जम्मू कश्मीर में दलित अधिकारों की आवाज अनुपस्थित क्यों?

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( प्रवीण कुमार अवर्ण )

जम्मू कश्मीर राज्य तीन क्षेत्रों से मिलकर बना हुआ है – जम्मू, कश्मीर और लद्दाख। जम्मू कश्मीर पुनर्गठन विधेयक लागू होने के बाद ,नया जम्मू-कश्मीर अस्तित्व में आ सकता है। परन्तु अब तक यही जम्मू कश्मीर है। जम्मू कश्मीर राज्य की जनसंख्या लगभग 1.25 करोड़ है जिसमें लगभग 68 प्रतिशत मुस्लिम और 29 प्रतिशत हिन्दू हैं और इसके साथ साथ कुछ अल्संख्यक हैं जैसे सिख, बौद्ध, ईसाई इत्यादि। दलित समुदाय की आबादी जम्मू कश्मीर में लगभग 8 प्रतिशत है जबकि हिन्दू आबादी की लगभग 25 प्रतिशत आबादी दलित है। यह सारी दलित आबादी लगभग जम्मू क्षेत्र में ही रहती है। दलित समुदाय का नम्बर तो अच्छा खासा है फिर भी दलित अधिकारों की आवाज जम्मू कश्मीर में कहीं सुनाई नहीं देती,न ही  मुख्यधारा की राजनीति में और न ही सामाजिक आंदोलन के रूप में । क्या यहां पर दलित समुदाय की कोई समस्या नहीं है ? क्या यहां पर दलित समुदाय से कोई भेदभाव नहीं है ? या फिर सामाजिक, राजनीतिक तौर जम्मू कश्मीर का दलित इतना कमजोर है  कि वो अपने अधिकारों के लिए संघर्ष ही नहीं कर सकता ? आर्थिक तौर पर तो जम्मू कश्मीर का दलित भारत के दलितों की तुलना में अच्छा है। यह सब सवाल आज शोध का विषय बने हुए हैं जम्मू कश्मीर में दलित कार्यकर्त्ताओं के लिए।
 जम्मू-कश्मीर में जातिवाद के रूप
बहुत से लोगों का मानना है कि जम्मू कश्मीर के समाज में जातिवाद नहीं है बस जातिवाद के कुछ अवशेष लोगों के दिमागों में रह गए हैं,जो समय के साथ साथ अपने आप मिट जाएंगे। परन्तु ऐसा नहीं है कि जम्मू कश्मीर में जातिवाद नहीं है। हां ऐसा जरूर है कि यहां जातिवाद के रूप बाकी भारत के जातिवादी रूपों से थोड़ा अलग जरूर दिखते हैं। जैसे भयंकर किस्म की छुआछूत , अलग-अलग रास्ते, शादी- व्याह में घोड़ी पर चढ़ने से रोकना ,अच्छे कपड़े या जूते पहन कर सार्वजनिक रास्तों पर गुजरने से रोकना ,पढ़ाई में अच्छे अंक लाने पर पिटाई , मंदिरों में जाने से रोकना, सार्वजनिक प्रोग्रामों में हिस्सा लेने से रोकना इत्यादि बहुत ही कम देखने को मिलता है। कहीं – कहीं ऊपर बताई हुई घटनाएं अगर मिल भी जाएं तो यह हर दिन की और हर जगह की कहानी नहीं है। एक बात जरूर अहम है कि मंदिरों या सार्वजनिक प्रोग्रामों का प्रबंधन स्वर्ण हिन्दूओं के हाथों में ही होता है। इस तरह के प्रबंधनों में कोई दलित हिस्सेदारी नहीं होती। जो सामान्य तौर पर यहां देखने को मिलता है वह यह है कि जम्मू जिले के बहुत से गांव ऐसे हैं जहाँ दो अलग-अलग शमशान घाट हैं। एक दलित समुदाय के लिए और दूसरा स्वर्ण हिन्दूओं, अल्पसंख्यकों , पिछड़े वर्गों के लिए। बहुत से ऐसे गांव हैं यहां शादी ब्याह में अलग अलग खाना बनाया और खिलाया जाता है,दलितों को अलग और बाकी सबको अलग। इसके साथ- साथ यहां भी सजातीय विवाह की पद्धति बड़ी कड़ाई से लागू की जाती है। इसमें कोई संदेह नहीं दलित समुदाय आर्थिक तौर पर और संसाधनों की तुलना में बाकी सामाज तथा खासतौर पर सवर्ण हिन्दूओं से तो कमजोर है ही । गांव की हो या शहर  की, हर एक सामाजिक तथा राजनीतिक संस्थाओं पर सवर्ण हिन्दूओं के साथ साथ अल्पसंख्यकों का अच्छा खासा नियंत्रण है। दलित समुदाय की कहीं कोई आवाज नहीं है। कहीं कोई दलित अगर मिल भी जाए तो वह सिर्फ समाज को नियंत्रित करने वाली इन शक्तियों के हाथों की कठपुतली है।