इस उपन्यास पर फिल्म बननी चाहिए

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भंवर मेघवंशी का हाल ही में प्रकशित हुआ उपन्यास “कितनी कठपुतलियां” अपने आपमें एक मिसाल है, जिसमें उन्होंने जीती जागती घटनाओ का बखूबी चित्रण किया है. जिसे अपनी  नज़रों से देखा और महसूस किया।


यह उपन्यास सामाजिक कार्यकर्ता और रंगकर्मी शंकर सिंह रावत के जीवन संघर्ष से लेकर मजदूर किसान शक्ति संगठन का कार्यों का वर्णन करता है। लोगों को संगठित करना, उस संगठन के माध्यम से लोगो की भूख, तकलीफ को महसूस करते हुए उनके हल खोजना, लोगो को उनके अधिकार दिलवाना, चाहे फिर वो मजदूरो के लिए न्यूनतम मजदूरी हो या फिर गरीबों का राशन या उनकी पेंशन, इसी घटनाक्रम में उन्होंने देखा कि विकास केवल सरकारी कागजों में ही है और हकीकत में कुछ भी नहीं, जिसके लिए उन्होंने संघर्ष किया और भारत को सूचना का अधिकार अधिनियम दिलवाया।


“दुनिया एक रंगमंच है और हम इसकी कठपुतलियां” गाती कठपुतलियों ने भी एक अहम किरदार निभाया है। कठपुतलियां शंकर सिंह के झोले से सब कुछ देखती और सुनती, आपस में बातें भी करती, फिर जो देखा सुना उसका विश्लेषण करती है जैसे कि -” हम कठपुतलियां एक हैं पर इन्सान जातियों में बँटे हुए हैं, या फिर कठपुतलियों और इन्सानो दोनोे के पास पेट हैं, पर उसमें इन्सानो को भूख है और कठपुतलियों को नहीं।”

इन कठपुतलियों ने लोगो को अपने गीतों के जरिए काफी सारे पैगाम दिये, इतना ही नहीं भ्रष्टाचारियों के नकाब को भी उतारने में कामयाबी हासिल की। लेखक भंवर मेघवंशी ने इस उपन्यास को इतनी खूबसूरती से प्रस्तुत किया है कि यूँ लगता है जैसे सारी घटनायें, सारे वाकिये हमारी आँखों के सामने घटित हो रहें हैं।यह इतना जीवंत उपन्यास है कि इस पर एक फिल्म बनाई जा सकती है ।


शंकरं सिंह रावत जैसे व्यक्तित्व से परिचय कराने के लिये भंवर मेघवंशी का बहुत बहुत शुक्रिया और आभार। कितनी कठपुतलियां के लिये हर्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।


-डाॅ सोनिका बोधि, सुमेध बोधि ,डॉ शरद बडोले

( भिलाई छत्तीसगढ़ )

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