आधुनिक युग बहुजन लेखिका मुक्ता साल्वे !

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( पवन बौद्ध )
भारतीय संस्कृति में साहित्य सर्जन एवं शिक्षा का मौलिक अधिकार सभी वर्ग के महिला पुरुषों को है परंतु आजादी से पूर्व बहुजन, पिछड़ों, शोषित, वंचितओं को शिक्षा के अधिकार से पीढ़ियों दर पीढ़ी तक वंचित रखा गया।  महिला वर्ग के लिए शिक्षा का कोई प्रावधान नहीं रहा जोकि पुरुष प्रधान समाज होने का वर्चस्व दावा दिखाता है परंतु  18 वीं सदी के शुरुआत में राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले एवं प्रथम शिक्षिका माता सावित्रीबाई फुले के द्वारा शिक्षा को आम जन तक पहुंचाने का कार्य किया गया।

वर्ण व्यवस्था के अनुसार शिक्षा का कार्य ब्राह्मणों द्वारा प्रतिपादित किया जाता था और शूद्रों को धन संचय, शिक्षा पर पूर्णतया प्रतिबंधित कर रखा था, महाराष्ट्र में क्रांतिकारी आंदोलनकारी  एवं समाज सुधारक लहूजी साल्वे की पुत्री मुक्ता साल्वे का जन्म 25 दिसंबर 1841 महाराष्ट्र में हुआ। मांग-महार के अधिकारों की बात करने वाली आधुनिक युग की पहली बहुजन लेखिका मुक्ता साल्वे सावित्रीबाई और ज्योतिबाई फुले की पाठशाला की छात्रा रही थी, महाराष्ट्र में  मांग महार समुदाय में मुक्ता साल्वे को मुक्ताबाई भी कहा जाता है। राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले ने महिला शिक्षा एवं समाज सुधार के लिए पुणे में स्थित भिड़ेवाड़ी 1 जनवरी 1848 पाठशाला  की शुरुआत भिन्न वर्गों की  8 छात्रों के साथ की, उन्हीं 8 छात्रों में से मुक्ता साल्वे एक छात्रा रही।

मुक्ता साल्वे ने पुणे स्कूल से 3 वर्ष तक अपनी पढ़ाई की और 15 फरवरी 1855 मुक्ता सालवे ने “मांग महारों का दु:ख” शीर्षक अपने निबंध में पेशवा राज में मांग-महारों  की स्थिति को इन शब्दों में व्यक्त किया “सुनो बता रही हूं कि हम मनुष्यों को गाय भैंसों से भी नीच माना है,  यदि कोई लंगड़ा पशु भी अगर मन ना चाहे तो उसका मालिक उसे मरने की अनुमति देता है परंतु मांग में हर समुदाय के व्यक्तियों के लिए कोई ऐसा विशेष अधिकार नहीं था।  अगर कोई व्यक्ति अगर पाठशाला के सामने से गुजरता था गुल पहाड़ी के मैदान में उनके सिर को काटकर उसकी गेंद बनाकर और तलवार से बल्ला बनाकर खेल खेला जाता था “। 


मराठा साम्राज्य में पेशवा शासनकाल के दौरान शुद्र एवं वंचित पीड़ितों के साथ अमानवीय व्यवहार की अनेक घटनाओं का जिक्र मिलता है, डॉ. बाबा साहेब ने भी लिखा है कि “मराठों में पेशवाओं के शासनकाल में अछूत को उस सड़क पर चलने की अनुमति नहीं दी गई होतीं थी क्योंकि जिस सड़क पर कोई सवर्ण हिंदू चल रहा हो उसकी छाया पड़ने से हिंदू अपवित्र न हो जाए। उसके (अछूत) के लिए आदेश था कि वह एक चिह्न या निशानी के तौर पर कलाई या गले में काला धागा बांधे रहे, ताकि कोई हिंदू गलती से उसे छूने पर अपवित्र न हो जाय। जन आक्रोश को देखते हुए मुक्ता साल्वे ने “मांग महारो का दुख” शीर्षक से एक निबंध का पहला भाग 15 फरवरी 1855 और दूसरा भाग 1 मार्च 1855 मुंबई से निकलने वाली पत्रिका ज्ञानोदय में प्रकाशित हुआ था।

उन्होंने अपने निबंध में लिखा था कि “पंडितों तुम्हारे  स्वार्थी, और पांडित्य को एक कोने में गठरी बांधकर धर दो और  जिस समय हमारी स्त्रियां जचकी (बच्चे को जन्म देना) हो रही होती हैं, उस समय उन्हें  छत भी नसीब नहीं होती, इसलिए उन्हें धूप, बरसात और शीत लहर के उपद्रव से होने वाले दु:ख तकलीफों का अहसास खुद के अनुभवों से जरा करके देखो”।

मुक्ता साल्वे ने ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ अपना मोर्चा खोले रखा उन्होंने शूद्रों की शिक्षा एवं महिलाओं के अधिकारों को पेशवा शासकों के समक्ष रखा। पेशवा राज की समाप्ति के तत्पश्चात ब्रिटिश राज की स्थापना के बाद समाज में आई आधुनिक चेतना एवं नवजागरण की चर्चा भी मुक्ता सालवे ने किया है। अपने इस निबंध में वह रेखांकित करती है कि कैसे अंग्रेजों के आने बाद ही अछूतों एवं बहिष्कृतों के लिए स्कूल खोले गए जिनमें महार और मांग समुदाय के लड़के लड़कियों के लिए शिक्षा की व्यवस्था की गई। मांग-महार समुदाय के शिक्षा एवं नारी हकों के लिए लड़ते हुए मुक्ता को ब्रह्मणवादी लोगों के द्वारा समाज से बहिष्कृत किया गया  परंतु अदम्य साहस से ओतप्रोत मुक्ता साल्वे ने ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ अपना मोर्चा सदैव खुले रखा एवं शिक्षा के लिए अपने समुदाय की पैरवी की। 


19 वीं शताब्दी के भारत इतिहास को एक रूप से अध्ययन करने के लिए ऐतिहासिक दस्तावेज भी है, जातीय व्यवस्था एवं शोषण-उत्पीड़न को ब्राह्मणवादी व्यवस्था को प्रारंभिक दौर में कैसे अंग्रेजी शासन ने कमजोर किया, जिसके चलते अछूतों एवं बहिष्कृतों के जीवन में उम्मीद की एक रोशनी जगी और उनके लिए शिक्षा एवं ज्ञान के दरवाजे खुले। जिसका एक जीवंत प्रमाण मांग जाति की लड़की मुक्ता सालवे का 165 वर्ष पूर्व लिखा गया यह निबंध भारतीय नारी व्यवस्था, शिक्षा एवं अधिकारों की बात को समाज के सामने रखता है।

मुक्त साल्वे ने अपने समुदाय से आह्वान करते हुए कहा था कि “ज्ञान ही वह औषधि है जिससे तुम लोगों की सभी बीमारियों का निदान हो सकता है एव तुम्हें जानवरों जैसी ज़िंदगी से मुक्ति मिल सकती है और तुम्हारे दुखों का अंत हो सकता है”। मुक्ता साल्वे को 1855 में ब्रिटिश सरकार में मेजर कैंडी द्वारा पुणे में सम्मानित किया गया जिसमें उन्हें उपहार स्वरूप चॉकलेट प्रदान की गई परंतु मुक्ता साल्वे ने वह लेने से इनकार कर दिया एवं मेजर कैंडी से निवेदन किया कि वह हमें अच्छी किताबें दें और चॉकलेट न दें!” 

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