महानगर में कहाँ खोजूं चांद ?

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(हरिराम मीणा)
आज करवा चौथ है! चाँद का चक्कर है!! मेरे इस लेख को करवा चौथ समर्थक व विरोधियों दोनों को गौर से पढ़ना चाहिए.  
मेरी दिक्कत करवा चौथ या शेष बची ग्यारह चौथों के व्रतों के साथ न होकर चाँद देखकर व्रत को तोड़ने की जिद से पैदा होती है. वह चाँद जिसका मैं हमेशा से कायल रहा हूँ, वही चाँद यहाँ खलनायक की भूमिका निभाने लगता है. इसमें भी चाँद का तनिक दोष नहीं. यहाँ आड़े आता है जयपुर महानगर जिसमें मैं अर्सा से रह रहा हूँ. जब से नगर से महानगर बनने की कसम खायी है इस शहर ने, तभी से चाँद का इससे झंझट शुरू होने लगा और वह लोगों को दिखने न दिखने की जिद करने लगा. 
पिछली चौथ का दिन शांति से गुज़र गया. संध्या बूढी हो रही थी. रात का आगाज़ हो चुका था. रात के साढ़े नौ बज गये. जैसे ही याद आयी धर्मपत्नी के व्रत की तो लिखना-पढ़ना एवं देर शाम के अन्य ज़रुरी काम छोड़ चाँद का ध्यान करने लग गया. ध्यान करता करता मकान की छत पर जा पहुंचा. चाँद आसमान में नज़र नहीं आया. चाँद को उगना था पूरब दिशा से, जिस ओर आड़े आ रही थी एक चार-मंजिला ईमारत. चाँद कोई दो घड़ी ऊपर चढ़े तो उसके नज़र आने की संभावना बने. वापस नीचे आया. लॉबी में रखे सोफ़ा पर लेटी हुई पत्नी को देखा. उसका चेहरा दिन भर की भूख व थकान से मुरझाया हुआ था. कब की खा-पीकर टी.वी. का कलर चैनल देख रही होती लेकिन चाँद का क्या करें?
मेरी नज़र गयी दीवार पर टंगे कलेंडर की तरफ. चाँद के उगने का समय छपा हुआ था नौ बजकर उनसठ मिनट. नौ देखकर तसल्ली हुई. उनसठ देखते ही माथा ठनका. इसका साफ़ मतलब था कम से कम साढ़े दस. चाँद के चक्कर में एक घंटा और इंतजार करना पड़ेगा.
मैंने पत्नी को कहा, ‘चलो छत पर. मैं तुम्हें चाँद दिखाता हूँ.’

‘क्या दिख गया?’ मेरी ओर बड़े प्यार से देखती वह उत्सुकता से बोली.
‘हाँ, तुम काफ़ी परेशान लग रही हो. चलो देखते हैं. अब तो चाँद निकल ही आया होगा.’
मैं उसे लेकर इकमंज़िला छत पर गया. चाँद को देखने का प्रयास किया. अमानीशाह नाला के किनारे बने आठ माले कोम्पलेक्स की सातवीं मंज़िल की दक्षिणी दीवार पर चाँद तो नहीं, बिजली की रोशनी का चांदा (प्रतिबिम्ब) नज़र आया जो दूर से चाँद का भ्रम पैदा करने जैसा लगा.
‘वो देखो, चाँद दिख गया. हल्के बादलों में है ना. इसलिए धुंधला सा दिख रहा है.’ बाहर से मैंने संदेह से परे चाँद का चश्मदीद गवाह बनने का दावा किया. मन के भीतर पोल खुलने के अंदेशा को छुपाते हुए.
‘हाँ, लग तो रहा है चाँद ही है.’ कहते हुआ पत्नी संतुष्टि के करीब थी.
‘मैं पूजा की थाली लेकर आती हूँ.’
‘वह कहाँ है?’ मैं झुंझलाया. मेरी झुंझलाहट सहज थी.
‘अजी. वो ऊपरवाली छत पर रख दी थी ना यह सोचकर कि चाँद तो वहीँ से दीखेगा. मैं अभी लेकर आती हूँ.’ कहती हुई वह सीढियाँ चढ़ने लगी. मैं भी उसके पीछे पीछे छत पर तुरंत गया यह सोचता हुआ कि इसने अगर चाँद को वहां से देखा तो कुछ नज़र नहीं आनेवाला. ज़ाहिर है चाँद को तो दस बजे से पहले किसी हालत मैं नहीं दिखना था.
‘नहीं जी, मैं यहीं से पूजूंगी चाँद को. वो क्या है कि नीचेवाली छत पर बच्चे घूमते हैं ना. अर्ध्य सामग्री पर पैर रख देंगे तो अच्छा नहीं होगा.’ पत्नी द्वारा पूजा-स्थल ऊपरवाली छत को ही रखने के इस आइडिया का  जोर का धक्का मुझे धीरे से लगा.
मैंने मन में सोचा, ‘अब यहाँ चाँद कहाँ से लाऊं?’कुल मिलाकर साढ़े दस बजे चाँद को बड़ी मशक्कत के बाद खोज सका. और वह भी अमानीशाह के नाले के निकट जाकर. अन्य किसी पॉइंट अथवा एंगल से मैं चाँद को नहीं देख सकता था.
मैंने बड़े सम्मान से धर्मपत्नी से कहा कि ‘बहुत देख लिया चाँद को गाँव में. अब छोड़ो ये चाँद का चक्कर. यहाँ इस महानगर में चाँद-सितारे नहीं देख पाओगी. और यूँ भी ये चाँद-वांद के झंझट ज़वानी के शौक होते हैं. मेरी सलामती की भी अब ज्यादा परवाह करने की ज़रूरत नहीं. बुढ़ापे की उम्र वैसे भी कम ही होनी चाहिए.’ नयी पीढ़ी की औलादों का क्या भरोसा?’
आज मुझे तनिक तसल्ली है कि चाँद के उगने का वक्त अखबारों में साढ़े आठ के आस पास बताया गया है. मैं कभी राशिफल और मुहूर्त वगैरा वाले पन्नों को नहीं देखता किन्तु आज करवा चौथ के चाँद के चक्कर में उन पन्नों को गौर से देखा।
(लेखक भारतीय पुलिस सेवा से सेवानिवृत्त है,नामचीन साहित्यकार है )

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