दलित समुदाय के इस सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षणिक तथा सांस्कृतिक पिछड़ेपन को बनाए रखने के लिए , समाज  पर काबिज इन सामाजिक तबकों द्वारा सरकारी संस्थाओं का इस्तेमाल किया जाता है। जैसे सरकारी विकास कार्यों को कहां और कैसे लागू करना है ?गांव में कौन-सी गली या नाली पहले बनाई जाएगी और कौन सी बाद में इत्यादि। उदाहरण के तौर पर हम अगर बिजली विभाग को ही ले लें। दलित गांवों में या मोहल्लों में बिजली की टूटी फूटी तारें और जर्जर खम्बे मिलेंगे। परन्तु सवर्ण हिन्दूओं के गांवों तथा मोहल्लों में बिल्कुल अच्छी खासी अवस्था में बिजली के तार और खम्बे मिलेंगे। दलित आबादी वाले गांव या मोहल्ले का ट्रांसफार्मर अगर जल जाए तो इतनी जल्दी बदला नहीं जाता ।कभी कभी तो कई कई दिन तक इंतजार करना पड़ता है । परन्तु सवर्ण हिन्दूओं वाले गांव या मोहल्लों में अगर जल जाए तो शाम होने से पहले पहले ही बदल दिया जाता है। सरकारी स्कूलों में पढ़ाई नहीं करवाई जाती क्योंकि पढ़ने वाले लगभग सारे दलित और पढ़ाने वाले लगभग सारे सवर्ण हिन्दू । इनकी(शिक्षकों की) आपसी गुफ्तगू में जिक्र किया जाता है कि इनको(दलित बच्चों को) पढ़ा कर क्या करना है। अगर कोई दलित शिक्षक है भी तो उसकी कोई भूमिका नहीं है क्योंकि स्कूलों में नियंत्रण सवर्ण हिन्दूओं का ही होता है। दलित शिक्षक या कोई भी दलित सरकारी कर्मचारी सिर्फ अपनी नौकरी को ही बचाना अपना कर्तव्य मानते हैं। और करीब -करीब इसी  तरह का भेदभावपूर्ण बर्ताव बाकी सरकारी विभागों का भी है, दलितों के प्रति।
यह जो हालात हैं दलित समुदाय के जम्मू कश्मीर में , चाहे वो सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक पिछड़ापन हो या दलित समुदाय में आत्मविश्वास की कमी, अपने अधिकारों के प्रति दृढ़ता का अभाव ,इन सब के लिए जातिवाद को जिम्मेदार नहीं माना जाता ।इस तरह के पिछड़ापन को सिर्फ दलितों की व्यक्तिगत कमजोरीयों के तौर पर ही देखा जाता है। जहां तक दलितों का सवाल है , दलित भी इस तरह के पिछड़ेपन को लेकर अपने आप को ही जिम्मेदार मानते हैं। दलित इन सब हालातों को लेकर अपनी अक्षमताओं को ही जिम्मेदार मानते हैं। यह अक्षमताएं या पिछड़ापन आया कैसे ,कभी भी इस तरफ ध्यानपूर्वक देखा ही नहीं गया। दलित समुदाय की चेतना का स्तर इतना नीचे है कि वह समझ ही नहीं पाते कि यह जो पिछड़ापन है बाकी समाज की तुलना में उनका( दलितों का) ,यह भी तो सदियों की जातिवादी व्यवस्था की ही देन है। और इसके साथ- साथ दलित अपनी निम्नस्तर की चेतना के कारण , अपने जीवन के हर एक क्षेत्र में सवर्ण हिन्दूओं के प्रभुत्व तक को नहीं देख पा रहे है।एक और अहम बात जो यहां गौर करने  लायक़ है कि भारत के दलितों की तुलना में , जम्मू कश्मीर में दलितों के सामाजिक जीवन का दायरा थोड़ा सा ज्यादा है। जिस दायरे के उल्लंघन के बाद सवर्ण हिन्दू दलित समुदाय पर अपनी कारवाई करते हैं या करना जरूरी समझते हैं, उस दायरे की सीमाएं भारत की तुलना में  जम्मू कश्मीर में थोड़ी सी ज्यादा बड़ी हैं।उस दायरे तक पहुंचने पर , यहां भी दलितों के ऊपर कारवाई की जाती है। कुछ-कुछ घटनाएं ऐसी मिलती हैं, यहां सवर्ण हिन्दूओं द्वारा दलितों के ऊपर कारवाई की गई। परन्तु, सामान्य तौर दलितों की चेतना का स्तर ही बड़ा निम्न है कि वे उस सीमा तक पहुंच ही नहीं पाते, जिसके आगे कार्रवाई होती है।

