हमारे समय की एक उल्लेखनीय और महत्वपूर्ण आत्मकथा

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( ‘मैं एक कारसेवक था’ पर वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश की टिप्पणी )

मैं एक कारसेवक था- भंवर मेघवंशी की सिर्फ आत्मकथा नहीं है, हमारे समय का एक बेहद महत्वूर्ण दस्वावेज भी है। हमारे यहां, खासतौर पर हिन्दी में लिखी आत्मकथाओं में बहुतेरे लोग अक्सर अपनी जिन्दगी, कुछ घटनाओं और उसके विभिन्न पात्रों से जुड़े ब्यौरे लिख मारते हैं-एक तरह की जीवनकथा। इनमें कुछ  बहुत उबाऊ होती हैं तो कुछ रोचक भी! पर इससे उन्हें आत्मकथा होने का दर्जा नहीं मिल जाता। अपने यहां या दुनिया के अन्य देशों में महान् आत्मकथा उसे माना जाता है जो व्यक्ति-विशेष के जरिय़े अपने समय और समाज की महत्वपूर्ण या दूरगामी असर छोड़नी वाली घटनाओं को मानवीय दृष्टि से पुनर्सृजित करे और समाज के लिए कोई जरूरी संदेश भी दे। इस दृष्टि से सुप्रसिद्ध लेखक और बहुजन-कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी की आत्मकथा ‘मैं एक कारसेवक था’ हिन्दी में हाल के कुछ वर्षों में लिखी श्रेष्ठतम आत्मकथाओं में एक है।


अपनी किशोरावस्था में ही भंवर मेघवंशी संघी बन गए थे। उन दिनों समूचे उत्तर, मध्य और पश्चिम भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिन्दू परिषद आदि द्वारा संचालित रामजन्म भूमि अभियान की धूम मची हुई थी। उसका तात्कालिक मकसद तो था-अयोध्या में सदियों पुरानी एक मस्जिद को ढहाना और उस ध्वंस-स्थल पर एक भव्य राम मंदिर बनवाना लेकिन इस अभियान के जरिये आरएसएस-भाजपा आदि का वास्तविक लक्ष्य था-अखिल भारतीय स्तर पर ‘हिन्दू-गोलबंदी’ करके भारतीय समाज और राष्ट्रराज्य की बड़ी राजनीतिक-शक्ति बनना और फिर राजसत्ता पर काबिज होना। इससे पहले संघ और उसके तत्कालीन प्रमुख राजनीतिक प्लेटफार्म-जनसंघ (भारतीय जनता पार्टी के पूर्व-रूप) ने सन् 1977-79 के दौरान सत्ता में होने का मतलब और महत्व अच्छी तरह जान लिया था।


 इस आत्मकथा का सबसे अहम् पहलू है-एक प्रशिक्षित स्वयंसेवक का देश को ‘परम वैभव’ की तरफ ले जाने का दावा करने वाले आरएसएस की कथित सांस्कृतिक सोच और जहरीले राजनीतिक मंसूबों की पर्त-दर-पर्त असलियत खोलना। आरएसएस की संपूर्ण वैचारिकी हो या संघ-भाजपा की अयोध्या-राजनीति हो-इन दोनों विषयों पर हिन्दी-अंग्रेजी में बहुत सारी किताबें लिखी गई हैं। उनमें कुछ बहुत अच्छी और शोधपरक हैं। लेकिन भंवर मेघवंशी की यह किताब उन सबमें इसलिए विशिष्ट है कि यह ‘घर के आदमी’ की कलम से लिखी  घर की अनकही-कहानी है।
 

