अरुणा पार्टी के संघर्षों का जीवंत दस्तावेज़ है – कितनी कठपुतलियाँ

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– शालिनी शालू ‘नज़ीर’  

यह पुस्तक कोरी कल्पनाओं का आधार मात्र न होकर शंकर सिंह के व्यक्तिगत जीवन और मजदूर किसान शक्ति संगठन के कार्यकर्ता के रूप आई सभी छोटी बड़ी घटनाओं का वास्तविक वर्णन है।
 इस पुस्तक के माध्यम से समाज और कानून का कोरा चिटठा प्रस्तुत किया गया है जिसे पुस्तक के मुख्य पात्र शंकर सिंह जो कठपुतलीयों के लिए भी जाने जाते हैं उन्होने सामाजिक विवशताओं और प्रशासन की चोरी और मुँहजोरी की व्यवस्थाओं को समय और उम्र की ठोकरों पर चलकर जिया और महसूस किया है। 

इस पुस्तक को शंकर सिंह की जीवनी के रूप में देखा जा सकता है। जिसमें उनका भरपूर साथ दिया भूतपूर्व शिक्षिका एवं आईएएस अरूणा राय ने ,जो कि वर्तमान में मज़दूर किसान शक्ति संगठन व स्कूल फ़ॉर डेमोक्रेसी से जुड़ी हुई है। इसी सफर में साथी बने निखिल डे और पत्नी अंछी बाई। जिनके सहयोग से गाँव गाँव जाकर सामाजिक उत्थान के कार्य सम्पन्न किए जा सके ।

शंकर सिंह की समाजकर्म की यह विशेषता ही कही जाएगी की वे गरीबों का दर्द देखकर केवल सहानुभूति नही दिखाते बल्कि समानानुभूति के स्तर पर जाकर समस्या के समाधान के लिए जुड़ जाते हैं। 
शंकर सिंह हालातो को सुधारने का ही कार्य नहीं करते बल्कि हालातों को बिगड़ने से भी पहले संभाल लेने की क्षमता रखते हैं इस संदर्भ में एक किस्सा उनका जातिवाद को लेकर भी देखा जा सकता है जब “रामलाल भाट को खाना परोसा जाता है तब वह बिना पूछे कहता है -‘मैं तो नट हूँ ‘ तभी शंकर सिंह स्थिति बिगड़ने की आशंका से कहते है -‘कैसे नटेगा तू, सुबह भी नट गया था, अब भी नट रहा है। ‘
 चूंकि वे भलीभांति गांवों में फैली जातिगत भेदभाव की नीति से अवगत थे ।इसलिए शंकर सिंह के जीवन में घटी घटनाओं में स्वविवेक से स्थितियों को संभालने की भाषायी कुशलता देखी जा सकती है ।
इनकी जीवनी में कठपुतलीयों की अहम भूमिका रही है। चाहे वे सजीव प्राणी न हो लेकिन सजीव और भ्रष्ट लोगों का नकाब उतारने में कामयाब रही है । जिसे लेकर शेक्सपियर की तर्ज पर गीत भी गाया गया है ‘ ये दुनिया है रंगमंच, हम इसकी कठपुतलीयां ।’ लेकिन वे मुखौटा उतार कर भी कठपुतलीयां ही रही परंतु इंसान सिर्फ इंसान नहीं थे एक मुखौटा उतारते तो दूसरा मुखौटा चढा़ लेते। 
पूर्व में गरीब और विवश जनता अंग्रेजों के कानून गुप्त बात अधिनियम -1923 की शिकार होती रही  जो आजादी और समय परिवर्तन के बाद भी परिस्थतियों के बदलने का इंतजार कर रही है। लेकिन प्रशासन का लिबास  पहनकर घूसखोरी करने वाले  समाजकंटक गरीब का गेहूँ और तन का कपड़ा भी छीन लेना चाहते हैं जिन्होनें कागजों के माध्यम से ‘नया पुराना ‘ खेल की चौसर जमा रखी है जहाँ न तो नया हिसाब आता है और न जाता है बल्कि पुराना हिसाब ही नया होता रहता है। 

प्रशासन के कथनी और करनी की भिन्नता के कारण ही अमीर व्यक्ति और अधिक अमीर होता जाता है और गरीब व्यक्ति गरीबी की मार झेलता और अन्न के लिए तरसता हुआ मर जाता है ।इसी के एक उदाहरण के रूप में शंकर सिंह ने ‘न्यूनतम मजदूरी ‘ जनसंघर्ष की घटना पर प्रकाश डाला है। जिसके घटनाक्रम से पता चलता है कि प्रशासन के व्यक्ति जमीन पर घपला न करके कागजों में घपला करते हैं जिसके चलते ‘सूचना के अधिकार ‘की लड़ाई लड़ी गई। 
अनेको संघर्षों के बाद राजस्थान सूचना का अधिकार विधेयक-2000 विधानसभा में पारित कर दिया गया। और 12 अक्टूबर 2005 वह ऐतिहासिक दिन साबित हुआ जब ‘राइट टू इनफाॅरमेशन ‘का कानून पूरे भारत में लागू किया गया। 


इस पुस्तक के माध्यम से विभिन्न घटनाओं के साथ विभिन्न सरकारी योजनाओं का भी वर्णन किया गया है जो कि अरुणा पार्टी के संघर्षों के कारण गरीब अनपढ़ जनता लाभान्वित हो पाई। तथा सरकारी रसूखदारों के हवाले से हडपी जा रही योजनाएं गरीबों तक पहुँच पाई। जिसके लिए आगे भी सरकारी गुंडों से उनका युद्ध संघर्ष जारी है। 

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