जम्मू-कश्मीर में दलित आवाज की अनुपस्थिति के कारण

जम्मू कश्मीर में दलित समुदाय के सामाजिक और आर्थिक हालात , भारत के दलितों के हालातों से भिन्न हैं। यह बदलाव दलितों के अपने आंदोलनों और संघर्षों से कम और जम्मू-कश्मीर में पिछले 6-7 दशक के राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक परिस्थितियों में आए बदलावों से ज्यादा आए हैं। जम्मू कश्मीर में भारत के सबसे अच्छे भूमि सुधार हुए, जिनकी वजह से दलितों को भी जमीन मिल गई। इस जमीन से दलित समुदाय को सिर्फ आर्थिक फायदा ही नहीं हुआ , बल्कि सामंती आर्थिक व्यवस्था जो पारम्परिक तरह के जातिवाद को लागू होने के लिए एक धरातल भी मुहैया करवाती है ,भूमि सुधार आने के साथ वो धरातल ही नहीं रहा। अब जमीनों के मालिक सिर्फ सवर्ण हिन्दू नहीं रहे जिसके आगे भूमिहीन दलित मजबूर होते। दूसरा आरक्षण की वजह से मिली सरकारी नौकरियों ने भी दलित समुदाय को आर्थिक तौर पर आगे बढ़ने के ‌मौके उपलब्ध करवाए। अपने खेत और सरकारी नौकरी ने दलितों को पारम्परिक जातिवादी सामाजिक व्यवस्था से छुटकारा दिलाया तथा दलितों की सवर्ण हिन्दूओं पर निर्भरता को समाप्त कर दिया। इस सारी प्रक्रिया ने दलितों को आत्मनिर्भर बनाया। तीसरा एक हिन्दू बहुल देश में ,एक मुस्लिम बहुल राज्य जम्मू कश्मीर। यह जोड़ भी एक अलग तरह की परिस्थितियों को जन्म देता है जो काफी हद तक दलितों के लिए फायदेमंद रहा है।

इन सब बदलावों के लिए दलित समुदाय संघर्षरत नहीं रहा लेकिन यह बदलाव उनके लिए बहुत कुछ अच्छा लेकर आए। शायद यही वजह है कि इनको(दलितों को)  संगठित होने की कभी जरूरत ही नहीं पड़ी और कभी महत्ता भी समझ में नहीं आई। दूसरा यहां कोई  दलित अधिकारों का आंदोलन भी नही रहा जो दलित चेतना के स्तर को ऊंचा उठाता। तीसरा हिन्दू आबादी का हर चौथा आदमी यहां दलित है जिनको हिन्दू बनाए रखना ज्यादा जरूरी है हिंदू आबादी के लिए भी। इसलिए दक्षिण पंथी हिन्दू संगठनों ने भी दलित चेतना को उभरने से रोकने के लिए काफी मेहनत की है। इन सब स्थितियों के साथ-साथ अब भी यहां कोई सामाजिक संगठन नहीं है जो दलितों को उनके अधिकारों के प्रति सचेत करवा पाए।

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