दिया गया ,32 प्रतिशत मामलों को अदम वकु बताया गया और 31 फीसदी जेरे तफ्तीश रखे गये .सर्वाधिक मामले दहेज़ उत्पीडन की धारा 498a ले तहत दर्ज किये गये ,जिनमें 3608प्रकरणों में जाँच की जा रही है और 5602 प्रकरणों को झूठा बता कर एफआर लगा दी गई ,सिर्फ 6962 प्रकरणों में चालान प्रस्तुत कर पुलिस अपनी पीठ ठोक रही है .

हालात इतने गंभीर है कि बलात्कार जैसे संगीन अपराधों के मामलों में भी पुलिस की संवेदनहीनता जस की तस रहती है ,अव्वल तो बलात्कार और सामूहिक बलात्कार के मामलों को दर्ज करने के बजाय उन पर पर्दा डालने की हरसंभव कोशिस की जाती है ,दबाव ,राजीनामा ,प्रलोभन और जान बुझकर प्रकरण दर्ज करने में देरी की जाती है ,पीड़िताओं को धमकाया जाता है ,कईं दिनों तक मेडिकल नहीं कराया जाता है ,164 के बयानों में देरी करवाई जाती है ,जिससे कि बलात्कार पीड़िताओं की न्याय की प्रत्याशा दम तोड़ने लगती है .

इस वर्ष में राज्य में बलात्कार के कुल 5194 मामले दर्ज हुये ,जिनमें से 1664 मामलों में अंतिम प्रतिवेदन दे दिया गया ,1354 मामलों में अनुसन्धान को पेंडिंग रखा गया और महज 2176 प्रकरणों में चालान पेश किया गया ,इसी तरह छेड़छाड़ जैसे गंभीर यौन अपराध के दर्ज 7728 मामलों में आधे से भी कम ( 3711) मामलों में ही चार्जशीट दाखिल की गई ,जबकि 2559 मामलों को अदम वकु झूठा बता कर एफआर पेश कर दी गई और 1458 प्रकारणों को जेरे तफ्तीश रखा गया .पुलिस की यही असंवेदनशीलता अपहरण के प्रकरणों में भी साफ परिलक्षित होतो है ,जहाँ कुल दर्ज 5190 मामलों में 2700 मामलों को अदम वकु बता कर अंतिम प्रतिवेदन प्रस्तुत कर दिया गया और सिर्फ 1211 मामलों में चालान पेश किया गया ,1279 मामले अनुसन्धान में लंबित बताये गये .इसी तरह अन्य धाराओं में दर्ज महिला उत्पीडन के अन्य 1194 दर्ज मामलों में से 407 को झूठा बता कर एफआर लगा दी गई ,300 मुकदमों में जाँच जारी रहना बताया गया और मात्र 487 मामलों में चालान डे कर कर्तव्यों की इतिश्री कर ली गई .

कुल मिलकर इस आलोच्य वर्ष के महज 8 महीनों में दर्ज 36 हजार 50 मामलों में 13 हजार 43 मामलों को अदम वकु श्रेणी में डालते हुये झूठा साबित किया गया और सिर्फ 14 हजार 821 मुकदमों में ही चालान पेश किये गये ,8 हजार 186 मामलों में कछुआ गति से जाँच का जारी रहना जाहिर किया गया है ,इस तरह हम देख सकते है कि पेंडिंग प्रतिशत 22.71 है और अदम वकु झूठा साबित करने का प्रतिशत 46.63 है ,जो कि अत्यंत चिंताजनक है ,हालाँकि पुलिस का कहना है कि उनका चालानी प्रतिशत 99.67 परसेंट है !

 विगत तीन वर्षों में दर्ज मामलों को तुलनात्मक रूप से देखें तो महिला अत्याचार प्रकरणों में अप्रत्याशित वृद्धि दृष्टिगोचर होती है ,वर्ष 2017 में कुल 22 ,591 मामले दर्ज हुये ,जो अगले वर्ष 2018 में थोड़ी वृद्धि के साथ 23,280 हुये ,लेकिन 2019 में यह संख्या काफी बढ़ जाती है और दर्ज मामलों की संख्या 36050 हो जाती है ,इस वृद्धि को देखा जाये तो 2017 से 19 के मध्य इसे 59.58 प्रतिशत की बढ़ोतरी माना जा सकता है .

इस अप्रत्याशित वृद्धि के पीछे की वजह बताते हुये राज्य के मुखिया अशोक गहलोत का कहना है कि पहले के वर्षों में पिछली सरकार ने दलितों व महिलाओं पर होने वाले अत्याचार के मामलों को दर्ज न करने की अघोषित नीति अपना रखी थी,ताकि आंकड़ों में अपराधों में वृद्धि न दिखे ,जबकि हमारी सरकार पूरी तरह से संवेदनशील है ,हम हर प्रकरण दर्ज कर रहे हैं ,यहाँ तक कि पुलिस अधीक्षक कार्यालय में सीधे एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिये गये है ,इसलिए यह मानना सही नहीं होगा कि महिला अत्याचार प्रकरणों में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है ,जबकि सच्चाई यह है कि हमने प्रकरणों को गंभीरता से लिया है और हर मामला दर्ज करने का आदेश दिया है .

