कारसेवक की किताब पर संघ ख़ामोश क्यों है ?

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(लखन सालवी )
दलित चिंतक भंवर मेघवंशी की सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘‘मैं एक कारसेवक था’’ को 1 दिसम्बर की रात को पढ़ना आरम्भ किया और 2 दिसम्बर को सुबह 11 बजे इसका आखिरी पन्ना पढ़ा।
यह जबरस्त पुस्तक है, जिसमें संघ के एक स्वयंसेवक की कहानी है। वो स्वयंसेवक लेखक ही था। जो बाद में संघ से बागी हो गया। इस पुस्तक को पढ़ते हुए इसके मुख्य किरदार की जगह न जाने क्यों मेरे दिमाग में नवाजुद्दीन सिद्दकी घूम रहा था। मुझे लगता है कि पीयूष मिश्रा को लिखने की जरूरत नहीं पड़ेगी, कहानी लिख दी गई है केवल फिल्मांकन बाकी है। जबरदस्त हिट हो सकती है ये फिल्म और न केवल हिट हो सकती है बल्कि इस फिल्म को देखकर लाखों-करोड़ों लोग छले जाने से भी बच सकते है।
समीक्षा में धन्यवाद ज्ञापित करना अजीब लग रहा है लेकिन लेखक का बहुत बहुत आभार कि उन्होंने अपनी आत्मकथा में न केवल अपने संघर्षों को दुनिया के सामने रखा बल्कि अपनी कलम की ताकत के माध्यम से संघ की दोहरे चरित्र वाली तस्वीर भी हमारे सामने रखी।
पुस्तक का कवर पेज बड़ा ही आकर्षक है। आवरण पर बना चित्र पुस्तक के टाइटल और कंटेंट को साफ इंगित कर रहा है। सैकड़ों पुस्तकों के बीच पड़ी इस पुस्तक पर यह चित्र ही है जो ध्यान आकर्षित करता है।
इस पुस्तक को छापने वाले नवारुण प्रकाशन की पूरी टीम भी बधाई की पात्र है। प्रकाशक की हिम्मत के बिना इस पुस्तक का छप कर हमारे हाथ में आना भी नामुमकिन ही था। हिम्मतवाले प्रकाशक संजय जोशी का भी बहुत आभार। 
पुस्तक की भूमिका हिमांशु पण्ड्या ने सधे हुए शब्दों में बहुत ही सारगर्भित तरीके से लिखी है। यह भूमिका आजकल के स्टार्टर की तरह है जो डीनर करने से पहले पीया जाता है। भूमिका पढ़ने के बाद पाठक की पढ़ने की भूख बढ़ जाती है, यानि कोई पाठक भूमिका पढ़ने के बाद कहानी को बिना पढ़ रहे ही नहीं सकता। इस पुस्तक को पढ़कर सर्तक हुआ जा सकता है। यह हरेक पाठक के लिए उपयोगी ही है। 
लेखक ने अपनी आत्मकथा को बहुत ही सलीके से क्रमवार लिखा है और अलग-अलग अध्यायों में लिखा है। अलग-अलग शीर्षक से अध्याय लिखे गए है जो इस आत्मकथा की कहानियों को परम्पर जोड़ते है। 
लेखक जनमानस के बीच एक पॉपुलर नाम  है। वह न केवल अपने क्षेत्र बल्कि प्रदेश व देश के कई भू-भागों में एक अम्बेडकराइट और दलित चिंतक व सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में प्रसिद्ध है। ऐसे में लेखक को जानने वाले पाठक इस पुस्तक के पहले अध्याय ‘‘सौगंध राम की खाते है’’ को पढ़कर अचरज में पड़ सकते हैं।
लेखक ने पेज 21 तक में पहली कार सेवा में जाने, टूंडला में पुलिस द्वारा पकड़े जाने व 10 दिन की जेल काटने के साथ आगरा केंट स्टेशन पर मुस्लिम कट्टरपंथियों के हमले से बचने के लिए मालगाड़ी के डिब्बे में बंद होने व बाद में सवारियों से खचाखच भरी रेल में टाॅयलेट के पास बैठकर जयपुर तक आने की कहानी लिखी है। लेखक अपने बड़े भाई के साथ कार सेवा में चले गए थे, वहीं 15 दिन बाद घर लौटे इस बीच चिंता के मारे घरवालों का बुरा हाल रहा। इन शुरुआती 21 पेजों में लिखे गए 4 अध्यायों में से एक में भी कहीं पर समय अंकित नहीं किया गया। इस कारण पाठकों को समझने में थोड़ी दिक्कत आती है। 
लेखक ने साफगोई से बताया कि किस प्रकार संघ के पदाधिकारी लेखक सहित उन जैसे अनेकों स्वयंसेवकों को कार सेवा के लिए रवाना करके खुद खिसक गए।
वहीं अध्याय ‘‘नफरत विधर्मी मुसाफिरों से’’ में लेखक का अलग ही रूप प्रकट हुआ है। अहिंसा में परम विश्वास रखने वाले लेखक के मन में एक समय एक समुदाय विशेष के लोगों के प्रति इतनी नफरत थी ! उन्हें चलती ट्रेन से बाहर फैंकने के विचार भी लेखक के मन में आए थे ! लेखक ने लिखा कि उसके हाथ में हथियार होता तो वो उस समुदाय के लोगों को समाप्त ही कर देता ! 