पुस्तक में कही बातों या चित्रित प्रसंगों की प्रामाणिकता साबित करने के लिए यहां किसी दूसरे स्रोत या किसी की लिखी शोधपरक किताब के किसी अंश को उद्धृत करने की जरूरत ही नहीं है। संघ के सांगठनिक नेटवर्क और घोषित-अघोषित कारनामों का अभिन्न हिस्सा रहे कार्यवाह स्तर के एक प्रशिक्षित संघी का यह ऐसा आत्मकथ्य है, जिसमें धर्म, वर्ण, समाज और इतिहास के अनेक बड़े सवालों के बरक्स हिन्दुत्वादी संघी-राजनीति का सच खुलकर सामने आता है। किताब के ज्यादातर अध्यायों में दो-तीन पृष्ठों की डायरी-नुमा टिप्पणियां, आब्जर्वेशन या स्मृतियां हैं। डायरी-लेखन शैली की इन्हीं छोटी-छोटी टिप्पणियों में भंवर मेघवंशी बहुत बड़ी-बड़ी बातें कहते जाते हैं, संघ-राजनीति के सच के बहुत सारे भेद खोलते जाते हैं। 


एक उदाहरण देखिएः किताब में डेढ़ पेज की एक टिप्पणी है-‘प्रचारक चाहिए विचारक नहीं!’ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में उसके प्रचारक ही संगठन की रीढ़ कहे जाते हैं। ये पूर्णकालिक कार्यकर्ता होते हैं। शीर्ष नेतृत्व के एजेंडे को वे ही समाज और लोगों के बीच ले जाते हैं और उसे लागू कराते हैं। फिर शीर्ष नेतृत्व तक उन्हीं के जरिये लोगों के हर रूझान की जानकारी पहुंचती है। भंवर ने संघ में कई वर्षों के कामकाज के बाद एक दिन अपने जिला प्रचारक महोदय के सामने प्रस्ताव रखा कि अब वह भी संघ प्रचारक बनने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। इस पर जिला प्रचारक ने जो जवाब दिया, वह संघ की ‘हिन्दुत्व-राजनीति’ की जघन्य वर्णवादी असलियत की पोल खोलकर रख देता हैः बंधु आपके विचार तो बहुत सुंदर हैं। लेकिन दृष्टि समग्र नहीं है। 


आज उत्साह में हो तो प्रचारक बनना चाहते हो लेकिन हमारा समाज काफी विषम है। कल कोई आपसे नाम पूछेगा, गांव पूछेगा और अंततः समाज(जाति) पूछेगा और अगर उन्हें पता चलेगा कि ये प्रचारक जी तो वंचित समुदाय से आए हैं तो उनका व्यवहार बदल सकता है। तब अपमान का घूंट भी पीना पड़ेगा। मुझे मालूम है। आप यह सह नहीं पाओगे। दुखी हो जाओगे, प्रतिक्रिया करने लगोगे। वाद-विवाद होगा। इससे संघ का काम बढ़ने की बजाय कमजोर हो जाएगा। इसलिए मेरा सुझाव है कि आप प्रचारक नहीं, विस्तारक बनकर थोड़ा समय राष्ट्र-सेवा में लगाओ।’(पृष्ठ-54) संघ के एक पदाधिकारी की इस टिप्पणी पर कुछ और कहने की जरूरत नहीं है। इससे संघ की सामाजिक-राजनीतिक दृष्टि ही नहीं उजागर होती है, यह भी साफ होता है कि किस तरह आरएसएस अपने संगठन में हर स्तर पर हमारे समाज के बहुजन को हिस्सेदारी से वंचित करने के लिए अपने हर गेट पर कड़ी पहरेदारी रखता है और कुछ उच्च वर्णों का ही संपूर्ण वर्चस्व बनाए रखता है।


 यह महज संयोग नहीं कि संघ की शीर्ष समिति में आज भी एक-दो उच्च हिन्दू-वर्णों के ही लोग जगह पाते हैं।   इस किताब पर यह संक्षिप्त टिप्पणी लिखते हुए मुझे बरसों पहले छपी एक अन्य महत्वपूर्ण किताब की याद आ रही है। वह है-डी आर गोयल की किताब-राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ। गोयल साहब भी लंबे समय तक आरएसएस में रहे और उससे बुरी तरह निऱाश और क्षुब्ध होकर जब बाहर आए तो यह किताब लिखी थी। लेकिन वह न तो आत्मकथा है और न ही उसमें संघ की आंतरिक सांगठनिक क्रिया-प्रक्रिया की ऐसी पड़ताल है।