 राज्य में दलित आदिवासी महिलाओं की स्थिति पर भी गौर किया जाना है ,थानागाजी गैंग रेप के बाद हाशिये के समुदायों की महिलाओं के साथ यौन हिंसा के विमर्श ने जोर पकड़ लिया है ,थानागाजी प्रकरण को जिस तरह पहले तो दबाया गया और बाद में वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस ,प्रशासन व राज्य सरकार ने जो फुर्ती दिखाई और कार्यवाही की वह काबिले गौर है ,पर हर प्रकरण उस तरह से न तो मिडिया में आ पाता है और न ही दलित नेता व संगठन वहां तक पहुंच पाते है ,नतीजा यह होता है कि थानागाजी जितनी ही क्रूर यौन हिंसा की घटनाएँ अपने सामान्य नतीजे तक भी नहीं पहुँच पाती है ,यह विगत सरकार में भी हो रहा था और इस सरकार में भी जारी है .

अगर हम दलित महिलाओं के साथ हुये बलात्कार के मामलों को ही लें तो वर्ष 2017 में 265 मामले दर्ज हुये ,जबकि 2018 में 331 और 2019 में 477प्रकरण दर्ज किये गये .जबकि आदिवासी महिलाओं के साथ 2017 में बलात्कार के 52 ,वर्ष 2018 में 71 और 2019 में 82 मामले दर्ज हुये .इन 2019 में दर्ज 82 प्रकरणों की स्थिति यह है कि 29 मामलों में एफआर लगा दी गई ,18 में जाँच जारी है और मात्र 35 प्रकरणों में चालान पेश किया गया .इसी तरह दलित महिलाओं के साथ बलात्कार के वर्ष 2019 में दर्ज 477 मामलों में भी आधे से भी कम ,मात्र 202 मामलों में ही चालान किया गया ,127 प्रकरण अनुसन्धान में अटके हुये है और 148 मामलों को अदम वकु झूठा बता कर उनका अंतिम प्रतिवेदन न्यायालय में प्रस्तुत कर दिया गया है .

दलित महिलाओं के साथ अपहरण ,छेड़छाड़ ,बलात्कार और सामूहिक बलात्कार की गंभीर घटनाओं में निरंतर वृद्धि हो रही है ,इसके अलावा उनके साथ छुआछुत ,जातिगत अपमान और डायन प्रताड़ना और घरेलु हिंसा की वारदातें भी बढ़ रही है ,जो चिंताजनक है .

हालाँकि वर्तमान सरकार ने सभी समुदायों की महिलाओं के साथ बढ़ रही हिंसा और यौन दुर्व्यवहार को लेकर कई कड़े कदम उठाये हैं ,अब मुकदमें आसानी से दर्ज हो पा रहे हैं ,लेकिन अनुसन्धान अधिकारियों का संबंधित कानूनों की जानकारी न होना ,समुचित प्रशिक्षण का अभाव ,निष्पक्ष जाँच न होना और सरकारी तंत्र का संवेदनशील न होना भी महिला अत्याचार प्रकरणों में न्याय प्राप्ति में बाधक बना हुआ है .

महिला थानों और प्रत्येक थाने में महिला डेस्क और सिविल सोसायटी के सलाह केंद्र आदि भी कार्यरत है ,लेकिन जिस परिमाण में घटनाएँ बढ़ रही है ,उनके हिसाब से वर्तमान व्यवस्थाएं नाकाफी साबित होती जा रही है ,सरकार को महिला व कमजोर वर्ग के साथ घट रही अत्याचार की घटनाओं की रोकथाम के लिये नये मेकेनिज्म बनाने की जरुरत है ,आज की स्थिति में जो लोग कानून व्यवस्था को संभाल रहे है ,उनके पास जेंडर संवेदना और जस्टिस की समझ उतनी नहीं है ,जितनी इस तरह के संवेदनशील मामलों में होनी चाहिये.

राजस्थान का समाज सामंती रहा है ,जिसमें पितृसत्ता कूट कूट कर भरी हुई है ,यहाँ स्त्री को जबरन सती कर देने और उसके यौन शोषण को पुरुष की मर्दानगी के साथ जोड़कर देखने का रिवाज सदियों से रहा है ,विभिन्न समुदायों में महिलाओं के लिये अलग अलग तरह की बंदिशें है ,घुंघट को यहाँ इज्जत का प्रतीक बना कर ग्लेमराईज करने का काम जारी है,पुरुष अभी तक महिलाओं से दुर्व्यवहार करने और अपने चेहरे पर रौबदार मूंछें रखकर उनको मरोड़ने में ही अपनी शान समझे हुये है ,अभी भी अंतरजातीय विवाह बहुत कठिन टास्क है और महिला मुक्ति के संग्राम को अपनी मंजिल तक पहुँचने के कईं सोपान तय करने हैं ,पर सबसे पहले जुल्मों सितम से आज़ादी की लडाई मुक्कमल अंजाम तक ले जाना जरुरी है ,जिसमें नागरिक समाज ,सत्ता प्रतिष्ठान और नौकरशाही को जवाबदेह बनाना जरुरी है .

( लेखक शून्यकाल डॉटकॉम के सम्पादक है )        

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