पेज 22 से 38 में लेखक ने अपने स्कूल समय में संघ से जुड़ जाने और संघ की शाखाओं में जाने की बात बताई है। वहीं शाखा में होने वाली गतिविधियों का वर्णन किया है। उन्होंने शाखा, संघ की प्रार्थना सहित संघ के स्ट्रक्चर, संघ की आर्थिक व्यवस्था, संघ के संगठन तंत्र और उसके क्षेत्र के बारे में बारीक जानकारियां दी है। बताया कि संघ का मुख्य एजेण्ड़ा व्यक्ति निमार्ण है। इन पेजों का पढ़ते हुए थोड़ी बोरियत महसूस होने लगती है।  
पेज 43 से पुस्तक पढ़ने में रूचि बढ़ जाती है और इसी कारण पढ़ने की गति भी बढ़ जाती है। पेज 75 तक का लेखन अपलक पढ़ने योग्य है। लेखक अपने स्कूल के अध्यापक द्वारा लगाई जाने वाली शाखा में जाने लगता है, शाखा में बताई जाने वाली बातों को सीखता जाता है। दैवीय शक्तियों में विश्वास करने लगता है। संस्कृत सीखते हुए संघ अनुशासन को अंगीकार करता है। काली टोपी, सफेद शर्ट व खाकी हाफ पेंट और मौजे पहनकर हाथ में डण्ड़ा लिए भगवे को गुरू मानने लगता है। मन में आने वाले हर सवाल को पूछते भी रहता है और पक्के स्वयंसेवक के गुण बढ़ाते जाता है। 
लेखक ने ईमानदारी से स्वीकार किया है कि संघ के मुखपत्र पांचजन्य को पढ़ते-पढ़ते वह बौद्धिक रूप से कट्टर हो जाता है। लेखक ने संघ के प्रशिक्षण भी प्राप्त किए। 5 दिवसीय आईटीसी की और 20 दिवसीय ओटीसी का प्रशिक्षण भी लिया। लेखक ने साफ बताया कि संघ के लोगों के साथ रहने से, संघ के साहित्य को पढ़ने से, संघ के प्रशिक्षण प्राप्त करने से और संघ की शाखाओं में जा-जाकर उसका इतना ब्रेनवाॅश हो गया कि उसमें गैर हिन्दुओं के प्रति नफरत की भावना बढ़ गई। 
बाद में लेखक संघ की शाखा का मुख्य शिक्षक बना, उसके बाद उसे पदौन्नति मिली और वह कार्यवाहक बना दिया गया। उसने प्रचारक बनने की ठान ली थी लेकिन जिला प्रचारक ने बताया कि प्रचारक बनने के बाद जाति दुखदायी होगी, तब लेखक कड़वा घूंट पीकर रह गया। उसे अपनी जाति पर कोफ्त भी होने लगी ।हालांकि इसके बावजूद भी लेखक ने हार नहीं मानी और संभावनाओं को ध्यान रखते हुए स्वयं को कट्टर हिंदूवादी बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।
लेखक लिखता है कि वह पढ़ाई के सिलसिले में जब भीलवाड़ा में आजादनगर स्थित अम्बेडकर छात्रावास अध्ययन करने लगा तो संघ के एक नगर प्रचारक उसे ‘छात्रावास में विचारधारा भ्रष्ट हो जाने की बात कहकर’ संघ के जिला कार्यालय में ले आता है। जहां लेखक को कार्यालय प्रमुख बना दिया जाता है।
किताब यह बताने में सफल रहती है कि लेखक हिन्दुत्व की भट्टी में जलते हुए किस कदर कट्टर हिन्दुवादी बनते जा रहा था। सावरकर, डॉ मुंझे, तिलक, गोखले, हेडगेवार, गोवलकर को पढ़ कर उन्हीं को  अपना आदर्श मान रहा था। लेखक महाराणा प्रताप और मीरा बाई को तो जान रहा था, लेकिन राणा पूंजा भील का नाम भी नहीं सुन पाया था, झलकारी बाई,कबीर और संत रैदास से भी दूर ही रहा। संघ में रहते डाॅ.भीमराव अम्बेडकर, महात्मा ज्योति बा फूले, पेरियार व बुद्ध उससे कोसों दूर थे। 