मूलतः उसमें संघ की सैद्धांतिकता-वैचारिकता का तथ्यों की रोशनी में महत्वपूर्ण विवेचन है। लेकिन अपने दौर की उस चर्चित किताब से कई मामलों में भंवर मेघवंशी की आत्मकथा अलग ढंग की कृति है। लेखक संघ में रहते हुए सवाल करना शुरू करता है। अपने संघी जीवन के कुछ वर्षों के अंदर ही जब उसे संगठन, उसकी गतिविधियों या उसके नेतृत्वकारी लोगों में काफी कुछ अटपटा, अमानवीय और विद्रूप दिखता है तो वह न सिर्फ उस पर सवाल उठाता है अपितु विरोध करना भी शुरू कर देता है। अंदर रहकर वह कुछ समय लगातार जूझता रहता है। यह संघर्ष सिर्फ बाहर नहीं चलता है, वह लेखक के अंदर भी जारी रहता है। 


संगठन से संघर्ष और आत्मसंघर्ष के दौरान आरएसएस को लेकर उसकी समझ और उसके अनुभव का विस्तार होता है-मात्रात्मक और गुणात्मक दोनों स्तर पर। यही पहलू भंवर मेघवंशी की आत्मकथा का सबसे महत्वपूर्ण और अनोखा पहलू है, जो संभवतः और कहीं नहीं मिलेगा। अब यह सवाल तो भंवर मेघवंशी जैसा एक सुसंगत सोच का लेखक-पत्रकार और दलित-बहुजन कार्यकर्ता ही कर सकता है-‘जब मेहतर समाज के कथित आदि पुरुष वाल्मीकि ऋषि के हाथ में रामायण रचने वाली कलम थी तो आज तक उनके वंशजों के हाथ में झाडू और सिर पर कचरे की टोकरी क्यों है ? पर संघी दुष्प्रचार के सामने कौन टिक सकता है? तमाम दलित जातियों को यह समझाने के प्रयास हो रहे हैं कि तुम्हारी इस दुर्दशा के लिए मुगल, यवन, पठान (मुसलमान) जिम्मेदार हैं क्योंकि उनके आने से पहले भारत में जाति तो थी मगर जातिगत भेदभाव नहीं था। सारे गंदे काम मुस्लिम शासकों की देन हैं, जिसकी वजह से समाज में दलितों का स्थान घृणित हो गया। मतलब यह कि हिन्दू समाज की वर्ण-व्यवस्था और जाति-व्यवस्था उनके द्वारा विगत पांच हजार साल से किया जा रहा शोषण और गुलाम बनाकर रखने की मनुवादी ब्राह्मणवादी अमानुषी व्यवस्था का दोष जातिवादी हिन्दुओं पर नहीं है। सभी दलितों को यह बता दिया गया है कि उनके पूर्वज बहुत ही महान् क्षत्रिय योद्धा थे, जी भरकर लड़े, जब हार गए तो मुगलों ने, यवनों ने उन्हें गुलाम बना लिया।’(पृष्ठ162)


संघ पर भंवर मेघवंशी के सवाल महज किसी बहसबाजी या सैद्धांतिक-जुगाली वाले नहीं हैं। वे ठोस और जमीनी हैं।  असलियत और आम लोगों के सरोकारों से भरे हुए हैं। आखिर संघ का ‘हिन्दुत्व’ क्या है, किसके लिए है, भारत के बारे में उसका क्या स्वप्न है, क्या संघ की विचारधारा और राजनीति से भारत का भला होगा? संघ और उसके आनुषंगिक संगठनों की राजनीति बेइंतहा नफरत, साजिश, छल-प्रपंच और विभाजनकारी सोच से इस कदर लबालब क्यों है ? 


भंवर मेघवंशी की आत्मकथा ‘मैं एक कारसेवक था’ महज सवाल नहीं करती, संघ-राजनीति से जुड़े ऐसे तमाम सवालों का ठोस तथ्यों पर आधारित भरोसेमंद जवाब भी देती है। किताब की यही बात उसे हमारे समय की एक उल्लेखनीय और महत्वपूर्ण आत्मकथा बनाती है।

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