पेज 59 से लेखक की दिशा बदलने लगती है। एक बार वो नगर प्रचारक के साथ ओशो के भक्त तीरथदास के पास पहुंचता है। तीरथदास पहले स्वयंसेवक थे। बाद में रजनीश को पढ़ने लगे और धीरे-धीरे संघ से दूरी बना ली। प्रचारक तीरथदास को समझाने आए थे। वे लेखक को अपने साथ लाए थे। यहां तीरथदास ने प्रचारक की बात तो नहीं ही मानी,उल्टे आचार्य रजनीश की ओशो टाइम्स पत्रिका प्रचारक को भेंट में देनी चाही। प्रचारक ने तो वो पत्रिका नहीं ली लेकिन लेखक ने ले ली।
एक दिन लेखक ओशो टाइम्स को संघ के जिला कार्यालय में बैठकर पढ़ रहा था कि प्रचारक महोदय ने ओशो टाइम्स लेखक के हाथ से छीनकर फैंक दिया और कहा कि इससे विधारधारा में भटकाव आ जाता है। यह सुनकर लेखक स्तब्ध हो जाता है कि आखिर एक पत्रिका को पढ़ने से विचारधारा में भटकाव कैसे आ सकता है ? उसके बाद लेखक ने चोरी छिपे ओशो रजनीश को पढ़ना आरम्भ कर दिया और इससे लेखक के मन से संघ की विचारधारा का प्रभाव कम होना आरम्भ हो गया। 
भीलवाड़ा की एक घटना का उल्लेख करते हुए लेखक ने संघ की असलियत को सामने रखा है। उन्होंने बताया कि अयोध्या में राम मंदिर बनाने की मांग को लेकर भीलवाड़ा में एक जुलूस निकाला जा रहा था। पुलिस ने जुलूस को मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र से निकालने से मना कर दिया। वहीं स्वयंसेवक उसी रास्ते से जुलूस निकालने पर अड़े हुए थे। इसी बीच पीछे से किसी ने पत्थरबाजी कर दी। पुलिस ने लाठी चार्ज कर दिया और गोलियां भी दागी। इस भिड़ंत में दो लोग मर गए। संघ ने उन्हें शहीद का दर्जा दे दिया। 
लेखक ने बताया कि पुलिस की गोलियों से मारे गए दोनों लोग स्वयंसेवक नहीं थे और न ही वे जुलूस में शामिल थे। दोनों का रामजन्म भूमि आन्दोलन से कोई लेना देना नहीं था। पर संयोग से दोनों ही हिन्दू थे,इसलिए संघ विहिप ने उनको शहीद घोषित कर दिया और उनकी अस्थियों का कलश गांव गांव घुमा डाला !
‘‘जब मेरे गांव आई अस्थि कलश यात्रा’’। इस अध्याय के अंत होते ही किताब का इंटरवेल आ जाता है ।इस अध्याय मे लेखक ने बताया कि भीलवाड़ा में मारे गए दोनों व्यक्तियों की अस्थि कलश यात्रा जिस दिन उनके गांव आई, तब लेखक ने यात्रा में शामिल संघ के लोगों के लिए अपने घर में खीर पुड़ी बनवाई। लेखक के कांग्रेसी विचार के पिता ने मना किया कि संघ के लोग उसके घर का भोजन नहीं करेंगे लेकिन वे नहीं माने। अंततः वहीं हुआ जो पिता ने कहा था, यात्रा में आए लोगों ने बहाना बनाकर खाना नहीं खाया और पैक करवाकर अपने साथ ले गए। बाद में लेखक को पता चलता है कि पैक करके ले जाए गए खाने को अगले गांव के चैराहे पर फैंक दिया गया। बस इसी दिन संघ का चेहरा लेखक के सामने स्पष्ट हो गया।
लेखक को इतना गहरा दुःख हुआ,उन्होंने चुहे मारने की दवा का सेवन कर आत्महत्या करने का प्रयास भी कर लिया। उन्होंने अपने साथ हुए भेदभाव के बारे में संघ के प्रचारक से लेकर सर संघचालक तक से शिकायत की लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई। तब लेखक ने संघ के असली चेहरे को जनता के सामने लाने का प्रयास शुरू कर दिया।
लेखक ने कईं तौर तरीके अपनाए,धार्मिक व राजनीतिक विकल्प तलाशे,अन्ततः डायमंड इंडिया नामक मासिक समाचार पत्रिका आरम्भ की। जिसमें संघ की करतूतों का सामने लाने का प्रयास करने लगे। इस बीच मजदूर किसान शक्ति संगठन के लोगों से मुलाकात हुई और वे समरसता की भावना के साथ वंचित वर्ग के मुद्दों पर कार्य करने लगे। साथ ही साथ संघ के हर साम्प्रदायिक कार्य का पर्दाफाश करने लगे। यह सब करते करते कई चुनौतियों का सामना किया। अम्बेडकर को पढ़ा, पेरियार को पढ़ा, कबीर महात्मा ज्योति बा फूले को पढ़ा। दलित आदिवासी एवं घुमन्तू अधिकार अभियान की शुरूआत की। कई अखबारों व पत्र पत्रिकाओं में लिखने का सिलसिला जारी रखा। दलितों व आदिवासियों पर किए गए अत्याचारों के मामलों में आगे बढ़कर पैरवी की। झूठे मामलों में फंसाने की कुचेष्टाओ को मात दी। 
आधी किताब के बाद के सारे सीन लगभग एक से है, जिनमें लेखक संघर्ष करता है और जीत जाता है। धीरे-धीरे लेखक ने अपने संघर्षों की बदौलत राष्ट्र पटल पर एक दलित चिंतक व लेखक के रूप में अपनी अलग ही पहचान कायम कर ली। 
लेखक ने अपनी लेखन शैली का तड़का भी खूब लगाया है जैसे – ‘पीछे पत्थर बरसाते मुल्ले और आगे लाठियां लिए खड़े ठुल्ले ‘/’मुलायम कारसेवकों के लिए मुल्ला-यम साबित हुए’/ ‘मैंनें 3 माह तक राजनीति की रपटीली राहों का सफर किया’ /’1925 में रोपी गई विष बेल अब खूब फल फूल रही है’/रंगीले रतन थे तो रंगीलेशाह बाबा कहलाए/चिमटा थामा तो चिमटा वाले बाबा हो गए /औरतखोर थे इसलिए रंडीशाह बाबा कहलाए’
किताब की एक बात उलझन में डालती है,जहां लेखक लिखता है कि -‘संघ का स्वयंसेवक कभी भी  ‘‘होता था’’ नहीं होता है। संघ का मानना है कि संघ का स्वयंसेवक ताउम्र स्वयंसेवक रहता है। …तो क्या संघ के लिए लेखक अब भी स्वयंसेवक है ? मैं लेखक को भलीभांति जानता हूं। लेखक कहीं इस कथन को सत्य न बना दे। क्योंकि कारण कुछ भी रहा हो, राजनीति की रपटीली राहों पर लेखक रपटने तो गए ही थे, यह बात अलग थी कि रपटने से पहले ही संभल गए ! भविष्य में न रपट जाए,इसकी सावधानी बरतनी होगी,क्योंकि जनाधार वाला लोकप्रिय नाम है तो कोई भी सियासत में खींचना चाहेगा,संघ भाजपा में न सही, कोई सेकुलर कहा जाने वाला दल ही न रपटा दे,इसकी आशंका बनी रहेगी।
पुस्तक के माध्यम से लेखक एक बड़ा सवाल भी किया है।उन्होंने पूछा है कि संघ में दलित, पिछडे व आदिवासियों का स्थान कहां है ? मतलब कि कथित हिन्दुराष्ट्र में वंचित तबकों की औकात क्या रहने वाली है ?

कुलमिलाकर किताब पढ़ी जा सकती है,जो लोग संघ को जानते है या नहीं जानते है अथवा जानते और मानते हैं,उनको भी पढ़ ही लेनी चाहिए। यह भी सवाल उठता है कि क्या संघियों ने अभी तक इसे नहीं पढ़ा है या पढ़कर भी खामोश है ? क्या उन्हें अपने स्वयंसेवक कारसेवक की लेखनी से कोई तिलमिलाहट हुई है या उन्होंने इसे एक दलित बहुजन बुद्धिजीवी का एकालाप समझ कर इग्नोर कर दिया है ? यह तो वही जाने ,पर उनका चुप रहना कईं प्रश्न खड़े करता है।
पुनः लेखक व प्रकाशक को बधाई,मैं साफ देख पा रहा हूँ कि इन दिनों हिंदी जगत में इस किताब की बड़ी चर्चा है और इसे काफी पढ़ा जा रहा है,खासकर उन तबकों में जहां पढ़ने लिखने की संस्कृति कम ही रही है,आम लोग इस तरह की राजनीतिक सामाजिक विमर्श की किताब न केवल पढ़ रहे हैं, बल्कि उस पर खुलकर अपनी प्रतिक्रिया भी दे रहे हैं,जो इस पुस्तक की सफलता की गवाही देती है।

( लेखक डेली राजस्थान के संपादक है )

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